सतीश सिंह की कविताएं

आम आदमीsingle-man

 

राहु और केतु के पाश में

जकड़ा रहता है हमेशा

 

कभी नहीं मिल पाता

अपनी मंज़िल से

 

भीड़ में भी रहता है

नितांत अकेला

 

भूल से भी साहस नहीं कर पाता है

ख्वाब देखने की

 

संगीत की सुरीली लहरियां

लगती है उसे बेसूरी

 

हर रास्ते में ढूंढता है

अपने जीवन का फ़लसफ़ा

 

खड़ी फसल नहीं दिखा पाती है

उसे जीवन का सौंदर्य

 

वैराग्य में भी

ख़ोज़ लेता है

उज़ाला

 

लगता है

आम आदमी की नियति में बदा है

पानी में रहकर भी

प्यासे मर जाना।

 

 

तलाक

 

कोर्ट से तलाक लेकर

घर लौटने पर

घर तब्दील हो जाता है

एक बेतरतीब दुनिया में

 

कभी नींद नहीं खुली

तो बच्चे स्कूल नहीं जा सके

 

कभी खुली

तो कौन किससे पहले

तैयार होगा?

 

छोटी की टाई नहीं मिल रही है

बड़ी के शर्ट के बटन टूट गये हैं

 

नाश्‍ता तैयार नहीं हुआ है

बच्चों को स्कूल से कौन लाएगा?

हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा है

 

घर का प्रबंधन

पूरी तरह से

अस्त-व्यस्त हो चुका है

 

डायनिंग टेबल पर

कपड़े सूखने के लिए रखे हैं

पलंग पर होम थियेटर रखा है

 

घर के सारे दीवारों को

बच्चों ने

अपनी चित्रकारी से सज़ा रखा है

 

न डांट है, न नसीहत

न चिंता है न नाराज़गी

न हसीन लम्हे हैं, न कड़वे पल

 

 

बस पूरे घर में

पसरा है एक ऐसा सन्नाटा

जिसमें हलचल है

पर जीवन नहीं।

 

सतीश सिंह

 

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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