समाज

प्रेम संबंध बन रहे अपराध की बड़ी वजह


ज्ञान चंद पाटनी
 
वरिष्ठ पत्रकार

  देश में बढ़ते अपराधों की एक प्रमुख वजह प्रेम संबंध, लिव-इन रिलेशनशिप और विवाहेतर संबंध भी हैं। सरकारी आंकड़े और पुणे के लोहागढ़ किले में सामने आई हालिया घटना इसका प्रमाण मानी जा सकती है। इस मामले में एक युवती पर अपने मंगेतर की हत्या का आरोप लगा। इसको पहले दुर्घटना बताने की कोशिश की गई, बाद में पुलिस ने पूरा मामला खोला। यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि उस गहरे संकट की ओर संकेत करती है जिसमें स्त्री पुरुष संबंध, भावनात्मक अस्थिरता और अपराध एक-दूसरे में जुड़े हुए नजर आ रहे हैं।  
  पिछले कुछ दशकों में भारतीय समाज में संबंधों को लेकर सोच व्यापक रूप से बदली है। पहले शादी—विवाह जैसे संबंध परिवार और समाज की कठोर सीमाओं में होते थे। यौन संबंधों में मर्यादा को महत्व दिया जाता था, लेकिन अब अराजकता की स्थिति है। युवा वर्ग में नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  अब ऐसा वर्ग भी बन चुका है जो यौन संबंध बनाने के लिए शादी को जरूरी नहीं मानता। गर्ल फ्रेंड—बॉयफ्रेंड बनाने का चलन सामान्य हो चुका है। यह फ्रेंडशिप कब सीमा लांघ जाए और कब टूट जाए पता ही नहीं चलता। इस तरह ब्रेक अप और एक्स फ्रेंड—एक्स बॉयफ्रेंड जैसे शब्द भी सामान्य हो गए हैं। ब्रेक अप, एक ही समय में कई संबंध, छुपा हुआ प्रेम, झूठ बोलकर शादी या सगाई जैसे मामले मानसिक विकृति और अपराध के कारण बनते हैं।
  पुणे के लोहागढ़ किले की घटना केवल एक सनसनीखेज खबर नहीं है। यह बताती है कि रिश्ते में यदि ईमानदारी न हो, तो वह रिश्ता जानलेवा साबित हो सकता है। कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता। अपने मंगेतर को ट्रैकिंग के बहाने पहाड़ पर ले जाकर खाई में धकेल देना दिखाता है कि अपराध केवल आवेग का परिणाम नहीं था, बल्कि उसमें योजना, छल और झूठ भी शामिल था। युवती ने पहले इसे दुर्घटना बताने की कोशिश की, जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि अपराध के बाद उसे छिपाने की मानसिकता भी मौजूद थी। जब कोई व्यक्ति किसी के साथ सगाई या विवाह के लिए तैयार हो और किसी दूसरे के साथ संबंध रखे, तो वह छल का सहारा लेता है। यह छल गंभीर अपराध में भी बदल जाता है।
  भारत में प्रेम संबंधों के कारण होने वाली हत्याओं का ग्राफ देखकर सहज ही समस्या की गंभीरता का पता लग जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार प्रेम संबंधों के कारण देशभर में वर्ष 2020 में 1,443,  वर्ष 2021 में 1,566, वर्ष 2022 में 1,401, वर्ष 2023 में 1,441 और वर्ष 2024 में 1,391 हत्याएं हुईं। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मामलों में तो महिला और उसके प्रेमी ने पति को रास्ते से हटाने के लिए सुपारी गैंग को काम पर रखा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऐसे कई मामले सामने आए जिनमें प्रेमी के साथ अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिए ‘धोखा देने वाले’ जीवनसाथी ने ही अपने साथी की हत्या कर दी।
  आज के समय में कई अपराधों की जड़ भावनात्मक अपरिपक्वता और रिश्तों में छल है। पूर्व प्रेमी के साथ जुड़ाव, लिव इन रिलेशनशिप और विवाहेतर संबंधों में यह जोखिम और बढ़ जाता है। ऐसे ज्यादातर संबंध झूठ पर टिके होते हैं और व्यक्ति दोहरा जीवन जीता है। ऐसा व्यक्ति हर समय तनाव में रहता है। संबंध सार्वजनिक होने के डर के चलते कई बार हत्या या आत्महत्या के मामले सामने आते हैं। नैतिक पक्ष को दरकिनार कर दें तो भी यह मानना पड़ेगा कि ऐसे संबंध अपराधों को बढ़ावा देते हैं। पुणे की घटना से साफ है कि ऐसे मामलों में महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। इन वारदातों के पीछे अचानक भड़का क्रोध नहीं, बल्कि लंबी योजना, छिपी हुई मंशा और अपराध को अंजाम देने की तैयारी होती है।
  देखा गया है कि महिलाएं अक्सर सीधे बल प्रयोग की बजाय धोखे, अवसर और तीसरे व्यक्ति की मदद का सहारा लेती हैं। कई मामलों में वे अपने साथी पर तब हमला करती हैं जब वह नींद में हो या सावधान न हो। कुछ मामलों में वे अपने प्रेमी या किसी सहयोगी को भी इस साजिश में शामिल कर लेती हैं। पुणे का मामला भी इसी तरह का नजर आता है। इन हत्याओं के पीछे सबसे आम कारण ईर्ष्या, बेवफाई, पुराने रिश्ते को छिपाने की कोशिश और  बाधा बनने वाले साथी को हटाने की इच्छा होती है। कई बार आरोपी यह मान लेते हैं कि अलग होने, तलाक लेने या रिश्ता खत्म करने का कानूनी और सामाजिक रास्ता कठिन है, इसलिए हत्या को वे आसान विकल्प समझ लेते हैं। हत्या की जिन घटनाओं में महिलाएं शामिल होती हैं, वे भी उतनी ही सुनियोजित, क्रूर और जटिल हो सकती हैं जितनी पुरुष अपराधियों की। इन मामलों को समझने के लिए केवल लिंग आधारित धारणा काफी नहीं है। ऐसे मामलों में अपराधी की मानसिकता, योजना, नशा, ईर्ष्या और मानसिक स्वास्थ्य को भी गंभीरता से देखना होगा।
 भारतीय समाज में परिवार आज भी महत्वपूर्ण है। ज्यादातर परिवारों  में युवा अपनी भावनाएं घर में नहीं कह पाते। वे उन्हें छिपाते हैं। यही छिपाव आगे चलकर दोहरे जीवन का आधार बनता है। परिवार का काम केवल रोकना नहीं, समझाना भी है। घरों में रिश्तों, सहमति, सम्मान और भावनात्मक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत होनी चाहिए। मुश्किल यह है कि स्कूल—कॉलेजों में गणित, विज्ञान, इतिहास जैसे विषयों की पढ़ाई तो होती  है, लेकिन रिश्तों में संवाद कैसे करना है, असहमति कैसे संभालनी है, भरोसा कितना जरूरी है जैसी बातें नहीं सिखाई जातीं। यह समझना आवश्यक है कि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं। जो व्यक्ति अपने संबंधों में ईमानदार नहीं है, वह खुद के ही नहीं, दूसरों के जीवन को भी खतरे में डालता है। 

ज्ञान चंद पाटनी