लद्दाख के कचरा प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका

इस बारे में 47 वर्षीय गृहिणी जेरिंग डोल्मा जो अमा सोग्स्पा की सदस्य हैं उन्होंने बताया कि “वे कचरे को अलग किए बिना ही इकट्ठा करती हैं और जलाती हैं। क्या वह स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर कचरे को अंधाधुंध जलाने के प्रभावों को जानती हैं? पूछने पर उन्होने कहा ‘नहीं’। वह वास्तव में यह जानकर अचरज में थी कि प्लास्टिक जलाने पर खतरनाक रासायनिक पदार्थों का उत्सर्जन होता है।

जेवांग डोल्मा

 

खूबसूरत लद्दाख खुबसूरत जम्मू कश्मीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पृथ्वी पर सबसे ऊँचे और सूखे आवासीय स्थानों में से एक है। फिर भी सदियों से समृद्ध और आत्मनिर्भर संस्कृति का घर रहा है। 1970 में विकास के साथ यहां कई अच्छे और बुरे बदलाव आए। परंतु पर्यावरण में सबसे बड़ा बदलाव आया। आज जहाँ विकास के कारण लोगो को हर सुख-सुविधा उपलब्ध हो रही है वही दूसरी ओर इसका दुष्प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। विकास के कारण पर्यावरण के समक्ष बड़ी समस्या कूड़ा करकट के प्रबंधन की है। समाज के विकास के साथ यह समस्या एक अहम मुद्दे के रूप में उभर कर सामने आ रही है। जो समाज और समाज के सदस्यो की आदत और खपत को भी दर्शाता है।

पिछले कुछ वर्षों से, लद्दाख, ज्यादातर घरेलू पर्यटकों के आकर्षण केंद्र रहा है। साल 2009 में आई 3 ईडियट फिल्म के कारण यहां की खूबसूरती लोगो के सामने आई। कारणवश पर्यटकों का आना जाना बढ़ा है लेकिन साथ ही बढ़ी है चुनौतियां। क्योंकि पर्यटकों के द्वारा डिब्बा बन्द भोजन के प्लास्टिक और लिफाफों के उपयोग से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। लेह जैसे पर्यटक केंद्रित शहर में कचरे का प्रबंधन सबसे बड़ा मुद्दा है। जिसका मुख्य कारण है खपत के अनुसार बेकार कचरा प्रबन्धन प्रथा और प्रणाली। दुर्भाग्य से, बेकार सामग्री और प्रबंधन के संदर्भ में बुनियादी सुविधाओं की अभी भी कमी है। ‘बम गार्ड’, नामक जगह जो लेह से अधिक दूर नहीं है, ‘दुनिया के सबसे ऊँचे कचरा डंप’ के रूप में जाना जाता है। अभी तक, लेह शहर के निवासियों से एकत्र किये जा रहे कचरे से भर जाता है।

जबकि पश्चिमी लद्दाख से 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित “फ्यांग” नामक गांव में स्थिति अलग है। 12 किलोमीटर तक फैले हुए 437 परिवार वाले इस गांव की जनसंख्या लगभग 2000-2500 तक है। और साक्षरता दर 43 % है। कृषि और सरकारी नौकरी गांव की आजीविका का मुख्य स्रोत है। लेह शहर में जहां भारी मात्रा में कचरा उत्पन्न हो रहा है वहीं फ्यांग में कचरा प्रबंधन की सुविधा उपलब्ध है।

गांव बहुत साफ है और इसका श्रेय गांव की महिला सफाई कर्मचारीयों जिसे लद्दाखी भाषा में “अमा सोग्सपा” कहते हैं को जाता है जिन्होंने गांव की सफाई का बीड़ा उठाया और नियमित रूप से गांव की सफाई करती हैं।

फ्यांग की तरह लद्दाख के लगभग हर एक गांव में “अमा सोग्सपा” है। “अमा सोग्सपा” की भूमिकाएँ लद्दाख की परंपरा और संस्कृति के संरक्षण में, महिला सशक्तिकरण में, सफाई अभियान आयोजित करने में महत्वपूर्ण हैं परन्तु सीमित नहीं। कचरा प्रबंधन के अतिरिक्त “अमा सोग्सपा” ने आत्मनिर्भर खेती और पर्यटन पर भी ध्यान दिया है। उनका समूह पारंपरिक कौशल जैसे बुनाई, कताई, प्राकृतिक डाई, आदि कामों को बढ़ावा देता है। .हाल ही में महिलाओं के इस समूह ने प्रमुख सामाजिक बुराइयों जैसे दहेज प्रथा, शराब और धूम्रपान जैसी बुराइयो के खिलाफ जागरूकता पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

फ्यांग गाँव की हमारी यात्रा पर, हमने कुछ ग्रामीणों से बात की, जिसमें कचरा प्रबंधन में अमा सोगस्पा की भूमिका के बारे जानना चाहा।

इस बारे में 47 वर्षीय गृहिणी जेरिंग डोल्मा जो अमा सोग्स्पा की सदस्य हैं उन्होंने बताया कि “वे कचरे को अलग किए बिना ही इकट्ठा करती हैं और जलाती हैं। क्या वह स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर कचरे को अंधाधुंध जलाने के प्रभावों को जानती हैं? पूछने पर उन्होने कहा ‘नहीं’। वह वास्तव में यह जानकर अचरज में थी कि प्लास्टिक जलाने पर खतरनाक रासायनिक पदार्थों का उत्सर्जन होता है। जिससे मालुम हुआ कि ये पर्यावरण और स्वच्छता की परवाह तो करते हैं, लेकिन विभिन्न प्रकार के कूड़े को अलग और प्रबंधित करने के बारे में जागरूक नही हैं। डोलमा ने बताया कि उनकी धारणा यह थी कि प्लास्टिक को जलाकर दफनाना यह सिर्फ उनके मूल रूप में दफन करने से बेहतर है। उन्हें जलती हुई प्लास्टिक से उत्सर्जित धुएं और धूम्रपान के हानिकारक प्रभावों के बारे में भी पता नहीं है। इसके अलावा, डिस्पोज़ल के बारे में जागरूकता की कमी के कारण, गाँव वाले केवल गाँव की शारीरिक सफाई को महत्वपूर्ण मानते हैं; उनके पास ‘वायुमंडलीय सफाई’ की कोई जानकारी नही है।

अन्य कई महिलाओं ने भी कचरा प्रबंधन के प्रति कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया दी जिससे यह बात स्पष्ट हो गई कि ये महिलाएं गांव को साफ रखने के लिए चिंतित तो रहती हैं परंतु कचरे के सही प्रबंधन के प्रति पूरी तरह अब भी जागरुक नही हैं।

कचरे की समस्या से निपटने के लिए आवश्यक है की इसे बाद में कैसे प्रबंधित करें। इस बारे में फ्यांग के ग्रामीणों में सार्वजनिक शिक्षा के माध्यम से जागरूकता पैदा करना जरुरी है। ऐसा करने के लिए स्थानीय विकल्प बनाने के अलावा क्षेत्रीय स्तर पर सरकारी नीति में भी परिवर्तन की अवश्यकता है। इसके अलावा, फ्यांग में न केवल बड़े पैमाने पर इसकी शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए बल्कि पुरे लद्दाख में कचरा प्रबंधन हेतू कानून और नियमों को लागू किया जाना चाहिए। ताकि अधिकांश चीजें सुरक्षित और आर्थिक रूप से रीसायकल कम्पोस्ट किये जा सकते है।

हम घर के बागानों में स्वस्थ भोजन उगाने, प्लास्टिक की थैली के बजाय कपड़े के बैग का उपयोग, भोजन और पेय पदार्थों को प्लास्टिक के डिब्बों में पैक करने की जगह प्राकृतिक सामग्री से बनाए गए पैकेट में बंद करके बेचने का प्रयास करें ताकि पर्यटकों के सामने भारतीय हस्त शिल्प कला का भी प्रर्दशन हो।

हमें यह नही भूलना चाहिए कि की लद्दाख परिस्थितिक रूप से नाजुक और संवेदनशील है ऐसे में अगर हम अगली पीढ़ियों को स्वच्छ और प्राचीन लद्दाख में खुश देखना चाहते हैं तो शुरुआत आज से और अभी से करनी होगी। निसंदेह अमा सोग्सपा के रुप में महिलाओं का यह समूह संपूर्ण लद्दाख को साफ और स्वच्छ बनाने में मह्तवपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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