कहो कौन्तेय-११

 विपिन किशोर सिन्हा

हस्तिनापुर के राजकार्य में युवराज युधिष्ठिर की स्वीकार्यता में निरन्तर वृद्धि हो रही थी। महात्मा विदुर और पितामह भीष्म आए दिन उन्हें अपने कक्ष में बुलाते और नीति-शास्त्र की शिक्षा देते। उन्हें भावी सम्राट के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा था। विदुर जी भैया को सदैव सीख देते, कहते थे –

“सद्व्यवहार और मधुर वाणी से शत्रु का हृदय भी जीता जा सकता है।”

अग्रज युधिष्ठिर ने किसी के लिए कभी, अनायास भी, कटु शब्दों का प्रयोग किया हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं। वे दुर्योधन, कर्ण और शकुनि से भी आत्मीय व्यवहार करते थे। ’दुर्योधन’ को तो वे सदा “सुयोधन” संबोधन से ही पुकारते थे। मैं प्रत्यक्ष देखता था कि युधिष्ठिर के मृदु और सभ्य व्यवहार का प्रभाव इन तीनों पर नहीं पड़ता था। जैसे-जैसे राज्य-प्रशासन पर अग्रज की पकड़ सुदृढ़ होती जा रही थी, लोकप्रियता सूर्य-किरणों की भांति चहुँदिसी विकीर्णित हो रही थी, वे असहज और प्रतिक्रियावादी होते जा रहे थे।

दुर्योधन जनमानस के बीच अलोकप्रिय था। नगरवासी उसके सम्मुख भले ही कुछ नहीं कहते थे लेकिन उसके स्वछंद और उच्छृंखल व्यवहार से पीड़ित और असन्तुष्ट रहते थे। हस्तिनापुर के भव्य और विलास सामग्री से युक्त प्रासाद को वह अपनी निजी संपत्ति मानता था। दिन भर विक्षिप्तों की भांति नगर के राजपथ पर अत्यन्त तीव्र गति से रथों को दौड़ाया करता। शरीर जब थककर चूर हो जाता, तो मनोविनोद के लिए राजभवन में नियुक्त, अप्सराओं को भी लज्जित करने वाली लावण्यमयी नर्त्तकियों, गणिकाओं और गायिकाओं की शरण में चला जाता। दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को सभी सूचनाएं मिलती थीं लेकिन वे कुछ कर नहीं पाते थे। दुर्योधन पर उनका कोई वश नहीं था। वह अपनी पिता की राजशक्ति का बहुधा दुरुपयोग करता लेकिन महाराज चुप रहते। दृष्टिहीनता ने महाराज धृतराष्ट्र के पूरे व्यक्तित्व को कुण्ठित और अपूर्ण बना दिया था। शास्त्रों में संभवतः इसीलिए किसी विकलांग का राजा बनना निषिद्ध किया गया है।

कर्ण अंगदेश का राजा अवश्य नियुक्त हो गया था लेकिन अपने राज्य की ओर दृष्टि भी नहीं करता था। शकुनि की तरह ही उसका मन भी हस्तिनापुर की परिधि के बाहर नहीं निकल पाता था। नाम मात्र को दुर्योधन ने उसे अंगराज तो बना दिया लेकिन रहा वह अन्त तक दास ही। अंगदेश की पूरी व्यवस्था दुर्योधन ही देखता था लेकिन कर्ण के लिए हस्तिनापुर में समस्त ऐश्वर्य, धन, वैभव और सुविधाओं की व्यवस्था कर रखी थी। सूतपुत्र कर्ण “राजा’ संबोधन से अत्यन्त प्रसन्न होता था और अभिभूत हो सदैव दुर्योधन के चारों ओर मंडराता रहता था। उसे स्वयं को एक महा दानी के रूप में प्रतिष्ठित करने की अत्यन्त प्रबल लोकेषणा थी। अपने इस उद्देश्य में वह सफल था। हमलोगों द्वारा अर्जित और दुर्योधन द्वारा प्रदत्त रत्न भंडार, सोने-चांदी और वृहत धनकोष के सहारे उसने “दानवीर कर्ण” की उपाधि प्राप्त कर ली थी। स्वार्जित धन ही दान के योग्य होता है। किन्तु राजकोष को समृद्ध बनाने हेतु अपना तनिक भी योगदान न होते हुए भी उस धन को प्रजाजनों में समय-असमय दान कर प्रकारान्तर से अपनी यशलिप्सा का पोषण किया करता। दुर्योधन उसकी कुण्ठा को अच्छी तरह समझता था। जन्मना राजपुत्र न होने की ग्रंथि उसे सताती रहती, हीनता का बोध उसे दिनोदिन दुर्योधन का अभिन्न सखा बना रहा था।

कर्ण और शकुनि, दुर्योधन मे मुख्य परामर्शदाता थे। कभी-कभी कुटिल सलाह देने की स्पर्धा में शकुनि और कर्ण एक-दूसरे से होड़ भी लगाते थे। दुर्योधन द्वारा कर्ण को कभी-कभी आवश्यकता से अधिक महत्व देने के कारण शकुनि खिन्न भी होता था। एक दिन दुर्योधन से इसका कारण भी पूछा था। मदिरा के नशे में दुर्योधन ने कर्ण की अनुपस्थिति में शकुनि की शंका का समाधान भी किया था –

“मामाश्री! अपना प्राणप्रिय मानकर उस बावरे ने अपना जीवन-सर्वस्व, ध्येय, भवितव्य – सबकुछ मेरे हाथों में सौंप दिया है, पूर्ण निश्चिन्त होकर। मुझको वह अपना परम मित्र और हितैषी मानता है। पागल कर्ण! इस दुर्योधन को पहचानने में उसे कई जन्म लेने पड़ेंगे। आज वह मेरी मुट्ठी में है। मैंने उसे अंगदेश का राजा नियुक्त किया है, नहीं तो हस्तिनापुर के एक कोने में अधिरथ के साथ पड़ा रहता। मैंने उसे ऐसा राज्य दिया है जो उसकी परिकल्पना से परे है। वह जीवन भर मुझसे उऋण नहीं हो पाएगा। मैंने एक सारथि को एक स्वतंत्र देश का नरेश बना दिया है। यह मेरा एक महान पुण्य कार्य है। इस पुण्य के बल पर मैं उसका मनचाहा उपयोग करूंगा। अगर वह समझता है कि यह मेरा प्रेम है, तो वह मिथ्या भ्रम का शिकार है। मुझे पाण्डवों का, विशेष रूप से, उस काले धनुर्धर अर्जुन, जो मेरे हृदय में शूल-सम दंश देता है, उसकी औषधि के रूप में कर्ण का प्रयोग करना है। मैंने जो मानमुकुट बड़े प्रेम से उसके मस्तक पर रखा है, उसमें तेजोमय रक्ताभ हीरा भी जटित है। वास्तव में वह हीरा नहीं है। वह है एक धधकता हुआ अंगारा। उसकी जो भोली श्रद्धा है, उस श्रद्धा का अंगार है वह। आप नहीं जानते, दुर्योधन की बुद्धि का कौशल। आप देखते जाइए, कैसे यह अंगार पाण्डवों का संहार कर मेरे ही चरणों में लोटेगा।”

महात्मा विदुर के विश्वस्त गुप्तचरों ने दुर्योधन-शकुनि के इस संवाद की सूचना जब हमें दी, तो पहली बार दुर्योधन की तीक्ष्ण बुद्धि का लोहा मेरे मन ने भी मान लिया। कुटिलता के लिए भी तीक्ष्ण बुद्धिकौशल की आवश्यकता होती है।

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