-अशोक “प्रवृद्ध”
जो मिला हाथ में, उसे प्रसाद मान लो,
हर सांस में छुपा, प्रभु का वरदान जान लो।
जो मिला है उसके लिए, झुका शीश बार-बार,
परमात्मा की कृपा ही है, जीवन का असली आधार।
मिली जो सूखी रोटी, उसे अमृत सा चखना,
जो नहीं मिला अब तक, उसके लिए धैर्य रखना।
समय से पहले और भाग्य से ज्यादा, मिला किसे यहाँ है?
जो सब्र की राह पर चले, असल सुकून वहीं है।
माली सींचता है पौधों को, मौसम आने पर ही फल आते हैं,
हड़बड़ाहट में तो अक्सर, खिलते फूल भी मुरझा जाते हैं।
उम्मीद का दीया न बुझे, बस यही जतन रखना,
जो आज अधूरा है, उसके लिए धैर्य रखना।
तेरी हर एक आह का, उस विधाता को हिसाब है,
तेरी खामोश सब्र का, उसके पास नायाब जवाब है।
शिकवे-शिकायत छोड़ कर, खुशियों का रंग चुनना,
जो मिला उसे सम्हालो, बाकी के लिए धैर्य रखना।
–अशोक “प्रवृद्ध”