ओ.पी. पाल
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण भौगोलिक विस्तार वाले देश में बुनियादी ढाँचे का संतुलित विकास हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। एक समय था जब हवाई यात्रा को केवल संपन्न वर्ग की विलासिता माना जाता था और देश का उड्डयन नेटवर्क मेट्रो शहरों दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता और हैदराबाद तक ही सीमित था। द्वितीय और तृतीय श्रेणी के तथा दूर-दराज के सीमावर्ती व पहाड़ी इलाके देश के आर्थिक मानचित्र से एक तरह से कटे हुए थे। इस असंतुलन को समाप्त करने और ‘हवाई चप्पल पहनने वाले आम नागरिक को हवाई यात्रा कराने’ के संकल्प के साथ देश में 21 अक्टूबर 2016 को ‘क्षेत्रीय संपर्क योजना’ (उड़े देश का आम नागरिक) की नींव रखी गई। इस उड़ान योजना ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही दृष्टि और ढांचागत रणनीति हो, तो उड्डयन क्षेत्र केवल बड़े शहरों का विशेषाधिकार नहीं रहता।

इस योजना ने 21 अक्टूबर 2026 को अपने 10 वर्ष पूरे करते हुए न केवल भारत के नागरिक उड्डयन परिदृश्य को ही बदल दिया है, बल्कि इसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार बनाने में रीढ़ की हड्डी की भूमिका निभाई है। साल 2026 में अपने पहले दशक की सफलता के बाद, अब भारत सरकार की ‘संशोधित उड़ान’ से देश को न केवल क्षेत्रीय रूप से एक-दूसरे के करीब लाने, बल्कि ‘स्वदेशी विमानन’ और ‘आत्मनिर्भरता’ के नए युग की ओर भी अग्रसर कर रही है। यह नई योजना आने वाले दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर से आगे ले जाने में एक मजबूत संवाहक सिद्ध हो सकती है?
केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति के तहत क्षेत्रीय मार्गों को किफायती और टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर 2016 को आरसीएस-उड़ान की नींव रखी थी। प्रथम व्यावसायिक उड़ान 27 अप्रैल 2017 को शिमला से दिल्ली के बीच पहली क्षेत्रीय उड़ान का औपचारिक उद्घाटन हुआ जिससे पर्वतीय राज्यों में हवाई संपर्क का नया अध्याय शुरू हुआ। इसके विस्तार एवं नवाचार में साल 2018–2021 में इस योजना में पूर्वोत्तर राज्यों, दूर-दराज के द्वीपों, वाटर एयरोड्रोम (सी-प्लेन) और हेलीकॉप्टर सेवाओं को शामिल कर उड़ान 2.0, 3.0 और 4.0 का दायरा बढ़ाया गया। यदि आंकड़ों पर गौर की जाए तो, साल 2014 तक पूरे देश में केवल 74 चालू हवाई अड्डे थे लेकिन ‘उड़ान’ योजना के लागू होने के बाद अगले दस वर्षों में यह संख्या दो गुने से भी अधिक होकर 166 तक पहुँच गई है। मसलन इन 10 वर्षों की प्रमुख सांख्यिकीय उपलब्धियों के तहत देश के कोने-कोने में कुल 687 क्षेत्रीय मार्गों पर विमान परिचालन शुरू हुआ और कुल 95 नए एयरोड्रोम शुरू किए गए जिनमें 17 हेलीपोर्ट और 2 वाटर एयरोड्रोम शामिल हैं। उड़ानों और यात्रियों की संख्या की दृष्टि से अब तक इस योजना के तहत 3.68 लाख से अधिक उड़ानें संचालित होने का दावा किया गया है।
इन चार राज्यों में मिली हवाई अड्डो की सौगात
देश के अलग-अलग भागों में इसके चार प्रत्यक्ष उदाहरण देखे जाएं, तो इसमें पूर्णिया (बिहार) यानी कोसी-सीमांचल का आर्थिक सूर्योदय 2025 से पूर्व पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और कटिहार जैसे जिलों के निवासियों को हवाई यात्रा के लिए 200 किलोमीटर दूर बागडोगरा जाना पड़ता था। पटना और कोलकाता जाने में 8 से 10 घंटे लगते थे। 2025 में चालू हुआ 2.8 किलोमीटर लंबा रनवे वाला पूर्णिया हवाई अड्डा (जो बिहार का सबसे लंबा रनवे है) अब ए320 और बी737 जैसे बड़े बोइंग विमानों को संभालने में सक्षम है। इसी प्रकार तेजू (अरुणाचल प्रदेश) में हवाई अड्डा 2021 में शुरू हुआ। इससे पूर्व गुवाहाटी पहुँचने में स्थानीय लोगों को 10 से 12 घंटे का कठिन सड़क सफर तय करना पड़ता था। अब यह सफर घटकर सिर्फ 1 घंटा रह गया है जबकि देवघर (झारखंड) में जुलाई 2022 में हवाई अड्डे के उद्घाटन से पहले बाबा बैद्यनाथ धाम आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को रांची या पटना उतरकर 150-200 किमी दूर की कठिन यात्रा करनी पड़ती थी। अब दिल्ली से देवघर का सफर 15 घंटे से घटकर मात्र 2 घंटे का रह गया है। इसके अलावा साल 2017 में किशनगढ़ (राजस्थान) एयरपोर्ट की शुरुआत ने विश्वप्रसिद्ध किशनगढ़-अजमेर मार्बल मंडी की दिशा ही बदल दी। सीधी एयर कार्गो सेवा मिलने से इटली, यूएई और अमेरिका को मार्बल निर्यात आसान हो गया है।
‘संशोधित उड़ान’ का शुभारंभ
इसी साल 4 जुलाई 2026 को केंद्र सरकार ने अगले 10 वर्षों (वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36) के लिए ₹28,840 करोड़ के बजट के साथ योजना के अगले और अधिक आधुनिक चरण की घोषणा की गई। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 25 मार्च 2026 को इस संशोधित क्षेत्रीय संपर्क योजना को मंजूरी दी थी। इस नए चरण में मौजूदा हवाई पट्टियों से 100 हवाई अड्डे विकसित करने, 200 आधुनिक हेलीपैड बनाने, क्षेत्रीय हवाई अड्डों के संचालन को आर्थिक सहायता देने और विमानन कंपनियों को प्रोत्साहित करने की योजना है। केवल हवाई पट्टियाँ बनाना नहीं, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत एक ऐसा घरेलू विमानन पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना है जो ‘मेड इन इंडिया’ विमानों और अत्याधुनिक बुनियादी ढाँचे पर आधारित होगी। एयरलाइनों को कम किराए पर विमान चलाने में मदद हेतु 15 अक्टूबर 2026 तक 5,091.23 करोड़ रुपये की सहायता राशि जारी की जा चुकी है। इस नए चरण में 120 नए गंतव्यों तक हवाई संपर्क बढ़ाने और अगले दस वर्षों में चार करोड़ यात्रियों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य भी तय किया गया है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बुनियादी ढांचे के विकास, विमानन कंपनियों को सहायता, राज्यों के साथ समन्वय और स्वदेशी विमानों की उपलब्धता पर जोर दिया जा रहा है।
चुनौतियाँ और आगे की राह
एक दशक की शानदार उपलब्धियों के बावजूद क्षेत्रीय विमानन के समक्ष कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं, यानी छोटे क्षेत्रीय एयर ऑपरेटर्स (जैसे एयर डेक्कन, ज़ूम एयर) ईंधन की बढ़ती कीमतों और रखरखाव लागत के कारण लंबे समय तक टिक नहीं पाए। वहीं पूर्वोत्तर और पहाड़ी इलाकों में खराब मौसम और कोहरे के कारण उड़ानों के रद्द होने की दर अधिक रहती है। इसी प्रकार छोटे हवाई अड्डों पर एटीसी, नाइट लैंडिंग और रिफ्यूलिंग की स्थायी सुविधाओं का रखरखाव महंगा साबित हो रहा है। हालांकि सरकार ने ‘संशोधित उड़ान’ के जरिए इन कमियों को दूर करने का एक व्यावहारिक ढांचा तैयार किया है। 3 से 8 वर्षों के लिए संचालन एवं रखरखाव में सब्सिडी देना, एचएएल द्वारा निर्मित स्वदेशी डॉर्नियर और ध्रुव हेलीकॉप्टरों को बेड़े में शामिल करना तथा निजी क्षेत्र के साथ जोखिम साझा करना इस बात का प्रमाण है कि भारत क्षेत्रीय उड्डयन को केवल आर्थिक लाभ-हानि से परे ‘राष्ट्र-निर्माण’ के उपकरण के रूप में देखता है। वहीं हेलीपैड का विकास विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकता है, जहां पहाड़, जंगल, द्वीप या कठिन भौगोलिक परिस्थितियां बड़े हवाई अड्डों के निर्माण को मुश्किल बनाती हैं। ऐसी जगहों पर हेलीकॉप्टर आपातकालीन चिकित्सा, प्रशासनिक गतिविधियों, पर्यटन और जरूरी सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण साधन बन सकते हैं।
ओ.पी. पाल