कहो कौन्तेय-७

विपिन किशोर सिन्हा

गुरुकुल से लौटे अभी कुछ ही दिन हुए थे कि राजसभा में एक दिन आचार्य द्रोण का आगमन हुआ। उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र को हमारी शिक्षा पूरी होने की अधिकृत सूचना दी। भरी सभा में अपने शिष्यों की युद्ध-विद्या के सार्वजनिक प्रदर्शन का प्रस्ताव भी किया। महाराज ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी अनुमति प्रदान कर दी तथा विदुर जी को आचार्य की इच्छा एवं निर्देशानुसार राजकुमारों के कौशल के प्रदर्शन हेतु एक भव्य रंगभूमि के निर्माण का आदेश दिया।

आचार्य द्रोण ने नगर के बाहर एक समतल भूमि का चुनाव किया जो उत्तर दिशा की ओर ढलान लिए हुए थी। शुभ-मुहूर्त में भूमिपूजन करके वास्तु शास्त्र के विशेषज्ञों की देखरेख में उन्होंने एक माह में ही भव्य प्रेक्षागृह का निर्माण करा दिया। रंगभूमि गोलाकार थी और एक योजन स्थान को घेरे हुए थी। प्रेक्षागृह के मध्य भाग में शस्त्र विभाग के लिए अलग-अलग स्थान थे। पूर्वी महाद्वार की ओर शतघ्नी, भुशुण्डी, तोमर, पट्टिश और शूल के लिए स्थान निर्धारित थे, पश्चिमी महाद्वार की ओर गदा, खड्ग, भाला, चक्र और प्राश के लिए स्थान आरक्षित थे। दक्षिण की ओर अश्वारोहण और गजारोहण के लिए मैदान थे तथा उत्तर की ओर मल्लों हेतु अखाड़ा था। प्रेक्षागृह के मध्य में बीस हाथ ऊँचा तथा बीस हाथ लंबा संगमरमर के एक भव्य वर्गाकार मंच का निर्माण कराया गया जो धनुर्विद्या के प्रदर्शन हेतु सुरक्षित था। यह एक खुला मंच था जिसपर चढ़कर कौशल दिखानेवाले राजकुमार को जनसमूह बिना किसी अवरोध के देख सकता था। मंच पर हस्तिनापुर का विशाल राजध्वज नीले आकाश को चुनौती देते हुए लहरा रहा था। प्रेक्षागृह में अंदर तथा बाहर आम्रपल्लवों और रंग-बिरंगी पताकाएं अपनी छटाएं अलग से बिखेर रही थीं। चारों ओर दीवारों पर रंग-बिरंगे मोतियों की झालरें रंगभूमि की सुन्दरता में चार चाँद लगा रही थीं। वैदूर्यमणियों से भवन को कलात्मक ढंग से सुशोभित किया गया था। दीवारों में स्वर्णखण्ड मढ़े हुए थे।

प्रेक्षागृह के पूर्वी भाग में राजपरिवार के पुरुष सदस्यों के लिए ऊँचे स्थान पर प्रशस्त आसनों का निर्माण किया गया था। राजदीर्घा की बाईं ओर राजस्त्रियों के लिए अलग दीर्घा थी जिसमें झिलमिलाते हुए रेशमी पर्दे लगाए गए थे।

वासन्तिक पूर्णिमा की वह निर्धारित तिथि आ भी गई। मैं उस दिन की प्रतीक्षा लंबे समय से कर रहा था। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि प्रेक्षागृह के मध्य में स्थित संगमरमर का वह विशाल दिव्य मंच मेरे ही कौशल के प्रदर्शन हेतु बना था। उस दिन ब्राह्म मुहूर्त में उठकर मैंने स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ के उपरान्त गुरु द्रोण, पितामह भीष्म, विदुर काका, कृपाचार्य, महाराज धृतराष्ट्र, भैया युधिष्ठिर, भीम और अन्य सम्मानित राजपुरुषों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त किए। अन्तःपुर में जाकर मैंने माता कुन्ती और गान्धारी की चरण-धूलि से मस्तक पर टीका लगाया। माँ ने रंगभूमि में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का निर्देश दिया। मेरे मस्तक को सूंघा, कपोलों को सहलाया और रुंधे गले से आशीर्वाद दिया –

“पुत्र ! तू सदैव यशस्वी हो, जयी हो। तेरा पराक्रम अद्वितीय हो। तेरी कीर्ति युगों-युगों तक अमर रहे। तू सदा अजेय रहे।”

हम सभी के रंगभूमि में पहुंचने के पूर्व संपूर्ण प्रेक्षागृह आमन्त्रितों से भर गया। तिल रखने का भी स्थान शेष नहीं था। अनेक प्रकार के वाद्य यन्त्रों के बजने तथा आगन्तुकों के बढ़ते हुए कौतुहल से वह जनसमूह एक क्षुब्ध महासागर के समान प्रतीत हो रहा था।

आचार्य द्रोण श्वेत वस्त्र और श्वेत यज्ञोपवित धारण किए अपने पुत्र अश्वत्थामा के साथ निर्धारित आसन पर विराजमान थे। महाराज धृतराष्ट्र, पितामह भीष्म आदि महापुरुष भी अपने-अपने आसन पर पधार चुके थे। राजपरिवार की स्त्रियां भी अपने नियत स्थान पर उत्सुक आँखें लिए उपस्थित थीं। हम सभी राजकुमारों ने वय की ज्येष्ठता के अनुसार क्रम से गुरुवर द्रोण और कृपाचार्य को प्रणाम कर दोनों आचार्यों की यथोचित पूजा की। पश्चात कृपाचार्य ने प्रतियोगिता के शुभारंभ की घोषणा की। उस दिन के कार्यक्रम का संचालन कृपाचार्य ही कर रहे थे।

रंगभूमि में अपना कौशल दिखाने का अवसर कुरुकुल के एक सौ पांच राजकुमारों को दिया गया था। मुझे धैर्य के साथ अपनी बारी की प्रतीक्षा करने के लिए आचार्य द्रोण ने निर्देश दिया था। उन्होंने मुझे बता दिया था कि मेरी बारी सबसे अन्त में आएगी।

प्रतियोगिता का शुभारंभ करते हुए हम सभी राजकुमारों ने आचार्य द्रोण की आज्ञा पाकर पहले अस्त्र और धनुष लेकर डोरी चढ़ाई और उसपर भांति-भांति की आकृति के बाणों का संधान एवं प्रत्यंचा की टंकार करके समस्त उपस्थित जनों के लिए सम्मान प्रदर्शित किया। इसके पश्चात मुझे छोड़कर सभी राजकुमार बारी-बारी से अपने परम अद्भुत अस्त्र-कौशल का प्रदर्शन करने लगे। राजकुमारों ने रथ, हाथी और घोड़ों पर आरूढ़ होकर अपनी-अपनी युद्ध चातुरी प्रकट की। इसके बाद वे ढाल-तलवार लेकर एक दूसरे पर प्रहार करते हुए खड्ग चलाने के शास्त्रोक्त मार्ग का प्रदर्शन करने लगे। दुर्योधन और भीम हाथ में गदा लिए रंगभूमि में उतरे। वे पर्वत शिखर के समान हृष्ट-पुष्ट वीर आजानबाहु, और कसे मध्यस्थल के कारण अत्यन्त शोभायमान हो रहे थे। वे मदमस्त हाथियों के समान चिघाड़-चिघाड़ कर पैंतरे बदलने लगे और चक्कर काटने लगे। कुछ ही क्षणों में उनका यह द्वंद्व वास्तविक द्वंद्व में परिवर्तित हो गया। दोनों एक दूसरे पर प्राणघातक प्रहार करने लगे। आचार्य द्रोण ने अश्वत्थामा को भेज, अपनी आज्ञा से उस गदा प्रतियोगिता को बंद कराया।

प्रतियोगिता के अन्तिम चरण में मेघों के समान कोलाहल करने वाले वाद्य यंत्रों को बंद करा, आचार्य द्रोण ने घोषणा की –

“दर्शकगण! जो मुझे पुत्र से भी अधिक प्रिय है, जिसने संपूर्ण अस्त्र-शस्त्रों मे निपुणता प्राप्त की है तथा जो भगवान नारायण के समान पराक्रमी है, उस पांडु-पुत्र, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन का कौशल आप लोग देखें।”

दर्शकगण तरह-तरह से मेरी प्रशंसा कर रहे थे –

“ये महारानी कुन्ती के महातेजस्वी पुत्र हैं, ये ही महाराज पांडु के मझले पुत्र हैं। ये ही कुरुवंश के रक्षक हैं। अस्त्र-विद्या के विद्वानों में सबसे उत्तम हैं। ये धर्मात्माओं और शीलवानों में श्रेष्ठ हैं। शील और ज्ञान की तो ये सर्वोत्तम निधि हैं।”

शान्त भाव से प्रशंसा के सारे शब्द सुने मैंने। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरे कंधों पर उत्तरदायित्व का बोझ और गुरुतर होता जा रहा है। मैंने आँखें बन्दकर माता कुन्ती का स्मरण किया और प्रत्यक्षतः गुरु द्रोणाचार्य को प्रणाम करके रंगभूमि के मध्य में स्थित दिव्य मंच की ओर अपने पांव बढ़ाए।

मैंने सर्वप्रथम परम्परागत अस्त्रों का संचालन अत्यन्त त्वरा और शीघ्रता से कर पूरे जनसमुदाय को सम्मोहित-सा कर दिया। अस्त्र-विद्या का ज्ञान देते समय मेरे शस्त्र-संचालन से गुरु द्रोण भी कई अवसरों पर सम्मोहित हो जाते थे। परम्परागत अस्त्रों के प्रदर्शन के बाद मैंने कुछ दिव्यास्त्रों का प्रदर्शन किया। सबसे पहले मैंने आग्नेयास्त्र से अग्नि उत्पन्न की, फिर वारुणास्त्र से जल उत्पन्न कर अग्नि शमित की। वायव्यास्त्र से आँधी चला दी और पर्जन्यास्त्र से बादल उत्पन्न कर दिए, भौमास्त्र से पृथ्वी और पार्वतास्त्र से पर्वतों को उत्पन्न किया; फिर अन्तर्धानास्त्र के द्वारा सबको अदृश्य कर दिया। मैं क्षणभर में बहुत लंबा हो जाता और क्षणभर में ही बहुत छोटा बन जाता। एक पल में रथ के धूरे पर खड़ा दिखाई देता, दूसरे पल रथ के बीच दृष्टिगत होता, फिर पलक झपकते पृथ्वी पर उतरकर अस्त्र-कौशल दिखाने लगता। मैंने अत्यन्त शीघ्रता और दक्षता के साथ सुकुमार, सूक्ष्म और भारी लक्ष्य को भी बिना हिलाए-डुलाए नाना प्रकार के बाणों से बींध दिया।

रंगभूमि में लौह निर्मित एक शूकर इस प्रकार रखा गया कि वह सब ओर चक्कर लगा रहा था। उस घूमते हुए शूकर के मुख में मैंने एक ही साथ एक बाण की भांति पांच बाण मारे। उन पांचों बाणों ने एक दूसरे का स्पर्श भी नहीं किया।

एक स्थान पर गाय का हिलता हुआ सींग एक रस्सी में लटकाया गया था। मैंने उस सींग के छेद में इक्कीस बाण भेदे। खड्ग और गदा आदि के भी अनेक पैंतरे मैंने कुशलतापूर्वक प्रदर्शित किए। मैंने नारायणास्त्र, ब्रह्मशिरास्त्र और ब्रह्मास्त्र का प्रदर्शन नहीं किया। इनके प्रदर्शन की गुरुवर द्वारा अनुमति प्रदान नहीं की गई थी।

अपना प्रदर्शन समाप्त करके विनीतभाव से मैं अपने भ्राताओं के साथ आचार्य द्रोण के समीप गया। उन्होंने मुझे हृदय से लगाकर अपने पास ही बिठा लिया।

कार्यक्रम के संचालक कृपाचार्य अपने आसन से उठकर प्रतियोगिता के समापन की घोषणा करने ही वाले थे कि रंगभूमि में कर्ण ने प्रवेश किया। उसने दिव्य कवच धारण कर रखा था। दोनों कानों में कुण्डल उसके मुख को उद्भासित कर रहे थे। हाथ में धनुष और कटि में तलवार बांधे वह वीर चलायमान पर्वत की भांति सुशोभित हो रहा था। उसने रंगभूमि का सिंहावलोकन कर द्रोणाचार्य और कृपाचार्य को उपेक्षापूर्वक प्रणाम किया तथा द्रोणाचार्य से अपना अस्त्र-कौशल प्रदर्शित करने की आज्ञा मांगी। क्षणभर के चिन्तन के उपरान्त आचार्य ने उसे अनुमति प्रदान कर दी।

क्रमशः

 

 

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