रामस्वरूप रावतसरे
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 हारने के बाद टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी विपक्षी ‘आईएनडीआईए’ गठबंधन को लेकर अचानक बेहद सक्रिय हो गई हैं। बदले समीकरणों में राहुल गांधी ममता पर भारी पड़ रहे हैं। बंगाल चुनाव प्रचार से सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की रणनीतिक दूरी ममता बनर्जी के लिए बाधा बन कर उभरी है। ममता के मुख्यमंत्री रहते हुए जेडीयू के नीतीश कुमार को इस गठबंधन का संयोजक बनाने के प्रस्ताव पर बिफर जाने वाली और बंगाल में कांग्रेस-लेफ्ट को एक सीट न देने वाली ममता बनर्जी आज खुद को राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखने के लिए छटपटा रही हैं।
बंगाल चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने पश्चिम बंगाल में प्रचार न करके दूरगामी राजनीतिक संदेश दिया था, क्योंकि वे यूपी में कांग्रेस के साथ अपने गठबंधन को किसी भी कीमत पर बचाना चाहते हैं। अब यदि 2027 के यूपी चुनाव में कांग्रेस और सपा का गठबंधन बरकरार रहता है, तो ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट यह होगा कि क्या वे राहुल गांधी को विपक्ष का मुख्य चेहरा स्वीकार करेंगी, या फिर वे कांग्रेस और वामपंथियों के बिना एक नए ‘थर्ड फ्रंट’ की वकालत करेंगी।
2026 के बंगाल चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बंगाल के रण में ममता बनर्जी के पक्ष में एक भी चुनावी जनसभा या प्रचार नहीं किया जबकि 2021 के चुनाव में सपा ने टीएमसी के समर्थन में बकायदा अपनी टीम भेजी थी। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, अखिलेश यादव की यह दूरी बेहद रणनीतिक और सोची-समझी थी। अखिलेश यादव भली-भांति जानते थे कि उन्हें उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय कैडर और वोट बैंक की सख्त जरूरत है। बंगाल चुनाव में अखिलेश की दूरी का कारण था कि अगर वे बंगाल जाकर ममता बनर्जी के मंच पर खड़े होते, तो यूपी में कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन खटाई में पड़ सकता था क्योंकि बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी एक-दूसरे के धुर विरोधी थे।
‘आईएनडीआईए’ गठबंधन के शुरुआती दिनों में जब इस मोर्चे को आकार दिया जा रहा था, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रवैया बेहद आक्रामक और अपनी शर्तों पर चलने वाला था। जब गठबंधन के भीतर जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार को इस राष्ट्रीय मोर्चे का संयोजक या चेहरा बनाने की चर्चा चली थी, तब ममता बनर्जी इस कदर नाराज हो गई थीं कि उन्होंने बैठक तक से दूरी बनाने के संकेत दे दिए थे। बाद में उन्होंने बंगाल की सभी 42 लोकसभा सीटों और फिर 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट को एक भी सीट देने से साफ इनकार कर दिया था।
विश्लेषकों के अनुसार मगर आज स्थितियां पूरी तरह उलट गयी हैं। बंगाल की सत्ता हाथ से जाने के बाद ममता बनर्जी के पास अपनी राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए ‘आईएनडीआईए’ गठबंधन की छत्रछाया में आने के अलावा कोई दूसरा मजबूत विकल्प नहीं बचा है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन दोबारा मजबूती से मैदान में उतरता है, और देश के अन्य राज्यों में भी कांग्रेस ही विपक्ष की मुख्य धुरी बनी रहती है तो क्या ममता बनर्जी अपनी पुरानी जिद छोड़कर राहुल गांधी को विपक्ष का सर्वमान्य नेता स्वीकार कर लेंगी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी के लिए राहुल गांधी के पीछे खड़े होना उनके राजनीतिक अहंकार और कड़े स्वभाव के विपरीत होगा, लेकिन सत्ता से बेदखल होने के बाद अब वे फ्रंट फुट के बजाय बैक फुट पर खेलने को मजबूर हैं। राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी तैर रही है कि ममता बनर्जी वास्तव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘आईएनडीआईए’ गठबंधन को मजबूत नहीं करना चाहतीं, बल्कि वे इसके भीतर रहकर एक ऐसा ‘दबाव समूह’ बनाना चाहती हैं जो कांग्रेस और विशेषकर राहुल गांधी की लीडरशिप को कमजोर कर सके। ममता बनर्जी आज भी एक ऐसे ‘थर्ड फ्रंट’ या ‘बिन कांग्रेस’ वाले मोर्चे की पक्षधर है जहां क्षेत्रीय क्षत्रपों जैसे अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल और स्टालिन का दबदबा हो और वे खुद उस मोर्चे की मार्गदर्शक या मुख्य चेहरा बन सकें।
जानकारों की माने तो इस पूरे त्रिकोण में सबसे दिलचस्प स्थिति वामपंथी दलों सीपीआई-एम और अन्य लेफ्ट पार्टियों की है। बंगाल की धरती पर करीब 34 सालों तक राज करने वाले वामपंथियों की पूरी राजनीति ही तृणमूल कांग्रेस के हिंसक और कथित तौर पर भ्रष्ट शासन के विरोध पर टिकी रही है। 2026 के चुनाव में भी लेफ्ट ने टीएमसी के खिलाफ जमकर प्रचार किया था। अब यदि ममता बनर्जी केंद्रीय स्तर पर ‘आईएनडीआईए’ गठबंधन के मंच पर राहुल गांधी और अन्य नेताओं के साथ मंच साझा करती हैं, तो बंगाल का स्थानीय लेफ्ट कैडर कभी भी टीएमसी के साथ किसी भी तरह के तालमेल को स्वीकार नहीं करेगा। ऐसे में लेफ्ट के सामने दो ही रास्ते बचेंगे, या तो वे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ अपनी दोस्ती को बचाए रखने के लिए ममता बनर्जी की मौजूदगी को बेमन से सहन करें, या फिर वे इस राष्ट्रीय गठबंधन से खुद को अलग कर अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें।
ममता बनर्जी की वर्तमान पॉलिटिक्स पूरी तरह से अवसरवाद और आत्मरक्षा के दौर से गुजर रही है। आगामी 10 महीनों के भीतर होने वाला उत्तर प्रदेश का 2027 का विधानसभा चुनाव ही यह तय करेगा कि ‘आईएनडीआईए’ गठबंधन का ऊंट किस करवट बैठेगा। यदि यूपी में सपा-कांग्रेस का फॉर्मूला कामयाब रहता है, तो ममता बनर्जी को मजबूरन राहुल गांधी के नेतृत्व के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ेगा। और यदि वे ऐसा नहीं करती हैं तो विपक्ष की यह कथित एकजुटता 2027 के चुनाव से पहले ही बिखर जाएगी, जिसका सीधा राष्ट्रीय फायदा एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को मिलना तय बताया जा रहा है जैसा कि विपक्ष के आपसी स्वार्थो के चलते अब तक होता आ रहा है।
बंगाल विधान सभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी में भी बिखराव हो रहा है। जैसा मीडिया में चल रहा है यदि वह हो जाता है तो ममता बनर्जी के लिए राष्ट्रीय राजनीति से पहले अपने घर को संभालना जरूरी होगा। जब घर मजबूत हो तो तभी कोई बाहर तवज्जो देता है। ममता बनर्जी भी इस बात को अच्छी तरह जानती है।
रामस्वरूप रावतसरे