लेख

सुकून की तलाश

तप्त धरा को सुकून मिलता,

वर्षा की दो बूंदों से,

सूखे पेड़ों को हरियाली,

नव पल्लव के स्पर्शों से।

दरिया को भी चैन मिलता है,

सागर की आगोश में,

पंछी लौट के आ जाते हैं,

शाम ढले जब घोंसलों में।

पर इंसान भटकता फिरता,

जाने किस अरमान लिए,

सुख के झूठे बाज़ारों में,

सपनों की दुकान लिए।

उम्र गुज़रती जाती है यूँ,

सामान इकट्ठा करने में

अपने ही अपनों से दूर हुए,

दुनिया को बेहतर करने में।

हसरत का बोझ उठाए,

थक जाता है तन मन

मृगतृष्णा के पीछे भागे,

जैसे भटके कोई हिरन।

पता नहीं क्यों भूल गया वह,

सत्य सरल और सीधा मंत्र,

तन के मानसरोवर में ही,

छिपा सुकून का निर्मल तंत्र।

जो कमाया सब रह जाएगा,

साथ न कुछ भी जाएगा,

वक़्त का दरिया बहते-बहते,

हर रिश्ता भी ले जाएगा।

औलादों की ख़ातिर,

जो अंबार लगा रखे हैं

गर काबिल हैं तो कमा लेंगी,

वरना संचित भी गँवा देंगी।

फिर क्यों इतना बोझ उठाए,

क्यों बेचैन सफर करता,

क्यों इच्छाओं के जंगल में,

खुद का जीना भूल गया ।

खोल ज़रा मुट्ठी की गिरफ़्त,

रेत  यूँ फिसलेगी फिर,

मन हल्का हो जाएगा तो,

जिन्दगी भी मुस्काएगी।

मृगतृष्णा का ताज उतार दे,

मन का बोझ भी हल्का होगा,

जिस सुकून की तलाश में निकला,

वह तेरे भीतर ही होगा।

मुनीष भाटिया