कहो कौन्तेय-१२

विपिन किशोर सिन्हा

महाराज धृतराष्ट्र राजकीय कार्यों में सार्वजनिक रूप से महात्मा विदुर की सलाह लेते थे लेकिन अपने व्यक्तिगत कार्यों में कूटनीतिज्ञ कणिक का ही परामर्श उन्हें भाता था। वह उनका प्रिय मंत्री था। महाराज के व्यक्तिगत कक्ष में दुर्योधन के साथ कर्ण, शकुनि और मंत्री कणिक की बैठकें सामान्य से कुछ अधिक होने लगीं। महात्मा विदुर की पारखी दृष्टि कुछ शंकित हो उठीं। राजमहल के अन्तःपुर में उनके विश्वस्त गुप्तचर, परिचारक और परिचारिकाओं के रूप में सर्वत्र तैनात थे। उनके पास समस्त सूचनाएं मूल रूप में आती थीं।

द्रुपद से पराजित होने के बाद दुर्योधन को कर्ण के युद्ध-कौशल और पराक्रम पर अविश्वास-सा होने लगा था। कर्ण का आत्मविश्वास भी विचलित हुआ था। प्रत्यक्ष युद्ध में हमें पराजित कर वध करने का विश्वास डगमगा रहा था। जब मनुष्य का विश्वास अपनी क्षमता और कौशल से उठता है, तो वह षड्यंत्र का सहारा लेता है। कर्ण दुर्योधन और शकुनि को हम भ्राताओं को षड्यंत्र द्वारा सदा के लिए समाप्त कर देने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझ रहा था। हस्तिनापुर की जन-आकांक्षाएं भी उनको बरबस भयाक्रान्त कर रही थीं। नागरिक और पुरवासी हम भ्राताओं के गुण देखकर, भरी सभा में उनका बखान करते। नगर-ग्राम के चबूतरों पर एकत्रित होते, सभा करते और इस बात पर बल देते कि पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर का विधिवत राज्याभिषेक हो जाना चहिए।

पिता जब वृद्ध हो जाता है, तो धृष्ट सन्तान और भी स्वेच्छाचारी हो जाती है। यहाँ तो धृतराष्ट्र अंधत्व और वृद्धत्व, दोनों से ग्रस्त थे। सत्ता के प्रति अतिरिक्त मोह ही उन्हें हस्तिनापुर के सिंहासन से आबद्ध किए हुए था। दुर्योधन किसी भी नियम को मानने के लिए बाध्य न था, अतः उसकी उच्छृंखलता उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही थी। शान्तनुनन्दन भीष्म पहले ही सिंहासन को ठुकरा चुके थे। अतः रिक्त सिंहासन को भरने का यही उपयुक्त समय है। उनके राजा बनने से भीष्म और धृतराष्ट्र आदि को भी कोई असुविधा या कष्ट नहीं होगा। वे कुशलतापूर्वक संपूर्ण राज्य की प्रजा और अपने गुरुजनों को संभाल लेंगे।

प्रजा के तो ये स्वाभाविक उद्गार थे लेकिन दुर्योधन को इसमे आसन्न भविष्य के लिए संकट दिखाई दे रहा था। उसने कर्ण, दुशासन और शकुनि से मंत्रणा की, विश्वस्त पुरोचन के द्वारा वारणावत में अत्यन्त ज्वलनशील लाक्षागृह का निर्माण कराया और हमें वसन्तोत्सव के अवसर पर महाराज का प्रतिनिधित्व करते हुए हमें माता कुन्ती सहित वहां प्रस्थान करने की राजाज्ञा भी धृतराष्ट्र द्वारा निर्गत कराई।

महात्मा विदुर अनुभव संपन्न थे। उन्हें पल-पल की सूचना प्राप्त होती थी। इस प्रस्ताव में उन्हें ष्ड्यंत्र स्पष्ट दीख पड़ा, आसन्न विपत्ति से हमें अवगत कराया। मैंने और भीमसेन ने वारणावत जाने क विरोध किया लेकिन अग्रज युधिष्ठिर राजाज्ञा की अवमानना के पक्ष में नहीं थे। राजपरिवार का कलह सार्वजनिक न हो, वे इसका सतत प्रयास करते थे। विकृति की सीमा तक वे सद्गुण का साथ देते थे। मनुष्य के उत्तम गुण भी उसके कष्ट का कारण बन सकते हैं, इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति मुझे हो रही थी। युधिष्ठिर की अतिरिक्त सदाशयता, उदारता, मानवता में अगाध विश्वास तथा गुरुजनों का सम्मान करने के संस्कार ने कितनी बार हम पंच पाण्डवों को विषम परिस्थितियों में डाला – इसका लेखा-जोखा करना मेरे भ्रातृ-धर्म के अनुकूल नहीं है, क्योंकि मैंने सदैव स्वयं को लक्ष्मण तथा युधिष्ठिर को राम के पद पर स्थापित कर, ईश्वर से यही प्रार्थना की थी कि “प्रभो, मुझे सौम्य, दृढ़वर्ती और धैर्यवान बनाना ताकि अग्रज युधिष्ठिर का अनुगत हो सकूं, वैसे ही जैसे लक्ष्मण थे।” मेरी यह प्रतिश्रुति अपने आप से थी, अपनी आत्मा से थी। कोई जाने न जाने, मेरे इष्टदेव जानते थे कि मैं भ्राता युधिष्ठिर की किसी आज्ञा का उल्लंघन स्वप्न में भी नहीं कर सकता था। वे तो मात्र वारणावत जाने के लिए कह रहे थे, मुझे सृष्टि के उस पार चलने का निमंत्रण देते, तो भी मैं प्रश्न नहीं करता।

प्रारंभिक विरोध के बाद मैंने सहमति दे दी। भीम ने मुख्र विरोध किया लेकिन मेरा समर्पण देख, वे भी शान्त हो गए। ईश्वरेच्छा पर निर्णय छोड़, हम पांचो भ्राता, माता कुन्ती के साथ वारणावत को चल पड़े।

प्रस्थान संध्या को राजकीय सम्मान के साथ हमें विदाई दी गई। दुर्योधन अत्यन्त प्रसन्न था। उस दिन वह विनय की मूर्ति प्रतीत हो रहा था। युधिष्ठिर का भक्तिभाव से चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त किया और रथारूढ़ होने के पहले आलिंगन भी किया। मैं आश्चर्यचकित रह गया, जब कर्ण ने मुझे बाहुपाश में ले लिया। कौरवों की आन्तरिक कुटिलता, वाह्याचारी संवेदना का रूप धर, आलिंगनों और भावभीनी विदाई के रूप में व्यक्त हो रही थी। दैव उपर हँस रहा था। महात्मा विदुर हमें छोड़ने नगर द्वार तक आए और कूट वाक्यों में हमें आसन्न संकट से निकलने का पूरा उपाय बता दिया।

क्रमशः 

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