संतों के समक्ष हार चला था असहिष्णु इस्लाम

दीर्घकाल तक इस्लाम की आंधी से हिन्दुस्थान ने टक्कर ली है। इस प्रक्रिया में जहां एक ओर हिंदू समाज को मर्मांतक पीड़ा मिली और उसका सामाजिक एवं आर्थिक जीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया वहीं इस्लाम को भी हिंदुत्व के उदात्त विचारों ने अपने रंग में गहरे रंग देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। भक्ति आंदोलन को अगर इस रूप में देखें तो उस कालखण्ड में एक बार ऐसा लगने लगा था कि इस्लाम का असहिष्णु जीवन प्रवाह भक्ति की महान सुरसरिता में समाहित हो जाएगा।

संतों के निर्मल और साधनापूर्ण जीवन ने देश में हमेशा सभी को प्रभावित किया। उनके चिंतन, आदर्श व्यवहार, सेवाभाव, त्यागमय जीवन और भगवद्भक्ति ने एक ओर जहां हिंदुओं में कोई भेदभाव नहीं माना वहीं इस्लाम को मानने वाले भी इसके आकर्षण में खिंचे चले आए। इन संतों के सत्संग, भजन, कीर्तन, प्रवचन आदि कार्यक्रमों में ऐसी रसधारा बहती थी कि जो इसके निकट आया वही उस में सराबोर हो गया। भक्ति को कभी कोई भेदभाव स्वीकार नहीं था। इसी के प्रभाव में आकर बहुत से मुसलमान भी हिंदू संतों के शिष्य बन गए और संतों के समान ही जीवन जीने लगे। मध्यकाल में हम देखें तो पाएंगे कि ऐसे हजारों मुस्लिम संत थे जिन्होंने हिंदुत्व के अमर तत्व को अपने इस्लाम मतावलंबियों के बीच बांटना शुरू कर दिया था। यहां हम कबीर, संत रज्जब, संत रोहल साहेब और संत शालबेग के अतिरिक्त ऐसे संतों की चर्चा करेंगे जिन्होंने भारतीय इस्लाम को एक नवीन चेहरा दिया। इस्लाम के परंपरागत असहिष्णु चेहरे से कहीं अलग भक्ति के मधुर रस से आप्लावित और सभी को आनंद देने वाला यह चेहरा था।

सोलहवीं सदी में रसखान दिल्ली के समृद्ध पठान परिवार से ताल्लुक रखते थे। लेकिन उनका सारा जीवन ही कृष्ण भक्ति का पर्याय बन गया। लोकपरंपरा में कथा आती है कि एक बार वे गोवर्धनजी में श्रीनाथ जी के दर्शन को गए तो द्वारपार ने उन्हें मुस्लिम जानकर मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया। भक्त रसखान तीन दिनों तक बिना कुछ खाए-पिए मंदिर के पास पड़े रहे और कृष्ण भक्ति के पद गाते रहे। बाद में लोगों को पता चला कि ये तो कृष्ण को अनन्य भक्त हैं। गोस्वामी विट्ठलनाथ जो को रसखान की कृष्णभक्ति के बारे में पता चला तो उन्होंने उन्हें बाकायदा गोविन्द कुण्ड में स्नान कराकर दीक्षा दी। रसखान ने भी अपना अगला जन्म भी प्रभु के श्रीचरणों में ही पाने की प्रार्थना गाई।

मानुस हों तो वही रसखान, बसौं बृज गोकुल गांव के ग्वारन।

जो पसु हौं तो कहां बस मेरौ, चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।

पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धरयो कर छत्र पुरंदर धारन।

जो खग हौं तो बसेरौ करों, नित कालिंदी कूल कदंब की डारन।।

मथुरा में यमुनातट पर रमणरेती में निर्मित इस महान कृष्ण भक्त की समाधि आज भी करोड़ों कृष्ण भक्तों के ह्दयों को लुभाती और आनन्दमय प्रवाह से भर देती है।

ऐसे ही थे बाबा फरीद। पंजाब के कोठिवाल नामक ग्राम के रहने वाले। भक्त फरीद भक्ति में तल्लीन अपनी प्रार्थना में कहते हैं- हे काग अर्थात कौवे, तू मेरा सारा शरीर चुन-चुन कर खा लेना किंतु मेरी दो आंखें मत खाना क्योंकि मुझे ईश्वर के दर्शन करने हैं- कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन-चुन मांस। दो नैना मत खाइयो, मोहि पिया मिलन की आस।।

राजस्थान के अलवर में सोलहवीं सदी में पैदा हुए संत लालदास भी मुसलमान थे। उनका जन्म मेव मुस्लिम जाति में हुआ था। लकड़हारे के रूप में उनका प्रारंभिक जीवन व्यतीत हुआ। और इसी जीवन के कारण वे साधुओं की संगत में आ गए, मुसलमान से भक्त लालदास होगए। ऊंच-नीच और हिंदू-मुस्लिम के भेद को तो उन्होंने अपने जीवन में जाना तक नहीं। कब उन्होंने मांस खाना छोड़ा और नमाज भुला दी, ये भी उन्हें पता न चला। गांव-गांव हरि का सुमिरन करने का उपदेश करने लगे। हिरदै हरि की चाकरी पर, घर कबहुं न जाए। ऐसे पद गाते हुए उन्होंने लालपंथ की नींव रखी और भरतपुर क्षेत्र के नगला ग्राम में उनकी समाधि आज भी लालदासी पंथियों की प्रमुख दर्शन स्थली है।

भक्ति आंदोलन और मुस्लिम राजवंश

हिंदू भक्ति आंदोलन ने सामान्य मुस्लिमों से लेकर मुस्लिम सम्राटों तक के परिजनों को हिलाकर रख दिया। रहीम, अमीर खुसरो और दारा शिकोह इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। और केवल पुरूष ही नहीं मुस्लिम शहजादियां भी भक्ति के रंग में रंग गईं। इसी कड़ी में औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसां बेगम तथा भतीजी ताज बेगम का नाम बहुत आदर से लिया जाता है।

इनमें ताज़बीबी के कृष्णभक्ति के पदों ने तो पूरी मुस्लिम सियासत में ही हलचल मचा दी। ताज़ दोनों हाथ ऊंचे कर भावविभोर होकर जिस तरह से कृष्णभक्ति के पद गाती थी, उसकी तुलना मीरा के साथ सहज ही की जा सकती है। ताज़बीबी का एक प्रसिद्ध पद है-

छैल जो छबीला, सब रंग में रंगीला

बड़ा चित्त का अड़ीला, कहूं देवतों से न्यारा है।

माल गले सोहै, नाक-मोती सेत जो है कान,

कुण्डल मन मोहै, लाल मुकुट सिर धारा है।

दुष्टजन मारे, सब संत जो उबारे ताज,

चित्त में निहारे प्रन, प्रीति करन वारा है।

नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा,

वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है।।

सुनो दिल जानी, मेरे दिल की कहानी तुम,

दस्त ही बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं।

देवपूजा ठानी मैं, नमाज हूं भुलानी,

तजे कलमा-कुरान साड़े गुननि गहूंगी मैं।।

नन्द के कुमार, कुरबान तेरी सुरत पै,

हूं तो मुगलानी, हिंदुआनी बन रहूंगी मैं।।

तो कृष्णभक्ति में विह्वल ताज़ मुगल सल्तनत से जुड़ी होने के बावजू़द हिंदुवानी रौ में बहने की प्रतिज्ञा करती है। ताज़ ने बाद में गोस्वामी विट्ठलनाथ से विधिवत् वैष्णव मत की दीक्षा ली।

ऐसे ही थे भक्त कारे बेग जिनका पुत्र मरणासन्न हो गया तो उसे मंदिर की देहरी पर लिटाकर वह आंसू बहाते हुए कृष्ण से कहने लगे-

एहौं रन धीर बलभद्र जी के वीर अब।

हरौं मेरी पीर क्या, हमारी बेर-बार की।।

हिंदुन के नाथ हो तो हमारा कुछ दावा नहीं,

जगत के नाथ हो तो मेरी सुध लिजिए।

काशी में जन्मे थे कबीर से कमाल। कमाल साहेब का अड़ोस-पड़ोस और सगे-संबंधी मुसलमान थे लेकिन कबीर साहेब के कारण उन्हें घर में बचपन से अलग माहौल मिला था। बचपन में ही भक्ति की धार उनमें प्रबल हो गई और राम के प्रति वे अति आसक्त हो गए। गाने लगे-

राम नाम भज निस दिन बंदे और मरम पाखण्डा,

बाहिर के पट दे मेरे प्यारे, पिंड देख बह्माण्डा ।

अजर-अमर अविनाशी साहिब, नर देही क्यों आया।

इतनी समझ-बूझ नहीं मूरख, आय-जाय सो माया।

मराठवाड़ा क्षेत्र में जन्में कृष्णभक्त शाही अली कादर साहेब ने तो गजब भक्तिपूर्ण रचनाएं की हैं। उन्हीं की सुप्रसिद्ध पदावली है- चल मन जमुना के तीर, बाजत मुरली री मुरली री।।

दाराशिकोह का नाम भला किसने नहीं सुना। मुगलिया सल्तनत के उत्तराधिकार संघर्ष में उन्हें अपने प्राणों का बलिदान करना पड़ा। वे शाहजहां के ज्येष्ठ पु्त्र थे लेकिन उनमें हिंदुत्व के उदात्त विचारों ने इतना ज्यादा प्रभाव डाला कि वे वेदों और उपनिषदों का अध्ययन करने लगे। उपनिषदों का ज्ञान फारसी में अनुदित हुआ तो इसके पीछे दारा शिकोह की तपस्या थी जो उन्होंने प्रयाग और काशी में गंगा तट पर रहते हुए की थी। उनके हिंदुत्व प्रेम के कारण ही औरंगजेब ने उनका वध करवा डाला।

अकबर के नवरत्नों में एक अब्दुर्ररहीम खानखाना को भी जहांगीर ने इसी कारण परेशान किया। अपने जीवन की संझाबेला में वे चित्रकूट आ गए और भगवान राम की भक्ति करने लगे। चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवधनरेश, जा पर विपदा परत है, सो आवत एहि देश।

राम और कृष्ण दोनों के प्रति ही रहीम के मन में गहरा अनुराग था। वे मुसलमान थे लेकिन उन्होंने सच्चे अर्थों में भारत की सहिष्णु परंपरा का अवगाहन किया। मुगलिया सल्तनत में एक समय उनका प्रभाव वर्तमान प्रधानमंत्री और केबिनेट सचिव जैसा हुआ करता था। लेकिन उनका निर्मल मन सदा ही राजनीति के छल-प्रपंचों से दूर भगवद्दभक्ति में रमता था। यही कारण है कि जो पद, दोहे और रचनाएं वह कर गए वह हमारी महान और समृद्ध विरासत का सुंदर परिचय है।

भारतीय जीवनदर्शन और मूल्यों को रहीम ने व्यक्तिगत जीवन में न सिर्फ जिया वरन् उसे शब्द देकर हमेशा के लिए अमर कर दिया। एक बार किसी ने रहीम से पूछा कि यह हाथी अपने सिर पर धूल क्यों डालता है तो रहीम ने उसे उत्तर दिया- यह उस रजकण को ढूंढता फिरता है जिसका स्पर्श पाकर अहिल्या तर गई थी।

धूर धरत निज सीस पर, कहु रहीम केहि काज।

जेहि रज मुनिपत्नी तरी, सो ढूंढत गजराज।

गुरू नानक के शिष्य मरदाना, संत रविदास के शिष्य सदना, महाराष्ट्र के संत लतीफ शाह, अमेठी के पास जायसी ग्राम के मलिक मोहम्मद जायसी, नर्मदा तट पर रमण करने वाले संत बाबा मलेक, गुजरात के ही भक्त बाबा दीन दरवेश, दरिया साहेब, अनाम जैसे संत यारी साहेब, ग्वालियर के संत बुल्ला शाह, मेहसाणा के रामभक्त मीर मुराद, नज़ीर अक़बराबादी, बंगाल के संत मुर्तजा साहेब, और तो और सम्राट शाहजहां तक के जीवन में भक्ति आंदोलन ने ऐसी लहर पैदा की इनके पग भक्ति के महान पथ पर चल पड़े।

यह भक्ति की भावना सभी को आत्मसात करने वाली थी। आज़ भी जब हम डागर बंधुओं से ध्रुवपद सुनते हैं तो हमें उस भक्ति परंपरा का अनायास स्मरण हो उठता है जिसने इस्लाम के तूफान को गंगा की लहरों के सामने नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया था।

यही कारण था कि इस्लाम के हिंदुत्व के साथ बढ़ते तादात्मीकरण ने कट्टरपंधी मुल्लाओँ की नींद हराम कर दी। मौलाना हाली ऐसे ही एक कट्टरपंथी मुसलमान थे जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम समन्वय के इस महान कार्य पर चिंता जताई। उन्होंने कहा-

वो दीने हिजाजी का बेबाक बेड़ा,

निशां जिसका अक्साए आलम में पहुंचा,

मज़ाहम हुआ कोई खतरा न जिसका,

न अम्मां में ठटका, न कुलज़म में झिझका,

किए पै सिपर जिसने सातों समंदर,

वो डुबा दहाने में गंगा के आकर।।

यानी मौलाना हाली दुःख प्रकट करते हुए कहते हैं कि इस्लाम का जहाज़ी बेड़ा जो सातों समुद्र बेरोक-टोक पार करता गया और अजेय रहा, वह जब हिंदुस्थान पहुंचा और उसका सामना यहां की संस्कृति से हुआ तो वह गंगा की धारा में सदा के लिए डूब गया।

मुस्लिम समाज़ पर हिंदू तथा मुस्लिम संतों की भगवद्भक्ति का इतना प्रभाव बढ़ता गया कि इस्लामी मौलवी लोगों को लगने लगा कि इस प्रकार तो हिंदुत्व इस्लाम को निगल जाएगा। इस कारण प्रतिक्रिया में आकर भारतीय मुसलमान संतों पर मौलवियों ने कुफ्र अर्थात नास्तिकता के फतवे ज़ारी कर दिये। मौलानाओं ने साधारण मुसलमानों को सावधान किया-

हमें वाइजों ने यह तालीम दी है।

कि जो काम दीनी है या दुनियावी है,

मुखालिफ़ की रीस उसमें करनी बुरी है,

निशां गैरते दीने हक का यही है,

न ठीक उसकी हरगिज़ कोई बात समझो,

वह दिन को कहे दिन तो तुम रात समझो।।

तो इस प्रकार अठारहवीं सदी आते आते हिंदु-मुस्लिम समन्वय की महान भक्ति परंपरा पर कट्टरपंथियों का ग्रहण लगना तेज़ हो गया। धूर्त और चालाक अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुस्लिमों में पनप रहे प्रेम को भी अपने लिए गंभीर खतरा माना। येन-केन-प्रकारेण वे मुसलमानों को उन हिंदुओं से सांस्कृतिक तौर पर भी अलग करने में सफल हो गए जिन हिंदुओं के साथ मुसलमानों का नाभि-नाल का सम्बंध था। आज यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि यदि अंग्रेज़ भारत में न आए होते तो निर्मल भक्ति, प्रेम तथा संतों के पवित्र एवं त्यागमयी आचरण के दैवीय आकर्षण से करोड़ों मुसलमान अपने पुरखों की संस्कृति, धर्म और परंपरा से उसी भांति जुड़ जाते और आनन्द मानते जैसे एक बच्चा अपनी मां की गोदी में सुख का अनुभव करता है।

लेखक: डॉ. कृष्णगोपाल

संपादकीय टिप्पणीः कृष्णगोपालजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवन समर्पित प्रचारकों की टोली से जुड़े यशस्वी और मेधावी प्रचारक हैं। वनस्पति विज्ञान में शोध करने के उपरांत उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रकार्य के लिए अर्पित किया। संप्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजनानुसार वह पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्र प्रचारक का दायित्व निर्वाह कर रहे हैं। व्यक्तिरूप से वे गहन जिज्ञासु और अध्यावसायी हैं। स्वदेशी, डंकेल प्रस्तावों पर उन्होंने करीब 15 वर्ष पूर्व विचारपूर्वक अनेक पुस्तकों का लेखन किया। कालांतर में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन पर अत्यंत सारगर्भित पुस्तक की रचना की। वर्तमान लेखमाला उनके द्वारा लिखित पुस्तक भारत की संत परंपरा पर आधारित है, यद्यपि इसमें कुछ नए आयाम भी उन्होंने जोड़े हैं।

18 thoughts on “संतों के समक्ष हार चला था असहिष्णु इस्लाम

  1. मुझे भी कुशवाहा ki बात मंज़ूर नहीं है., लेख के बारे में विचार तथ्यों पर आधारित होने चाहिए. यह तो व्यक्तिगत स्तर पर उतर आये. रही बात की हिन्दू एक छत के नीचे नहीं आ सके.

    अरे, कम से कम किसी को पूजा-नमाज़ पढ़ते समय क़त्ल तो नहीं कर रहे है ना. यहाँ इरान, इराक, अफगानिस्तान और पकिस्तान के हालात देखिए, हाल ही में कश्मीर में देखिए, मस्जिदों में नमाज़ पढ़ते समय भी बेगुनाहों को भूना जा रहा है. यह कहाँ की उदारता है कुशवाहा भाई. आप जानते हैं की कादीयान, अहमदिया मुसलमानों पर कितने जुल्म हो रहे हैं पकिस्तान में, शियाओं का कैसा बुरा हाल वहां बना दिया है.

    कम से कम हिन्दू पूजा-पाठ के सवाल पर एक-दूसरे का खून तो नहीं पी रहे हैं. जरा गहरे समझिए की उदारता क्या होती है.

  2. सुभाष कुशवाहा की टिप्पणी आपत्तिजनक है. इतना तर्क पूर्ण और तथ्यों से पूर्ण आलेख है यह कि इसकी कोई बात काटी नहीं जा सकती. शीर्षक भी स्पष्ट है कि संतों के सामने असहिष्णु इस्लाम हार चला था. आलेख में उधृत जितने भी संत हैं वे सभी इस्लाम के मानने वाले हैं, यह बात महत्वपूर्ण है यहाँ, इन संतों ने इस्लाम के जिहादी मत से नाता तोड़ कर उस रास्ते पर इस्लाम को लाने की कोशिश की जिसके कारण इस्लाम का भारतीय संस्करण निर्मित हो सका. इसी में से सूफी मत पैदा हुआ जिसका अरबी इस्लाम से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था.

    अब इतने विचारपूर्ण और सुन्दर, भारत की भक्ति-धारा के आधार पर सब में एकता बढ़ाने वाले आलेख को घटिया कहना श्री कुशवाहा की अज्ञानता, पूर्वाग्रह और घटिया मानसिकता को प्रदर्शित करता है.

  3. इस आत्ममुग्धकारी कल्याणकारी पोस्ट को मैंने अपने पास सहेजकर रख लिया है….यह मेरे लिए कभी पुरानी नहीं पड़ेगी…और इसके लेखक के उच्च पवित्र विचारों को मैं नमन करती हूँ…इस सुन्दर आलेख के लिए ह्रदय से आभारी हूँ…

  4. इतने घटिया विचार वाले लेख आप छापते हैं, यह बात मैंने बहुत जल्द जान लिया । हाल ही मैंने आपको एक लेख भेजा था । तब तक मुझे आपकी विचारधारा का भान न था । भविष्य में ऐसी कोई गलती न होगी ।
    मानव कल्याण की बात करने वाले सारे धर्मो का यथार्थ मनुष्य विरोधी, प्रेम विरोधी और प्रकृति विरोधी रहा है तथापि सच्चाई यह है कि भक्ति काल का उदय ब्राह्मणवाद, पाखण्डवाद और कट्टरतावाद के प्रतिकार में प्रेम के प्रचार के लिए हुआ था । सूफिमत भी इस्लाम धर्म से निकला अद्वैतवादी दर्शन है जहां हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति एकाकार हो जाती है, जहां धर्मों की विजय नहीं होती,प्रेम की होती है । तभी विभिन्न मतावलम्बी मजारों और ऊसों पर अनायास खीचें चले आते हैं । सन्त आप किसे कहते हैं ? क्या वह दूसरे धर्मों को जितने चला है ? इतना दम्भ ? तभी तो हिन्दू आजतक एक छत के निचे न आ सके । उदार बनना सीखिए । आप का धर्म आप में उदारता न ला सका, आप दूसरों को क्या देंगे जनाब !
    सुभाष चन्द्र कुशवाहा

  5. जिस इस्लाम के इतने पाबंदों ने भक्ति को गले लगाया हो , उसे आप कट्टरपंथी बता रहे हो और इस बुनियादी बात को गोल किये दे रहे हो की भक्ति आन्दोलन तो खडा ही हुआ था, हिन्दू ब्राह्मणवादी कट्टरपंथ के खिलाफ. और सूफी आन्दोलन को भी गोल कर दिया आपने ?करोडो हिन्दू जो मजारों पर जाते रहें हैं , क्या वे हिदुत्व की हार का सबूत देते हैं? अवाम तो मुहब्बत के पैगाम के पीछे भागती है, हिन्दू मुसलमान नहीं देखती. लेकिन आप जैसी मानसिकता वाले लोग हर चीज को धर्मों की लड़ाई और हार जीत के सवाल में बदल देते हैं. और इतिहास से ठीक उलटे नतीजे निकालते हैं.कबीर ने आप ही जैसे लोगों के लिए कहा था- अरे इन दोउन राह न पायी/ हिन्दुव्न की हिन्दुआयि देखि, तुरकन की तुरकाई .अच्छा और प्रभावी लेख है। लेखक को कोटि-कोटि साधुवाद।

  6. लेखक से कहिये अगर इतिहास पढने का इतना ही शौक है तो अछे से पढ़े इतिहास की भक्तिधारा का अछे से अध्ययन करे उसके बाद लेख लिखे जिन साधुओं की आपने चर्चा की है वो सब इस्लाम को त्यागकर हिन्दू नहीं बने थे उन्होंने सभी धर्मो को अपने प्रभु को पाने का याद करने का साधन माना था सभी धर्म उनके लिए बराबर थे
    इसलिए अगर इतिहास का ज़िक्र करना है तो अछे से करें लोगो को बहलाए ना

  7. हिन्दी साहित्य ds bfrgkl की बुनियाद वैष्णव साहित्य की कांक्रीट से भरी गयी थी। इन बारीक रोडि+यों में जैन और सिख मतावलंबियों की रागात्मकता का चूना-मिटटी नहीं मिलाया गया था। यदि बुनियाद में चूना-मिटटी के साथ मसाला बनाते समय सिद्धों और नाथों की रचनाओं को भी सम्मिलित कर लिया जाता तो आज हम वैष्णव साहित्य की बुर्जों पर जैन] सूफी और सिख साहित्य की नक्काशी का भी आनंद लेने में पीछे नहीं रहते और साहित्य एक पृथक धर्म के रूप में तमाम मत-मतान्तरों से ऊपर उठ कर अपनी एक नयी परिभाषा को परिभाषित कर रहा होता।
    उसकी ईंटों के ब्रांड-नेम निश्चय ही वैष्णo] ]जैन] सूफी] सिख] सगुण या निर्गुण नहीं होते। यदि साहित्य धर्म के रूप में उभरता तो बौध्ध धर्म की अविरल धारा क्रान्ति की बाढ़ के बीच वैष्णव साहित्य की हवेली में दरारें डाल कर बड़े-बड़े चिंतकों और विचारकों को बहा कर गलियारों में न ले आती] जिन पर कथित निम्न जातियों के पांव पड़ते थे। इन गलियारों और चौपालों के वारिस वे ही लोग थे जिनकी भाषा शास्त्रkचार्यों की भाषा जैसी नहीं थी ] न ही उनका तत्व-चिंतन इतना गूढ़ था जो ब्रह्म] जीव और जगत को सही तौर पर परिभाषित न कर पाता हो। वे तो साधारण जातियों के अलाव से तप कर निकले थे और जनता की भाषा में उनसे संवाद करते थे। संवाद की यही साधारण भाषा बहती हुई सूफियों] नाथों और दरवेशों के मठों] दरगाहों के हुजरों और खानकाहों तक जा पहुँची] जिसने कालांतर में एक नए युग का सूर्योदय किया।
    इस युग में जिस निर्गुण काव्य की सर्जना हुbZ] वह संत और सूफी काव्य के वर्गीकरण से मूलतः मुक्त-काव्य सि) हुआ जिसकी दार्शनिक व्याख्या ब्रह्मवाद से लेकर अद्वैतवाद तक की गयी। नतीजा ;g हुआ कि जो बौढ्धिक जाति का भाषायिक-साहित्य संवत १२५० से १५५० तक नाथों] सूफियों और संतों dh मार्फ़त जातेता झील में एकत्र हुआ] उसे हवेलियों के तत्व-चिंतकों ने उलीचने की कोशिशें नहीं कीं] क्योंकि तत्कालीन बौद्धिक वर्ग इस दौरान की भाषायिक क्रान्ति को मान्यता देने के लिए कतिपय तैयार नहीं था।
    वह यg समझने के लिए भी rS;kj नहीं था कि कौमों और समुदायों के अपने dqN vyx विश्वास] आस्थाएं और अकीदे होते हैं] लेकिन जीने के तरीके और तरीकों से जन्मी समस्याएं समान होती हैं] जिन्हें अलग-अलग धर्मों में नहीं बांटा जा सकता है। शासक वर्ग का एक ही धर्म होता है] शासन और सत्ता पर कब्ज़ा बनाए रखना। वह शासक चाहे मौर्य हो या अफगान] तुर्क हो या जाट] लोदी हो या गुर्जर, मुग़ल हों या राजपूत, ब्राह्मण हो या शूद्र, शासक अत्याचार करता है और शासित अत्याचार सहता है। जब इन दोनों में टकराव की स्थिति जन्म लेती है तो क्रान्ति की आंधी चलने लगती है और आंधियां कभी भी दिशाहीन नहीं हुआ करती हैं।
    तो, जब सामाजिक और सांस्कृतिक क्रान्ति ने दस्तक दी तो कबीर ने खालिस हिन्दुओं के पाखंड को ही नहीं लताड़ा, उन्होंने मुसलामानों के पाखंडों पर भी हमला किया। गुरू नानक देव ने मुल्लाओं को लताड़ा तो पंडितों को भी नहीं बख्शा। उस आंधी में हमें सूफियों, संतों और जातेता साहित्यकारों की घन-गरज साफ़ सुनाई देती है।
    इस तरह यदि हम देखें तो पायेंगे कि जहाँ सूफियों ने हुमायूं पर फिकरे कसे, तो वहीं मलिक मोहम्मद जायसी ने अलाउद्दीन खिलजी को भी नहीं बख्शा। यहीं पर सूफीवाद का तत्वचिंतन हमें एक नए आसमान के नीचे लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ हम महमूद-ओ-अयाज़ का मतलब एक पंक्ति में आकर समझने लग जाते हैं। यही तत्वचिंतन के सूत्र और आस्था हमें तमाम मत-मतान्तरों से ऊपर जाकर सामान्य जनता के बीच ला खड़ा करते है, जो आमजन के रूप में शोषण का शिकार होती हैं और सीधी-नाथों, योगियों तथा शास्त्रचार्यों के बीच का अन्तर जान लेती हैं और पहचान लेती हैं कि शंकराचार्य का बौध्हिक-चिंतन गोरखनाथ] बाबा फरीद] कबीर दास] गुरू नानक और तुलसी दास से कितना पृथक और गूढ़ है। वह जान लेती है कि सूफियों कि साधना-पद्धति नाथ योगियों की साधना-पद्धति से कितनी भिन्न और सरल है जिसमें चमत्कार नहीं] यथार्थ की साँसों का नियंत्रण है। पाखंडी योगियों का तिलिस्म नहीं] आस्था,a] विश्वास और कर्म का सत] तत्वचिंतन है। उसका कारण ये था कि सूफी-संतों का तत्वचिंतन घृणा पर बसेरा नहीं Mkys हुए था। उनका मूल-मन्त्र था] प्रेम! मानव का मानव से प्रेम] जो भावभिव्यक्ति में नाथ] योगी और वैष्णव शब्दावली से इतर नहीं] केवल केव्लात्ववादी के अत्यन्त समीप था और केवलवाद का यही सिध्हांत अवतारवाद से सम्बन्ध जोड़ कर उसे इब्ने&अरबी को अपनी ओर खींच लाया।
    शा;द इसी केवलत्व के सि)kaत ने महमूद शबिस्त्री को भी आकर्षित कर उसे xqy”kus&jkt+ जैसी कृति की रचना करने पर बाध्य किया। फैजी ने नल&दमन की कथा को फ़ारसी में पिरोया। मौलाना रूमी की मसनवियों में भारतीय लोक&कथाओं के पात्र फ़ारसी के रास्ते ईरान और फिर अरब तक पहुंचे। जायसी के अखरावट] आखरी कलाम और पद्मावत ने सूफी काव्य की चिंतनधारा को नए आयाम दिए।
    एक लहर थी जो बसंत की बयार बन कर तत्वज्ञानियों के दार्शनिक चिंतन को छूती हुई सूफीवाद को जीवन्तता प्रदान करती हुई आम जनता की साँसों में घुलती चली गयी। हमीदुद्दीन नागौरी ने सिद्ध किया कि चित्त जगत के बाहर है और जगत चित्त के बाहर। साधक के चित्त में प्रवेश करते ही जगत बाहर आ जाता है और जगत में प्रवेश करते ही चित्त से बाहर आ जाता है। शेख हमीदुद्दीन नागौरी के सम्बन्ध में हिन्दी के कतिपय मुसलमान कवि (लेखक- शैलेश जैदी पृष्ठ:७०) उनके दार्शनिक चिंतन पर प्रकाश डाला गया है।
    विद्वान लेखक के अनुसार शेख साहब का वह्दतुल&वजूद के दर्शन में विश्वास था कि सृष्टि पदार्थ देखने में कितने ही क्यों न हों] यदि उनकी वास्तविकता पर विचार किया जाए तो वे मूलतः एक ही हैं। पुस्तक में समां] (जिसमें शेख हमीदुद्दीन नागौरी की काफ़ी रूचि थी)] को लेकर Qqrg&,&lykrhu के हवाले से एक किस्से का ज़िक्र किया गया है। विद्वान लेखक लिखता है कि सुलतान इल्तुतमिश के राज्यकाल में शेख नागौरी दिल्ली पधारे। वहाँ वह दिन-रात समां सुनते रहते और उसी में मगन रहते। सम्राट उनका बहुत मान-सम्मान करता था। दरबार में मुफ्तियों ने बादशाह के कान भरे तो उन्हें दरबार में बुलाकर उनसे सवाल किया गया कि समां शरीअत के विरूद्ध है या नहीं\ उत्तर मिला कि समा] आलिमों के लिए हराम है और साधकों के लिए हलाल।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि शहाबुद्दीन नागौरी का सूफी चिंतन नाथ-पंथी प्रवृतियों को आत्मसात करने वाला था। शेगनी गयी जोगिनी करी] गनी गयी को देसA अयन रसायन संचरे] रंग जो मोर ओस। तसव्वुफ़ का ये चिंतन तत्कालीन नाथ योगियों पर भी पड़ा, गोरखबानी में आए शब्द इसका प्रमाण हैं। जैसे बाबा गोरखनाथ की यह स्वीकृति कि उत्पति हिंदू जरना जोगी] अकलि परी मुसलमानीA इसका उदहारण है। इसी परम्परा के एक अन्य कवि हैं अलख दास। इनका असली नाम अब्दुल कुद्दूस गंगोही था । इन्होने दाऊद कृत चंदायन का फ़ारसी में पद्यान्वाद किया और ख़ुद भी केवलत्व के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए अपनी रचना #”nukek में इसको व्याख्यायित किया है। उन्होंने सच्चे सूफी की पहचान को परिभाषित करते हुए कहा कि जो लोग परम सत्य को प्राप्त कर लेते हैं] और bZश्वर के अलावा दूसरी सभी वस्तुवों से विमुख हो चुके होते हैं] वे ही सूफी कहलाते हैं। उनके अनुसार सच्चा मुसलमान समस्त वाह्याMम्बरों से मुक्त होता है।
    हमें सूफी संत-साहित्य में कबीर और नानक भी इसी चिंतन का सर्वत्र अलख जगाते दिखाई देते हैं। इन्हीं संतों] कवियों और दार्शिनिकों ने हमें सोच के नए आयाम दिए और हम ये समझ पाये कि मानव जीवन dh अभिव्यक्ति ही साहित्य का सहज धर्म है। इस धर्म का नाम हिन्दू&मुसलमान नहीं है।
    अमृता प्रीतम के अनुसार ये तो मैं से आगे मैं तक पहुaaWचने की यात्रा है। उस मैं तक पहुँचने की जिसमें सबसे पहले मैं की पहचान जमा होती है। जहाँ गैर सा गैर दर्द अपना हो जाता है bस प्रकार हम कह सकते हैं कि इसीलिए साहित्यकार से साहित्य का गहरा नाता स्थापित हुआ] इसे हम चिंतन का भी नाम दे सकते हैं। चिंतन जितना गहरा] जितना यथार्थ और मानव&मूल्यों की उन्नति का प्रेरक होगा] उतना ही वह आत्मीय] टिकाऊ और लोकप्रिय होगा। यूसुफ़-&जुलेखा की कहानी हो या रानी पद्मावती और रत्नसेन की कथा] जब वे अपनी आत्मा की गहराइयों के साथ आम-जन तक पहुँचती हैं तो सरहदें लाँघ जाती हैं] भले ही उनकी अभिव्यक्ति की भाषा कोई भी क्यों न रही हो। खुसरो से लेकर बुरहानुद्दीन जानम या इनसे लेकर इंशाल्लाह खां तक हिन्दी साहित्य की यात्रा कहीं भी अजानी महसूस नहीं होती] क्योंकि हिन्दी भाषा और इसके साहित्य की समृद्धि में भारत के सभी धर्मों और सम्प्रदायों ds अनुयाइयों ने समान रूप से योगदान दिया है। vehj [kqljks us [kkfydckjh esa yxHkx 12 ckj fgUnh “kCn dk iz;ksx fd;k gSA कवि रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में& खड़ी बोली को साहित्य की भाषा मुसलामानों ने ही बनाया। हिन्दी वाले अपभ्रंश का प्रभाव होते हुए एक ख़ास परम्परा में चल रहे थे और इस परम्परा का मेल अवधी और बृजभाषा से बैठता था] वह मेल खड़ी बोली से नहीं बैठता था। इस बोली की ओर ध्यान मुस्लिम कवियों का ही गया क्योंकि यg वह भाषा थी] जिससे उनकी नज+दीकी जान&पहचान हो सकती थी।

  8. जिस इस्लाम के इतने पाबंदों ने भक्ति को गले लगाया हो , उसे आप कट्टरपंथी बता रहे हो और इस बुनियादी बात को गोल किये दे रहे हो की भक्ति आन्दोलन तो खडा ही हुआ था, हिन्दू ब्राह्मणवादी कट्टरपंथ के खिलाफ. और सूफी आन्दोलन को भी गोल कर दिया आपने ?करोडो हिन्दू जो मजारों पर जाते रहें हैं , क्या वे हिदुत्व की हार का सबूत देते हैं? अवाम तो मुहब्बत के पैगाम के पीछे भागती है, हिन्दू मुसलमान नहीं देखती. लेकिन आप जैसी मानसिकता वाले लोग हर चीज को धर्मों की लड़ाई और हार जीत के सवाल में बदल देते हैं. और इतिहास से ठीक उलटे नतीजे निकालते हैं.कबीर ने आप ही जैसे लोगों के लिए कहा था- अरे इन दोउन राह न पायी/ हिन्दुव्न की हिन्दुआयि देखि, तुरकन की तुरकाई .

  9. गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में एक चौपाई लिखी है,”धर्म से विरति विरति से ग्याना,ग्यान मोक्ष प्रद वेद बखाना”,धर्म का शाब्दिक अर्थ केवल पूजा पाठ आदि से नही लिया जाता है,धर्म का मतलब होता है जिस समाज जाति कुल देश आदि जहां पर जन्म होता है,उस सामाजिक परिवेश का असर जब व्यक्ति पर होता है तो उसी के अन्दर व्यक्ति की धारणा बन जाती है,और उसी की धारणा का प्रभाव व्यक्ति के अन्दर बचपन से व्याप्त होता चला जाता है,समाज के अन्दर चलने वाले रीति रिवाज व्यवहार आदि व्यक्ति का जीवन सरोबार हो जाता है,इसे ही विरति की व्याख्या के रूप में बताया जाता है,और जब व्यक्ति किसी भी धारणा के अन्दर अपने को लगा लेता है तो वह उसी समाज या परिवेश के अन्दर अपने जीवन को मानने लगता है,उस समाज या परिवेश के अन्दर जब वह अपने अहम को प्रदर्शित करने के बाद स्थिति को प्राप्त कर लेता है तो उसके अन्दर भावना पैदा हो जाती है कि वह ही सब कुछ है,यही उसकी सन्तुष्टि का साधन समझा जाता है और यह उसके लिये मोक्ष यानी शान्ति का कारण माना जाता है,लेकिन अगर इसी चौपाई को हम जानवरों के जीवन में जोड कर देखें तो एक जानवर अपने साथी जानवरों के साथ रहता है,और अपने अपने अनुसार उस जानवरों के समुदाय में होने वाले क्रिया कलाप करता रहता है,जिस स्थान या परिवेश मे वह रहता है अपने समुदाय के लिये वह जीवन यापन के प्रति अपनी सीमा को भी बढाता जाता है,और उस सीमा के अन्दर किसी अन्य के प्रवेश के समय अपने जी जान को लगाने से भी नही चूकता है,यही भाव मनुष्य के अन्दर अगर आजाता है तो मनुष्य जो केवल परोपकार की भावना के साथ जन्म लेता है और वह अपने समुदाय या अपने स्थान के लिये लडता है तो उसकी मनुष्यता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है,मनुष्य अपने लिये कभी पैदा नही होता है,खाने के लिये भोजन और रहने के लिये स्थान की जितनी आवश्यकता एक अभाव ग्रस्त व्यक्ति को पडती है उतनी ही एक अमीर व्यक्ति को पडती है,अपनी अपनी भावनाओं के द्वारा चाहे इस्लाम को बडप्पन दिया जाये या किसी भी धर्म को,अगर उस धर्म या समाज मे मनुष्यता जैसे कारण नही है तो कोई भी धर्म या समाज अपने में बडा नही कहा जायेगा। सबसे बडा है मनुष्य धर्म और इसे ही अपनाना और प्रयोग में लाने का उपाय हर व्यक्ति को करना चाहिये।

  10. डॉ. कृष्णगोपाल के आलेख न सिर्फ ऐतिहासिक है बल्कि आज के परिप्रेक्ष्य में चिंतन कर धारण के योग्य हैं.

    कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक समारोह में मैनपुरी के कवि श्री दीन मोहम्मद दीन को उनके भक्ति रस में योगदान के लिए रसखान सम्मान से नवाजा गया है.

    कार्यकम के दौरान एक अशोभनीय बात यह दिखी की जहाँ अधिसंख्य मुस्लिम कवियों ने इसकी सराहना की तो कुछेक मुस्लिम कवियों ने दीन मोहम्मद दीन के भक्तिरस को अपना अपमान समझा. बस यहीं पर अपना उदार हिन्दुस्तान मार खा जाता है.

    स्पष्ट और एतिहासिक तथ्यपूर्ण पोस्ट के लिए पुन: बधाई स्वीकारें.

  11. एहतशाम bhai ने कुछ ठेल कहा है और कुछ जानकारी उन्हें दुरुस्त कर लेनी चाहिए, कबीर साहेब ने तो यह भी कहा था की — कंकर पाथर जोड़कर मस्जिद ली बनाय, ता चढ़ मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय. कबीर साहेब जो कह गए गहरे रूप में वही हिन्दू चिंतन है. हिन्दू कट्टरवादी पंथ नहीं है. सभी मत, मज़हब एक साथ रह सकते हैं, साथ साथ रहकर apna अपना काम, पूजा, namaz अदा कर सकते हैं. allah या ishwar को पाने के lie सभी मत-मज़हब काबिल हैं, yahi हिन्दू का sanatan vichar है.

    इस्लाम असहिष्णु है. मुस्लिम देशों में गैर मुस्लिम अपने हिसाब से नहीं जी सकते, यह इसे pramanit करता है, sabit करता है, धर्म से ज्यादा इस्लाम एक राजनितिक विचार lagta है, जहाँ मनुष्यता का sachha रूप कभी फल-फूल नहीं sakta. हिन्दू ने धर्म को rajniti से अलग रखा इसलिए हिन्दू धर्म की seema सिकुड़ती chali गई. इस्लाम bharat में किसी ख्वाजा ने नहीं phailaya, ये talwar के जोर par फैला, dusare १००० saal tak इस्लाम का राज़ भारत par रहा, phir भी आज musalmaan भारत की जनसँख्या me कुल १३ या 14 प्रतिशत hi हैं. दूसरी or हिन्दू जिसमे सिख, baudh आदि yadi जुड़ jate हैं तो हिन्दू यानि भारत me जन्मे dharmavalambi दुनिया me जनसँख्या और प्रभाव के lihaz से आज भी sabse ज्यादा ताकतवर हैं और ये taakat लगातार badh रही है, isme किसी को संदेह नहीं रहना चाहिए, jabki आज इस्लाम अपने पिछले 1400 साल के itihaas में सबसे bure दौर में है. इराक me किसकी durgati हुई, afganistan में कौन pit रहा है, पाकिस्तान में कौन log आपस में ही maar-काट machaen हैं, आतंकवादी hone की मुहर kis मज़हब पर chaspa हो गई है. ये सब cheezen खुली kitab हैं,

    भारत के musalmaano का kalyaan hinduon के साथ prem से rahne में है na की अपने अलग pahchaan banakar rakhne में. vaise भी hnwaza की dargah पर chadar chadhana, dhoop batti jalana ये इस्लाम का ang नहीं है, दुनिया में kahin mazaron की पूजा musalmaan नहीं karte, भारत में ही ये hota है तो यह kiska asar है, कौन kisase prabhavit है, vastav में dono को एक dusare की achhi baton को lekar bigad vali cheezon से doori bana लेनी चाहिए.

  12. असहिष्णु संप्रदाय का एक और उदाहरण है ये टिपण्णी. भारतीयों के उपजाए अन्न को खाकर उन्ही के ऊपर आतंकवादी हमला करनेवाले लोग ज्यादा समय तक स्वीकार नहीं किये जा सकते. बहला फुसलाकर जबरदस्ती, आतंक फैला कर कोई संप्रदाय ज्यादा समय तक नहीं चल पाया है.पांच पांच बच्चे पैदा कर तादाद बढाना किसी सम्प्रदाय की लोप्रियता नहीं कही जा सकती. अपने तेज़ मस्तिस्क के दम पर हिन्दू धर्म के लोग दुनिया मैं सबसे ज्यादा लोगो को रोज़गार उपलब्ध करा रहे हैं. कर्मवीरों और आतंकवादियों का कोई मुकाबला नहीं हो सकता. विश्व कल्याण की बात करनेवाले धर्म को मिटानेवाले स्वयं नष्ट हो गए. विश्व के बहुत बड़े भाग पर हिन्दू धर्म की पताका लहरा रही है. जरूरत पड़ी तो कर्मवीर, धर्मवीर बनने मैं देर नहीं करेंगे.

  13. ठीक है कुछ बेहूदा लोगों की हरकतों से इस्लाम को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है अब चाहे वो कबीर हो या रसखान
    कबीर जी तो मुझे लगता है किसी के रंग में नहीं रंगे आपको शायद किसी ने गलत इत्तिला दे दी डोक्टर साब
    अगर आपने सुना हो तो
    पत्थर पूजे मिले हरी
    तो में पूजूं पहाड़
    ये वही कबीर थे जिनका आपने ज़िक्र किया है
    और रही बात दाराशिकोह की तो वोह भी उसी खंडन से ताल्लुक रखता है जिसमे औरंगजेब पैदा हुआ
    खैर कोई बात नहीं अगर संतों के रस में इतनी ताकत है तो हिंदुत्व हिंदुस्तान तक ही सीमित क्यू रह गया
    अरब देशो में क्यू नहीं पहुंचा जी लेकिन हाँ अरब की संसकिरती जरूँर हिंदुस्तान में आ गई
    आज हिंदुस्तान में इस्लाम के मानने वालों की तादाद लगभग हिन्दुओं के करीब है और पाकिस्तान जो भारत का ही हिस्सा है
    वो रहा अलग
    खुवाज़ा मुइनुद्दीन चिस्ती का नाम सुना है आपने खीर में आपको बता देता हूँ अजमेर शरीफ में उनका मजार है कभी फुर्सत हो तो देख के आना
    आज हिंदुस्तान में इस्लाम का परचम लहराना उन्ही की मेहनत का फल है जिनके भक्ति रस का लाखों करोड़ों मुस्लमान बने
    डोक्टर साब ऐसी होती है रसधारा
    अल्लाह आपको तौफीक दे

  14. अच्छा और प्रभावी लेख है। लेखक को कोटि-कोटि साधुवाद।

    दमन और अत्याचार दुनिया की दास्तां है वैसे ही है जैसे संसार में प्रकाश है तो अंधकार पक्ष भी है। आदमी या कोई सभ्यता या धर्म दोषी तब है जब वह हमेशा गलत चीजों को, अंधकार या अन्याय को ही जीवनसत्य मान ले। भारत और यहां के लोग इसी एक बात में विलक्षण रहे हैं या माने गये हैं कि भारतीयों ने अपने व्यवहार में हमेशा समय के अनुरूप अपने में परिवर्तन किया है।

    अन्याय और अत्याचार हमेशा रहे हैं और उसी प्रकार उसे धूल में मिला देने वाली जीवन शक्ति भी हमेशा ही दुनिया में रही है। कहते हैं कि दम है कितना दमन में तेरे, देख लिया है देखेंगे।

    भारत में अब तो संविधान का राज है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोप, फ्रांस सब जगह संविधान का राज है। क्या इस संविधान ने सभी जगहों से अन्याय और अत्याचार का खात्मा कर दिया। कैटरीना तूफान अमेरिका में आया तो वहां सहायता की जगह लोग घरों में लूटपाट करने लगे। फ्रांस में, आस्ट्रेलिया में अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो रहा है। अमेरिका में १२-१३ साल की उम्र की बच्चियां मां बन रही हैं, प्रतिशत में सर्वाधिक। यही हाल भारत में भी है। सब जगह समस्याएं हैं। लेकिन हमारा धर्म क्या कहता है। मानवता का धर्म है कि जब तक जीवित हो परिस्थिति बदलने की सोचो। अच्छेपन की ओर बढ़ो।

    भारत के संतों ने इस्लाम की असहिष्णु आंधी में देश को बिना हथियारों का प्रयोग किए नए रास्ते पर लाने का प्रयास किया। उनके प्रयास उचित थे। इसी में से सूफी दर्शन को जन्म हुआ। इस्लाम से भारत ने काफी कुछ सीखा तो इस्लाम में भी भारत की आबोहवा ने मूलभूत परिवर्तन कर दिए। यही कारण है कि भारतीय इस्लाम अरबी इस्लाम से बिल्कुल जुदा है। हां, ये बात सही है कि कट्टरपंथी इस जुदाई को बर्दाश्त नहीं कर पाते और इसीलिए उनकी फतवाबाजी होती रहती है कि कहीं इस्लाम भारतीयता के रंग में पूरी तरह से रंग न जाए।

    आज सबसे बड़ी जरूरत एकता की है, समन्वय की है। ऐसी एकता की जरूरत है जिससे सदियों पुरानी भारतीय सहिष्णु परंपरा जो जियो और जीने दो के सिद्धांत पर चलती है, को और बल मिले, वह निर्बाध होकर आगे बढ़े और देश में शांति का साम्राज्य हो। इस कार्य में जो भी जुटा है, उसके लिए शुभकामनाएं।

  15. धर्म को क्यों दोष दें, जब से इन्सां का जन्म हुआ है तब से ही खूं खराबा चल रहा है। आखिर ये धर्म भी तो इंसानों के बनाए हुए हैं।………है क्या कि हम लोग केवल सतही बात कह करके पल्ला झाड़ लेने के आदती हो गए हैं। कोई व्यक्ति लिख क्या रहा है, उसके बारे में ठीक से सोचते तक नहीं।

    ऊपर जो लेख है वह अद्भुत है। इसमें दम है, तथ्य है। भारत में जो सहिष्णु परंपरा रही है, उसका बहुत सुंदर वर्णन लेखक ने किया है और यह भी बताया है कि भारत कैसे हजारों वर्षों से राजनीतिक विदेशी हमलों के बाद भी सभी विचारधाराओं के साथ समन्वय करते हुए आगे बढ़ता रहा है। और वह भी इस्लाम धर्म को साथ लेकर आगे बढ़ा जिसके आतंकवादी आज समूची दुनिया के लिए काल बन गए हैं। आज के समय में ऐसे आलेख लिखे जाने चाहिए। इसमें से क्या गलत कहा है, उस पर बहस होनी चाहिए, लेकिन हम लोग हैं कि बहस के मुद्दे को ही मोड़ने पर जुट जाते हैं।

    इसमें आज के साधु संतों के लिए भी संदेश है कि वह चाहें तो क्या नहीं कर सकते, लेकिन वे अब तो भौतिकता की आंधी में खुद ही बहने लगे हैं, उनसे क्या परिवर्तन की उम्मीद की जाए। कभी कभी लगता है कि भारत का अभारतीयकरण इतना ज्यादा हो गया है कि जो अपने को भारतीयता का सबसे बड़ा अलंबरदार मानते और कहते हैं वे लोग भी अपने आचरण में नितांत अभारतीय व्यवहार कर रहे हैं।

  16. जबसे धर्मो का जन्म हुवा इंसान -इंसान का दुश्मन हुवा है ! एक धर्म में भी अलग -अलग गुट
    होते है और उनमे भी मारकाट होती रहती है ,जैसे सिया -सुन्नी , सिख के अनेक गुट हिन्दू के
    उच्च वर्गोने तो ५०-६० सलोसे दलित और निचले जाती के लोगोंको धर्मके नामपर डरा धमका कर
    लुटा है ! धर्मके जरुरत से ज्यादा भारत में ढोल बजने के कारन ही भारत पर शुक ,शोण, आर्य
    मुग़ल .अंग्रेज लोगोने आक्रमण किया और भारत २००० सालोसे गुलाम रहा है ! यहाँ तक की
    कुछ जंगली टोलियाँ भी हमें लूटकर चली गयी ! हम सिर्फ धर्मके अंधे कुए में दुबे रहे है ! अंग्रेजोने १५० साल
    हमपर राज किया इसका प्रमुख कारन हमारी धार्मिक पाखंडता ही रही है !!

  17. हम लोग अभी भी १८ वी सदी में जी रहे है ,और धर्म कर्मो के बचकाने चालो में घिर गए है
    और सभी धर्मके खोकले विचार धारा, बचपने जैसी बाते ,फिर भी लोग अभी भी आधुनिक युग में
    रह कर गंगा स्नान -लोक परलोक की बातोंपर यकीन करके अपने दिमाग का इस्तेमाल करना
    भूल गए है ! अगर भगवान होता तो मंदिर में लोग भगदड़ से नहीं मरते , मुस्लिम लोग मक्का
    जाते है उधर भी भगदड़ में लोग नहीं मरते है ! धर्मो के नामपर लाखो करोडो लोग मर गए है और आज भी
    मर रहे है !!!!आज के वास्तविक जीवन में भगवान का
    कोई दायित्व नहीं है तो आप किसके भरोसे परलोक स्वर्ग- नरक जैसी बातो पर विश्वास कर रहे है !
    असल में भ्रमांड का निर्माण एक कुदरती शक्ति [नेचुरल पावर ] से हुवा है !!!

  18. अभी आधा लेख पढ़ा है tippni दिए बिना रहा nhi gya अगर व्ही भगती आन्दोलन हो और व्ही साधू संत तो क्यों हो कट्टरता क्यों हो कोई लड़ाई मन मोहित कर दिया अपने shandar लेख के लिए बधाई

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