धर्म-अध्यात्म

राष्ट्र की सतत चेतना है सनातन 

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

   भारत केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं है। वह एक जीवन्त सभ्यता है, जिसकी चेतना समय से भी पुरानी है। यही कारण है कि भारत को ‘सनातन भारत’ कहा जाता है। सनातन का अर्थ है—अनादि, अनन्त, नित्य और अविनाशी। भारत का राष्ट्रीय चरित्र इसी सनातन चेतना से जुड़ा है। यह चरित्र सत्य, धर्म, सहिष्णुता, करुणा, ज्ञान और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के भाव से बना है।

सनातन: समय से परे सत्य :

   ‘सनातन’ शब्द का अर्थ केवल पुराना होना नहीं है। सनातन का अर्थ है—जो आदि से है और जिसका कोई अन्त नहीं है। वह न जन्मा है, न मरेगा। वह समय के साथ बदलता नहीं; समय उसी की अभिव्यक्ति है।

श्रीमद्भगवद्गीता आत्मा को इसी सनातन सत्ता के रूप में प्रस्तुत करती है—

“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥”

 — गीता 2.23

   अर्थात्—आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती, जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता। यही आत्मा अजर, अमर और सनातन है।

   भारत की राष्ट्रीय चेतना भी इसी आत्मा की तरह है। उस पर अनेक आक्रमण हुए। उसे तोड़ने के अनेक प्रयास हुए। परन्तु भारत की आत्मा नष्ट नहीं हुई। वह बार-बार जागी और नए रूप में उठी। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था—“यह सनातन धर्म का देश है। यह देश गिर अवश्य गया है, परन्तु निश्चय फिर उठेगा।”

   विजयादशमी केवल रावण दहन का पर्व नहीं है। यह असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अत्याचार पर न्याय की विजय का पर्व है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में विजय दशमी समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि यह पर्व भारत की प्राण-ऊर्जा, अत्याचार और आतंक के अन्त तथा असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि जब हम सत्य और मानवता के साथ खड़े होते हैं, तो शत्रु चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अन्तत: विजय हमारी होती है। यही सनातन भारत का मूल सन्देश है। यह सन्देश केवल धार्मिक आस्था नहीं है। यह राष्ट्रीय आत्मविश्वास है।

   प्रधानमंत्री ने श्रीराम के जीवन को सनातन आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम ने राज्य प्राप्ति के सुख से अत्यधिक प्रसन्न नहीं हुए और वनवास की परिस्थिति से दु:खी भी नहीं हुए। उन्होंने हर परिस्थिति में धर्म का पालन किया और सत्य की स्थापना की। यही सनातन चरित्र है—परिस्थिति बदले या न बदले, कर्तव्य और सिद्धान्त से पीछे न हटना।

धर्म: भारतीय जीवन की धारा :

   भारत के सनातन चरित्र का पहला तत्त्व है—धर्म। यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं है। धर्म का अर्थ है—कर्तव्य, न्याय, संयम, सत्य और मानवता। धर्म वह है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को धारण करता है।

स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट कहा था कि भारत के राष्ट्रीय जीवन की मुख्य धारा धर्म है। उनके अनुसार भारत की एकमात्र सम्मिलन-भूमि है—उसकी पवित्र परम्परा और उसका धर्म।

   यह धर्म किसी एक सम्प्रदाय का धर्म नहीं है। यह सबके लिए समान मूल्यों का धर्म है। इसमें सत्य बोलना, अहिंसा, दया, क्षमा, दान, शुचिता और परोपकार शामिल हैं। ये मूल्य जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र की सीमा से ऊपर हैं।

सत्य: राष्ट्र की आत्मा :

   सनातन भारत का दूसरा मूल तत्त्व है—सत्य। भारतीय चिन्तन में सत्य ही ईश्वर है। ऋग्वेद कहता है—

“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”

  — ऋग्वेद 1.164.46

अर्थात्—सत्य एक है, पर ज्ञानी लोग उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। यही भारतीय दृष्टि है। यह दृष्टि एकता में विविधता सिखाती है।

   प्रधानमंत्री मोदी ने भी विजयादशमी को सत्य की विजय का पर्व बताया। उन्होंने कहा कि यह पर्व हमें यह विश्वास देता है कि सत्य और मानवता के साथ खड़े होने पर अन्तिम विजय सत्य की होती है। यही भारत की राष्ट्रीय आत्मा है।

वसुधैव कुटुम्बकम्: विश्व को परिवार मानना :

   भारत के सनातन चरित्र का सबसे उदात्त तत्त्व है—’वसुधैव कुटुम्बकम्।’ इसका अर्थ है—सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है। यह विचार महान उपनिषद सहित अनेक भारतीय ग्रन्थों में मिलता है।

   यह वाक्य केवल एक नारा नहीं है। यह जीवन जीने की पद्धति है। यह सिखाता है कि मनुष्य केवल अपने परिवार, अपने समाज या अपने राष्ट्र तक सीमित नहीं है। उसका कर्तव्य सम्पूर्ण मानवता और सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति है।

   भारत की विदेश-नीति, संस्कृति और सामाजिक दृष्टि में यही भाव दिखता है। भारत कभी विश्व को जीतने के लिए नहीं निकला। भारत विश्व को जोड़ने के लिए निकला। उसने बौद्ध धर्म, वेदान्त, योग, गणित, चिकित्सा और दर्शन को विश्व तक पहुँचाया। यही भारत का विश्व-दृष्टिकोण है।

अहिंसा और करुणा: भारतीय शक्ति :

   भारत का सनातन चरित्र अहिंसा और करुणा पर टिका है। यहाँ शक्ति का अर्थ केवल युद्ध या बल नहीं है। शक्ति का अर्थ है—संयम, धैर्य, क्षमा और न्याय।

   गाँधीजी ने इसी सनातन भाव को आधुनिक राजनीति में बदला। उन्होंने सत्य और अहिंसा को स्वतंत्रता संग्राम का हथियार बनाया। उनके लिए धर्म का अर्थ था—सत्य का अनुसरण। यही भारतीय चरित्र की व्यावहारिक अभिव्यक्ति थी।

   भारत में जीव-मात्र में दिव्यता देखी गयी। वृक्ष, नदी, पशु, पक्षी—सबको पवित्र माना गया। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं थी। यह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का दर्शन था। आज जब विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब यही भारतीय दृष्टि अधिक प्रासंगिक हो गयी है।

राम राज्य: न्याय और जनकल्याण का आदर्श :

   प्रधानमंत्री ने विजयादशमी के अवसर पर ‘राम राज्य’ को केवल धार्मिक स्मृति नहीं, बल्कि सुशासन का आदर्श बताया। उनके अनुसार राम राज्य वह शासन है, जिसमें न्याय, समान अवसर, जनकल्याण और भेदभावहीन व्यवस्था हो।

   यह विचार सनातन भारत के राजनीतिक चरित्र को दर्शाता है। भारतीय परम्परा में राजा केवल शासक नहीं था। वह प्रजा का सेवक था। उसका कर्तव्य था—प्रजा का सुख, सुरक्षा और न्याय। यही आदर्श आधुनिक लोकतंत्र में भी प्रासंगिक है।

   प्रधानमंत्री ने ‘राम से राष्ट्र’ और ‘देव से देश’ की संकल्पना को दोहराया। उन्होंने कहा कि अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा के समय व्यक्त यह भाव अब राष्ट्रीय संकल्प बन चुका है। इसका अर्थ है—श्रीराम के आदर्शों से राष्ट्र का निर्माण और देवत्व भाव से देश-सेवा।

ज्ञान और विज्ञान: भारत की खोज :

   भारत का सनातन चरित्र केवल भक्ति और आस्था तक सीमित नहीं है। वह ज्ञान और विज्ञान की खोज में भी समृद्ध है। भारत ने आत्मा की खोज की, तो ब्रह्माण्ड की खोज भी की।

   आधुनिक विज्ञान ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के लिए बिग बैंग सिद्धान्त देता है। ‘नासा’ के अनुसार बिग बैंग कोई एक स्थान पर हुआ विस्फोट नहीं था; वह समय और स्थान के साथ घटित एक प्रक्रिया थी।

   कुछ वैज्ञानिक मॉडल यह भी कहते हैं कि ब्रह्माण्ड बार-बार संकुचित और विस्तारित होता है। इसे चक्रीय ब्रह्माण्ड या ‘बिग बाउंस’ कहा जाता है। यह विचार भारतीय सृष्टि-दर्शन से अद्भुत रूप से मिलता है। सनातन दर्शन में सृष्टि का सृजन, स्थिति और प्रलय—यह चक्र निरन्तर चलता रहता है।

   विज्ञान ऊर्जा के संरक्षण का नियम बताता है। उसके अनुसार ऊर्जा न बनती है, न नष्ट होती है। वह केवल रूप बदलती है। गीता भी कहती है—

“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।”

   — गीता 2.16

   अर्थात्—जो असत्य है, उसका अस्तित्व नहीं; और जो सत्य है, उसका अभाव नहीं। यही भाव विज्ञान की अविनाशिता की खोज से जुड़ता है।

सांस्कृतिक गौरव: विरासत का पुनरुत्थान :

   प्रधानमंत्री ने विजयादशमी के सम्बोधन में भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर बल दिया। उन्होंने बताया कि पिछले बारह वर्षों में 650 से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ भारत लौटाई गयी हैं। उन्होंने यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भारतीय स्थलों की जुड़ाव को भी राष्ट्रीय उपलब्धि बताया।

   उन्होंने कहा कि दीपावली को भी यूनेस्को ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया है। इसे उन्होंने करोड़ों भारतीयों की सामूहिक इच्छाशक्ति का परिणाम बताया। यह सन्देश स्पष्ट है—सनातन विरासत केवल अतीत की स्मृति नहीं है। वह वर्तमान की राष्ट्रीय शक्ति है।

राष्ट्र प्रथम: सनातन का समकालीन संकल्प :

   प्रधानमंत्री ने विजयादशमी पर ‘राष्ट्र प्रथम’ का संकल्प दोहराया। उन्होंने कहा कि देश की गरिमा पर आघात करने वाली, समाज को बाँटने वाली और भारतीय संस्कृति से घृणा रखने वाली शक्तियाँ राष्ट्र की शत्रु हैं।

   उन्होंने सभी राजनीतिक दलों और संस्थाओं से राष्ट्रहित के लिए एक साथ आने का आह्वान किया। उनका कहना था कि जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक है। यह आह्वान सनातन के ‘संगच्छध्वम्’ के भाव से जुड़ता है। अर्थात्—सब मिलकर चलो, सब मिलकर बोलो, सब मिलकर कार्य करो।

एकता में विविधता: राष्ट्र की शक्ति :

   भारत की सबसे बड़ी शक्ति है—एकता में विविधता। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, अनेक सम्प्रदाय हैं, अनेक रीति-रिवाज हैं। फिर भी भारत एक राष्ट्र है। इसका कारण है—सनातन चेतना।

   भारत ने विविधता को शत्रु नहीं माना। उसने विविधता को ईश्वरीय विविधता माना। इसीलिए भारत में हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई और मुसलमान—सभी को रहने का अवसर मिला। यह सहिष्णुता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी राष्ट्रीय शक्ति है।

   स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में कहा था कि उन्हें गर्व है कि वे ऐसे धर्म से सम्बन्ध रखते हैं, जिसने विश्व को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति सिखाई। यही सन्देश आज भी भारत की राष्ट्रीय पहचान है।

सनातन चरित्र की आधुनिक आवश्यकता

आज विश्व तकनीक से जुड़ रहा है, पर मानवीय मूल्यों से दूर हो रहा है। संघर्ष बढ़ रहे हैं। स्वार्थ बढ़ रहा है। प्रकृति का शोषण बढ़ रहा है। ऐसे समय में भारत का सनातन चरित्र ही मार्गदर्शक बन सकता है।

भारत को अपने सनातन मूल्यों को छोड़कर आधुनिक नहीं बनना है। भारत को अपने मूल्यों के साथ आधुनिक बनना है। विज्ञान और आध्यात्म, तकनीक और नैतिकता, राष्ट्रभक्ति और विश्वबन्धुत्व—इन्हें एक साथ ले जाना ही भारत का मार्ग है।

   भारत को यह समझना होगा कि उसकी शक्ति उसकी आबादी में नहीं, उसकी चेतना में है। उसकी शक्ति उसके अतीत में नहीं, उसके शाश्वत मूल्यों में है। जब तक भारत सत्य, धर्म और वसुधैव कुटुम्बकम् को जीवित रखेगा, तब तक वह नष्ट नहीं हो सकता।

निष्कर्ष: सनातन भारत का राष्ट्रीय संकल्प :

   भारत का सनातन चरित्र चार स्तम्भों पर खड़ा है—सत्य, धर्म, करुणा और वसुधैव कुटुम्बकम्। यह चरित्र केवल धार्मिक विचार नहीं है। यह राष्ट्रीय चेतना है। यह भारत की आत्मा है।

   विजयादशमी हमें यही सिखाती है कि रावण केवल लंका का राजा नहीं था। रावण अहंकार, अत्याचार, असत्य और सामाजिक विभाजन का प्रतीक है। उसका दहन हर युग में आवश्यक है। प्रधानमंत्री के शब्दों में, यह पर्व हमें माँ भारती के शत्रुओं को पहचानने और उन्हें परास्त करने का संकल्प देता है।

   सनातन वह है, जो समय से भी पुराना है। वह आत्मा है, जो अमर है। वह धर्म है, जो कर्तव्य सिखाता है। वह सत्य है, जो सब नामों में एक है। वह भारत है, जो विश्व को परिवार मानता है।

   भारत को आज अपनी इसी सनातन चेतना को पुनः जागृत करना है। उसे अपने मूल्यों पर गर्व करना है। उसे विश्व के सामने यह सन्देश देना है—शक्ति का अर्थ अधिकार नहीं, कर्तव्य है; धर्म का अर्थ संकीर्णता नहीं, मानवता है; और राष्ट्र का अर्थ केवल स्वार्थ नहीं, सेवा है।

   जब तक समय है, तब तक सनातन है और जब तक सनातन है, तब तक भारत जीवित है। यही भारत का शाश्वत राष्ट्रीय संकल्प है।

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर