तलाक के लिए कौन जिम्मेदार – अभिभावक, समाज या ज्योतिषी ?

पं. दयानन्द शास्त्री

आज नवविवाहित जोड़ों में 30 प्रतिशत दम्पति पहले दो साल के अन्दर ही तलाक लेने को क्यों प्रेरित हो जाते हैं। सबसे प्रथम दोष उन परिवारों का होगा जिनके अपने निवास या उनके बच्चों की ससुराल में रसोर्इ या निवास के उत्तर – पूर्व में आग गैस जलेगी। उनकी पुत्र – पुत्रवधु परेशान होगी। इनके साथ – साथ जिन परिवारों के सीढि़यों के नीचे रसोर्इ होगी उनकी लड़कियाँ पुत्रवधुएं जल मरेगी व जिनकी सीढि़यों के नीचे बाथरूम, शौचालय होगा वह किसी न किसी प्रकार जहर खाने को बाध्य होगी।

समाज का हर वर्ग गरीब-अमीर पढ़ा लिखा विद्वान व अनपढ़ हर कोर्इ शादी के मामले में ज्योतिषियों के ऊपर बहुत ही अधिक निर्भर हैं। होना भी चाहिए क्योंकि विज्ञान अभी तक मानव सूक्ष्म भावनाओं को समझने में पूर्णतया: सशक्त नहीं हुआ हैं। परन्तु इसमें भी एक बहुत बड़ी त्रुटि हैं कि ज्योतिषी महोदय जो पूर्ण विद्वता से पूर्ण तो हैं पर वर्तमान की सुधार ज्योतिष में नहीं ला पाये हैं।

मंगली होना व कालसर्प दोष इत्यादि को ही ज्योतिषी विद्वान विवाह विलम्ब व विवाह तनाव का आधार मान कर चल रहे हैं जबकि मांगलिक होने का अभिप्राय: दाम्पत्य सुख: में उग्रता , एनर्जी का धोतक कहा जाना चाहिए। विवाह विलम्ब व विवाह में तनाव में अन्य ग्रहों के योग व दृषिट सम्बन्ध पाये जाते हैं। जिनमें भगवान राम के काल से लेकर अभी तक विद्वान ज्योतिषी समुदाय ने दृषिटपात या अनुसंधान ही नहीं किया हैं।

मांगलिक दोष या कुंजा दोष को लेकर समाज में नारी वर्ग का जितना अपमान व अनादर हुआ हैं वह अवसाद का विषय हैं। करोड़ों कन्याओं को मंगली दोष के अज्ञानता के कारण कभी प्रथकता तो कभी वैधव्य तो कभी अत्याचार कभी हत्या, कभी हिंसा जैसे भयावह दुष्परिणामों का भागीदार बनना पड़ा हैं। जन्मांक में मंगल दोष से भयभीत होकर जो अभिभावक अपने पुत्र अथवा पुत्री का कृत्रिम जनमांक मिलापक के निमीत्त प्रस्तुत करते हैं वे अपने परिवारों के साथ क्रुर एवं अक्षम्य अपराध करते हैं ।

मिलान सारणी व मुहूर्त प्रणाली पर भी वर्तमान एवं भविष्य के संदर्भ में रखकर नये सिरे से अनुसंधान करना चाहिए। मकान , दुकान व विवाह का मुहूर्त काल सिथर लगन में ही होना चाहिए जबकि जबकि चर व द्विस्वभाव लगन में भी शादी के मुहूर्त हो रहे हैं। इसके लिए समाज भी दोषी हैं जोकि विद्वान ज्योतिषी द्वारा सुझाए गये लग्न व मुहर्त नहीं मानकर भागड़ा इत्यादि में दुल्हा-दुल्हन को उलझाकर, शुभ लग्न को छोड़कर अशुभ लग्न में फेरे (पाणिग्रहण) हेतु बाध्य कर देते हैं । वधु के माता-पिता एवं विवाह आयोजकों को चाहिए कि वे ज्योतिषी द्वार सुझाये गये मुहर्त एवं लग्न में ही विवाह की रस्म (सम्तपदीफेरेपाणिग्रहण संस्कार) पूर्ण कर ले अन्यथा विवाह मुहर्त निकलवाने का कोर्इ महत्व नही रह जाता हैं क्योकि व्यवहारिक तौर पर देखा गया हैं कि विवाह में सम्मीलित सभी लोग अपने-अपने कार्यो में व्यस्त रहते हैं कोर्इ शराब में मस्त रहता हैं तो केार्इ डांस में। कुछ लोग फोटो शैसन में तो कुल लोग बातो में मशगुल रहते हैं इन सब बातों में नजरअंदाज करता हुआ शुभ विवाह मुहर्त आगे निकल जाता हैं क्योकिं समय गतिशील हैं फलत: अधिकांश विवाह मुहर्त में नहीं होते हैं जिसके कारण पारिवारिक कलह पति-पत्नी के सम्बन्धों में कटूता एवं तलाक आदि को पूरा समाज त्रासदी के रूप में झेलता हैं ।

अगर किसी भी जातक जिसकी शादी हो रही हैं उन दोनो पति पतिन में या किसी एक के जन्म लग्न में सूर्य पर शनि का व बुध या मंगल या बुध मंगल दोनो पर राहू का गोचर भ्रमण या दृषिट संबंध बन रहा हो तो शादी नहीं करनी चाहिए जब तक यह गोचर दृषिट संबंध समाप्त नहीं हो जाता। अन्यथा नवदम्पति का तलाक या आत्महत्या अथवा आग से जलने मरने की दुर्घटना हो सकती हैं। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कुल 36 गुणों में से कम से कम 18 गुणों का मिलान आवश्यक माना गया हैं। परन्तु विवाह से पूर्व पूर्ण रूप से पत्रिका मिलान के बाद भी विवाह में झगड़े, तलाक या आत्महत्या को नहीं रोका जा सकता हैं। कुछ पति पतिन एक दूसरे के साथ रहते अवश्य हैं किन्तु मन नहीं मिलता ।

कर्इ लोग सिर्फ अच्छे परिवार में विवाह के लिए अथवा कोर्इ एक मांगलिक होने के कारण नकली जन्म पत्रिका मिलवाकर विवाह कर देते है अथवा सिर्फ नाम से ही विवाह कर दिया जाता हैं । कर्इ बार ज्योतिष वर्ग भी दक्षिणा के आधार पर सिर्फ पाच मिनट में ही जन्म पत्रिका का मिलान कर देते हैं जबकि मेलापक वास्तव में एैसा विषय नहीं है जो सिर्फ पाच मिनट में ही पूर्ण विवाह मिलान कर दिया जावे। वे मंगल की सिथति भी नहीं देखते हैं कि मंगल किस राशि व किस भाव में हैं क्योकि मंगल के उपरोक्त स्थान में होने मात्र से जातक मंगली नहीं हो जाता। कर्इ ज्योतिषी तो ऐसे भी होते हैं जो प्रथम, चतुर्थ , सप्तम , अष्ठम व द्वादश भाव में मंगल के होने मात्र से ही मंगली का हौवा बैठा देते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने मेलापक सिर्फ इसलिए बनाया कि विवाह से पूर्व दो जीवन के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सके। उनके विवाहित जीवन में किसी प्रकार की समस्या न आये और दोनो ही अपना जीवन सुखी, सौहार्दपूर्ण व सफल रूप से जीवन यापन कर सके। मांगलिक दोष के भ्रामक तथ्यों एवं विघटनकारी तत्वों का सम्यक विश्लेषण यहां पूर्णत: सम्भव नहीं हैं।

दाम्पत्य कलां के कारण व ज्योतिष –

दाम्पत्य कलां के पीछे कभी भी एक कारण जिम्मेदार नहीं होता हैं क्योकिं किसी कारण विशेष का किसी भी प्रकार से निदान किया जा सकता हैं। कलह के पीछे अनेक कारण अपनी भूमिका अदा करते हैं। जिनमें से यदि कुछ का समाधान नहीं होता हैं तो सिथति बिगढ जाती हैं वे कारण निम्न हो सकते हैं :-

1 पति पतिन में वैचारिक मतभेद होना ।

2 पति पतिन में अहम, शंका व महत्वांकांशा होना अथवा एक-दूसरे के प्रति अविश्वास ।

3 काम कला में न्यूनाधिकता होना ।

4 आर्थिक संकट होना ।

5 भाग्यहिनता ।

6 पति या पत्नी में से किसी एक का रोगी होना ।

7 पति या पत्नी में से किसी एक में हिन भावना का होना या विचार मेल न खाना ।

8 पारिवारिक कलह ।

9 गुण मिलान, शिक्षा, व संतान न होना आदि किसी एक में चारित्रिक दोष का होना ।

10 एक दूसरे को समय न दे पाना। पति अथवा पतिन का किसी भी कारण से विदेश प्रवास।

11 किसी एक के परिवार के अन्य सदस्यों का हस्तक्षेप ।

 

जन्म पत्रिका में सुखी वैवाहिक जीवन की भूमिका –

1 लग्न व उसका स्वामी अथवा लग्नेश ।

2 राशि तथा राशि का स्वामी ।

3 षष्ठम भाव तथा उसका स्वामी अर्थात षष्ठेश ।

4 सप्तम भाव तथा उसका स्वामी अर्थात सप्तमेश ।

5 मंगल, शुक्र तथा गुरू की स्थिति(विशेषकर स्त्री के लिए)

6 द्वितीय, चतुर्थ, पंचम अष्ठम व द्वादश भाव तथा इनके स्वामी ।

7 नाड़ी दोष, राशि दोष, षडष्टकमयोग

 

 

2 COMMENTS

  1. ज्योतिष के बारे में तो मुझे ज्ञान नहीं है| इसलिए इस बारे में कुछ भी कहना अनुचित ही होगा, लेकिन दाम्पत्य विवादों के कारणों के बारे में जरूर मुझे लम्बा अनुभव है और मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि भारत में नब्बे फीसदी जोड़े असंतुष्ट हैं! उनका जीवन एक अवंछित समझौते के तहत चल रहा है! जिसके पीछे “बेमेल विवाह” और “नकारात्मक विचारधारा” तो मूल में है ही, साथ ही साथ असंतोष या विवाद का सबसे बड़ा कारण है “अंतरंगता” और “सेक्स”! जिसमें एक दुसरे पर वहम या अविश्वास, अज्ञानता, अंध-धर्म-भीरुता, अधकचरा ज्ञान और परिवार के लोगों का अनुचित हस्तक्षेप शामिल हैं! निराकरण नहीं हो पाने की मूल वजह अहंकार के साथ-साथ, परिजनों का पूर्वाग्रही या बेवजह युक्तियुक हस्तक्षेप भी है! इस बारे में लिखने को बहुत कुछ है!

  2. भारत में तलाक लेने वालों का प्रतिशत इतना अधिक नहीं है,खासकर हिन्दुओंमें.अच्छा होता अगर यह लेख विदेशियों को पढाया जाता हो सकता है कि इसके अनुसार चलने से उनके यहाँ तलाकों की संख्या कम हो जाती.

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