कहो कौन्तेय-७५

विपिन किशोर सिन्हा

दुर्योधन और कर्ण की पराजय

युद्ध हो या शान्ति, हवा बहती ही है, फूल खिलते ही हैं, सुगंध फैलती ही है। अन्तर इतना ही होता है कि शान्ति काल में हम उसकी अनुभूति कर पाते हैं, युद्ध काल में विस्मृत कर देते हैं। हवा का एक तेज झोंका कुरुक्षेत्र के समीपवर्ती अरण्य से पारिजात पुष्पों की सुगंध लेकर हमारे शिविर में आया। सूरज ने भी सुगंध की अनुभूति के साथ आंखें खोली। सोलहवें दिन का बाल सूर्य क्षितिज के नीचे से झांक रहा था।

सूर्योदय के साथ-साथ समस्त कुरु सैन्य को एकत्र कर दुर्योधन ने कुरुसेना के सेनापति पद पर कर्ण को नियुक्त किया। कर्ण ने कौरव सेना के तीसरे सेनापति के रूप में कार्यभार ग्रहण करते ही उत्साह का प्रदर्शन करते हुए शंखध्वनि की। एक ही दिन में हमें जीत लेने का आश्वासन देते हुए उसने मकरव्यूह की रचना की। स्वयं मुख्यद्वार पर खड़ा हो सैन्य संचालन कर रहा था। इधर हमारे सेनापति धृष्टद्युम्न ने मुझसे मंत्रणा के पश्चात अर्द्ध चन्द्राकार व्यूह की रचना की। व्यूह के वाम भाग में भीमसेन, दाएं में धृष्टद्युम्न तथा मध्य भाग में महाराज युधिष्ठिर के साथ मैंने मोर्चा संभाला। दोनों ओर युद्ध के लिए शंखनाद के बाद घनघोर युद्ध छिड़ गया। भीम शत्रुओं को पीड़ित करते हुए द्रूतगति से आगे बढ़ रहे थे। उन्हें राजा क्षेमधूर्ति ने रोकने का प्रयास किया – उसे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। केकयदेशीय विन्द और अनुविन्द सात्यकि के शिकार बने। अश्वत्थामा भीमसेन को ढूंढ़ रहा था। अपने पिता की मृत्यु के लिए वह भीमसेन को क्षमा नहीं कर पा रहा था। दोनों कुछ ही पल बाद आमने-सामने थे। दोनों महारथी मेघ के समान प्रतीत हो रहे थे। वे बाणरूपी जल को धारण किए शस्त्ररूपी बिजली से प्रकाशित हो रहे थे। बाणों की प्रबल बौछार करके दोनों ने एक-दूसरे को ढंक लिया। दोनों ने एक-दूसरे की ध्वजा काटकर सारथि और घोड़ों को बींध डाला, फिर एक दूसरे को बाणों से घायल करने लगे। पूरी शक्ति से किए गए प्रहारों के कारण दोनों एकसाथ अपने-अपने रथ के पार्श्व में गिर पड़े। अश्वत्थामा का सारथि उसे मूर्च्छित देख रणभूमि से दूर हटा ले गया। भीम के सारथि ने भी उन्हें अचेत जानकर ऐसा ही किया।

मैं महाराज युधिष्ठिर की रक्षा में व्यूह के मध्य भाग में ही युद्ध कर रहा था। मुझे विश्वास था कि सेनापति बनने के बाद एक बार कर्ण मुझसे भिड़ने अवश्य आएगा। लेकिन स्वयं न आकर उसने संशप्तकों को मेरे सम्मुख खड़ा कर दिया। वह मेरे श्लथ हो जाने की प्रतीक्षा कर रहा था। मैं समझ गया, अमोघ शक्ति नहीं होने के कारण उसका आत्मविश्वास हिल गया था।

संशप्तकों ने मुझे मार डालने की प्रतिज्ञा की थी। मेरे सम्मुख आ, तरह-तरह से युद्ध की चुनौती देने लगे। उनकी सेना अलंघ्य थी। मैंने आज उनके सर्वनाश का संकल्प लिया। उनकी प्रतिज्ञा को असत्य ठहराते हुए पहले सुधन्वा को वीरगति प्रदान की, सुशर्मा को गतप्राण किया और अन्त में बचे हुए पांचों भ्राताओं का वध करके उनकी संपूर्ण सेना का संहार कर डाला। समस्त कौरव सेना सहमकर पीछे हट गई। कर्ण दुर्योधन को अकेला छोड़ आगे आने का साहस नहीं कर सका। अश्वत्थामा अपने को रोक नहीं पाया। मूर्च्छा टूटने पर उपचार कराकर वह अग्रिम मोर्चे पर आ चुका था। उसने आते ही मुझपर धावा बोल दिया। अद्भुत बाण-वर्षा की उसने। मैं तेजी से उसके बाण-समूहों को काट रहा था। लेकिन उस समय उसका पराक्रम बहुत उग्र था। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो उसके तूणीर, धनुष, प्रत्यंचा, रथ, ध्वजा, कवच, बांह, हाथ, छाती, मुंह, नाक, कान, आंख तथा मस्तक आदि अंगों एवं रोम-रोम से बाण छूट रहे हों। मुझे और श्रीकृष्ण को बाणों से बींध उसने भयंकर गर्जना की।

पहली बार मैं शत्रु के पराक्रम से सम्मोहित हो रहा था कि अचानक श्रीकृष्ण का स्वर सुनाई पड़ा –

“पार्थ! असावधानी मत बरतो। सामने तुम्हारा गुरुपुत्र नहीं, महान पराक्रमी अश्वत्थामा तुम्हारा काल बन प्रलयंकारी युद्ध कर रहा है। इस समय वह तुम्हारा शत्रु है। जिस तरह समय से रोग की चिकित्सा नहीं करने से रोग प्राणघातक हो जाता है, उसी प्रकार लापरवाही करने पर छोटा शत्रु भी प्रबल होकर दुखदाई बन जाता है। समय नष्ट न करते हुए प्रबल प्रहार करो।”

मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने झकझोर कर नींद से जगा दिया हो। संभलकर मैंने पलक झपकते अश्वत्थामा की बांह, छाती, सिर और जंघों को बाणों से छेद डाला, घोड़ों की बागडोर काटकर सारथि और घोड़ों को भी पीड़ित किया। घायल अश्वत्थामा रथ में गिर पड़ा। सारथि उसे रणभूमि से दूर ले ग्या।

दिन के तीसरे प्रहर में दुर्योधन महाराज युधिष्ठिर के सम्मुख आया। आते ही पैने बाणों के प्रहार से युधिष्ठिर का धनुष काट डाला। दूसरा धनुष ले युधिष्ठिर ने भी उसके धनुष और ध्वजा के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। दुर्योधन ने बड़ी चपलता से दूसरा धनुष ले प्रत्याक्रमण किया। दोनों ही एक-दूसरे के बाणों के प्रहार से घायल हो गए। देह में बाण धंसे थे और रक्त-प्रवाह हो रहा था, फिर भी उच्च स्वर में गर्जना कर शंखध्वनि करना दोनों नहीं भूले। कोई पीछे हटने का नाम नहीं ले रहा था। एक अवसर पर दुर्योधन तनिक शिथिल पड़ा और युधिष्ठिर ने वज्र के समान तीन वेगवान बाणों से उसकी छाती पर भीषण प्रहार किया। दुर्योधन के हाथ से धनुष छूट गया। वह गदा लेकर रथ से कूद पड़ा और धर्मराज की ओर दौड़ा। अविचलित युधिष्ठिर ने एक देदीप्यमान शक्ति प्रक्षेपित की जो लक्ष्य पर सटीक बैठी। दुर्योधन का कवच छिन्न-भिन्न हो गया। वक्षस्थल पर किए गए शक्ति प्रहार को वह सहन नहीं कर पाया, व्याकुल होकर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। कर्ण ने शीघ्र ही उसको शरण में लिया और चिकित्सा के लिए शिविर में भिजवाया।

कौरव पक्ष में कर्ण के अतिरिक्त ऐसा कोई महारथी नहीं बचा था जिससे हमें खतरा हो। आचार्य द्रोण के जीवित रहते मैं महाराज युधिष्ठिर की सुरक्षा के प्रति बहुत चिन्तित रहा करता था। लेकिन अब मैं थोड़ा निश्चिन्त था। कर्ण को रोकने में भीमसेन और सात्यकि समर्थ थे। अतः तीसरे प्रहर के बाद अल्प समय के लिए शिवोपासना हेतु मैं अपने शिविर में आया। सात्यकि महाराज युधिष्ठिर की रक्षा में तत्पर था। मेरी अनुपस्थिति में कर्ण ने भीषण आक्रमण किया लेकिन सात्यकि ने अपने पैने बाणों से उसे व्यथित कर पीछे हटने के लिए वाध्य किया।

संध्या के समय पहली बार कर्ण मेरे सम्मुख आया। मैंने उसे लक्ष्य कर अमोघ वेगवान, नादमय बाण गांडीव से प्रक्षेपित किए। उसने भी प्रत्युत्तर बराबरी का दिया। आकाश में बाणों के टकराने से चारों ओर चिन्गारियों की वर्षा होने लगी। कर्ण का सारथि सत्यसेन इस अग्नि वर्षा में दग्ध हो गया – मृत्यु को प्राप्त होने वाला उसका प्रिय विश्वासपात्र सारथि उसका साला था – उसकी प्रिय पत्नी का सहोदर भ्राता। कर्ण ने अपना एक और निकट संबन्धी युद्ध की वेदी पर होम कर दिया। उधर भगवान भास्कर अपनी किरणें समेट रहे थे। श्रीकृष्ण ने पांचजन्य के उद्घोष के साथ सोलहवें दिन के युद्ध की समाप्ति की घोषणा की। कर्ण ने भी शंखध्वनि कर इसकी पुष्टि की। कर्ण का मस्तक काटने के लिए गाण्डीव पर चढ़ाए अर्द्ध चन्द्राकार बाण को मैंने तूणीर में वापस रखा। कल संभवतः इसकी आवश्यकता पड़े।

क्रमशः

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