bookपण्डित अनन्तलाल ठाकुर का सत्संग मुझे कुछ ही दिनों के लिए मिला था । वे दरभंगा के संस्कृत शोध संस्थान के निर्देशक के पद से सेवानिवृत्त होकर अपने एक आत्मीय के साथ रह रहे थे। मैं वहाँ दो तीन दिनो के लिए ठहरा था । अति सामान्य दिखनेवाले इस व्यक्ति की बातें सुनते रहना एक अद्भुत अनुभव था। अपने बारे में बताते हुए उन्होंने कहा था कि “मैंने अपने सभी परिजनों को कष्ट दिया है। पिताजी पारम्परिक श्रेणी के प्रकांड पण्डित थे। बड़े बड़े जमींदार उनके शिष्य थे। वे बीच बीच में शिष्यों के आमंत्रण पर उनके घर जाया करते थे, मैं छोटा बच्चा था । कभी कभार मैं भी उनके साथ जाया करता। एक दिन एक शिष्य के बेटे को हमारे आगमन पर टिप्पणी देते हुए सुना, “टैक्स वसूलने आ गए।“ मुझे यह टिप्पणी पिताजी की गरिमा के लिए बहुत ही अनुचित और अपमानजनक लगी। तभी मैंने तय किया कि मैं टैक्स नहीं वसूलुँगा। मैं आधुनिक पढ़ाई (अंगरेजी) करुँगा और नौकरी भी करूँगा । सिलेसिलाए वस्त्र पहनुँगा। मेरे इस निर्णय से पिताजी को बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने मेरे हाथ से भोजन ग्रहण करना छोड़ दिया। पिताजी को मैंने आजीवन कष्ट दिया।

पत्नी ने कहा, “तुम तो बस पुस्तकों में ही व्यस्त रहे, मेरी ओर ध्यान देने की फुरसत ही नहीं मिली।“ लेकिन पुस्तकें भी तो नहीं पढ़ पाया। कितनी ही पुस्तकें धरी ही रह गईं। बेटी ने कहा, “एक भाई भी तो नहीं दिया, जिसके साथ खेलती।“

सेवानिवृति के समय कुल चालीस हजार रुपए मिले थे। सो मैंने बेटी के ब्याह के समय़ उसे दे दिए। सोचा, हम दो पति-पत्नी का खर्च मेरे लिखने की आय से चल जाएगा।. ये पैसे तो से ही मिलने हैं, हमारे मरने के बाद मिलेंगे तो उस वक्त यह रोती होगी। अभी दे दूँ तो प्रसन्न मनःस्थिति में ग्रहण करेगी।”

विदा होते समय मैंने उन्हें प्रणाम किया तो उन्होंने कहा, “जा रहे हैं, ठीक है। जाइए, मैं आपसे पुनः मिलने की कामना नहीं करता।” मैं सुनकर सन्न रह गया।

पर तभी उन्होंने एक श्लोक कहकर उसका अनुवाद कर कहा, नदी की धारा में लकड़ी के कुन्दे  बहा करते हैं ऐसा होता है कि   धारा में बहते हुए दो कुन्दे  कुछ देर के लिए एक दूसरे के साथ हो जाएँ और फिर अलग अलग बहते रहें। ऐसा हो सकता है कि वे कभी न मिलें, पर ऐसा भी हो सकता हैं कि धारा उन्हें फिर मिलावे, और फिर अलग कर दे। अगर आपसे पुनः मिलना हुआ तो इतना ही आनन्द होगा जितना इस बार हुआ।” बात युक्तिसंगत लगी। मुझे स्वस्ति हुई, पर सान्त्वना या आश्वस्ति नहीं । जिस अनुभव से आनन्द मिले उसको फिर से पाने की कामना नहीं करना, आत्मोपलब्धि के एक स्तर पर आए बिना सम्भव नहीं।

समय की धारा ने आज से चौवन साल पहले दो सालों की छोटी सी अवधि के लिए हमें असम राज्य के सिलचर में पहुँचाया था। सिलचर के एक कॉलेज में व्याख्याता पद पर मेरी नियुक्ति हुई थी। वह क्षेत्र मेरे लिए सम्पूर्ण अपरिचित था। असम राज्य के उस क्षेत्र के लोग बांग्लाभाषी थे और मैं और मेरी पत्नी बांग्ला बोलना समझना जानते थे। वही हमारा एकमात्र सम्पर्क-सूत्र साबित हुआ। उन दिनो वहाँ के स्कूलों के हिन्दी शिक्षक भी हिन्दी सही तरीके से नहीं बोल पाते थे। लेकिन ऐसा हुआ कि वहाँ कुछ सुधि जनों का अकुण्ठ एवम् अविस्मरणीय स्नेह मिला। वह आवेग आज भी मलिन नहीं हुआ है। एक बार सिलचर की जमीन पर वापस होकर मित्रों से मिलने की कामना मेरी चेतना को आन्दोलित करती रही। पर अपनी सीमाबद्धता के कारण वहाँ जाना सम्भव नहीं हो पाया । सपने देखता रहा था कि इस बार सचमुच सिलचर की जमीन पर हमारे पाँव पड़े हैं।

पिछले साल के मार्च मास में मेरे छोटे बेटे को, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है, सिलचर स्थित असम विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में जाने का आमंत्रण मिला । मैंने उससे कहा कि अब तो मेरे मित्रों और परिचितों में से शायद ही कोई जीवित हो। तुम पता करना। उसे तीन चार नाम बतलाए। कोई आवेग पचास सालों की दूरी मुझे लगा कि कदाचित् मैंने उससे कहा था कि पता करे कि मेरे परिचित ओर मित्रों में शायद कोई बचा हो। उनसे मिलकर मेरी बात कहना। उसने वहाँ उनमें से एक श्री अनन्त देव से सम्पर्क किया और उनसे मिला। अनन्तजी ने बड़ी गर्मजोशी से उसे आमंत्रित किया और अपनी कुछ किताबें अपनी तस्वीर के साथ दीं । मुझसे उनकी फोन पर बात हुई ।  मैंने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देने के लिए अपने सिलचर प्रवास के हिन्दी में लिखे एहसासात को अपनी टूटी फूटी बांग्ला में अनुवाद कर अपनी तस्वीर के साथ भेज दिया।  अभी 22 मई को मुझे एक पैकेट स्पीड-पोस्ट से मिला । उसमें उनके पत्र के साथ स्थानीय अखबार की एक प्रति मिली जिसमें मेरे संस्मरण मेरी तस्वीर के साथ छपी हुई थी। दो दिन बाद मैंने फोन पर अनन्तजी से सम्पर्क किया, उन्होंने हमसे सिलचर आने का आग्रह किया। मैंने दो किताबें उनके पास भेजीं। उन पुस्तकों के पहुँचने की सूचना इमेल के माध्यम से दे दी।  पर  उसी दिन इण्टरनेट पर ही  स्थानीय इ-पेपर में अनन्तजी के उस शाम आकस्मिक निधन का समाचार पढने को मिला। मेरे द्वारा भेजी गई किताबों उन तक पहुँच कर भी उन तक नहीं पहुँची।

उस दौरान वहाँ काफी स्नेह मिला । फिर वहाँ से आया तो सम्पर्क विच्छिन्न हो गया था। पचास साल गत मार्च के मध्य में मेरा छोटा बेटा एक सेमिनार में भाग लेने गया तो उसकी मुलाकात मेरे एक स्नेही मित्र से हुई। मेरा उनसे सम्पर्क फिर से  कायम हुआ। उन्होंने अपनी तस्वीर के साथ अपनी लिखी किताबें मेरे पास भेजी। फिर मैंने डाक द्वारा अपने सिलचर प्रवास के हिन्दी में लिखे गए अनुभवों को बांग्ला में अनुवाद कर उनके पास भेजा। साथ ही अपनी एक तस्यवीर भी लगा दी थी, यद्यपि मुझे बांग्ला में लिखने की सलाहियत नहीं है। बांग्ला से हिन्दी अनुवाद भली भाँति कर सकता हूँ, पर बांग्ला में लिखने पर समान अधिकार नहीं रखता। चूँकि वे हिन्दी बिलकुल नहीं जानते, इसलिए मैंने अंगरेजी के बजाय त्रुटिपूर्ण बांग्ला में लिखना बेहतर समझा था। मेरा उद्देश्य अपनी भावनाएँ उन तक पहुँचाने का था। पर तब आश्चर्य हुआ जब स्पीड पोस्ट से गत 22 मई को उनका भेजा एक  पैकेट मिला जिसमें पत्र के अलावे सिलचर से प्रकाशित एक दैनिक अखबार था जिसमें मेरी तस्वीर सहित मेरे दोनो आलेख प्रकाशित थे। भाषागत अशुद्धियाँ दूर कर दी गई थीं। अपने पत्र में उन्होंने कोई जिक्र नहीं किया था। मैंने फोन पर उनसे बातें की , उन्होंने पत्नी के साथ सिलचर आने का आग्रह किया मुझसे। फिर मैंने फ्लिपकार्ट के जरिए दो पुस्तकें उनके पास भेजी, जिनके बारे में फ्लिपकार्ट ने ही सूचना दी कि 29 मई को 4 बजे उन्हें पहुंचा दिया गया। अब मैं फोन पर उनसे सम्पर्क करने की सोच ही रहा था।  पर शाम को इण्टरनेट पर सिलचर के उसी अखबार में देखा कि 29 मई को ही सन्ध्या 9 बजे श्री अनन्त देव का आकस्मिक निधन हो गया। मेरे द्वारा भेजी गई पुस्तकें वहाँ पहुँच कर भी उनतक नहीं पहुँच पाई . वे सिलचर के जनजीवन में संस्कृतिकर्मी के रूप में अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। यह अखबार के विवरण से स्पष्ट हो रहा था।

 

-गंगानाथ झा

 

 

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