अंतर्राष्ट्रीय स्व-देखभाल दिवस (24 जुलाई) पर विशेष
– ललित गर्ग –
मानव सभ्यता के विकास के इस दौर में जितनी तीव्र गति से विज्ञान, तकनीक और भौतिक संसाधनों का विस्तार हुआ है, उतनी ही तेजी से मनुष्य तनाव, अवसाद, असंतुलित जीवनशैली और अनेक नई बीमारियों के जाल में भी उलझता गया है। विडम्बना यह है कि आज मनुष्य के पास संसार की लगभग हर वस्तु के लिए समय है, लेकिन स्वयं के लिए समय नहीं है। वह परिवार, समाज, व्यवसाय और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन तो कर रहा है, परंतु अपने शरीर, मन और आत्मा के प्रति उत्तरदायित्व को लगातार उपेक्षित करता जा रहा है। ऐसे समय में प्रतिवर्ष 24 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय स्व-देखभाल दिवस केवल स्वास्थ्य जागरूकता का अभियान नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सार्थक और मानवीय बनाने का वैश्विक संदेश है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वस्थ समाज, समृद्ध राष्ट्र और शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं की देखभाल को अपना प्रथम कर्तव्य माने। इस दिवस की शुरुआत वर्ष 2011 में इंटरनेशनल सेल्फ-केयर फाउंडेशन ने की। स्व-देखभाल केवल किसी विशेष दिन या अवसर का विषय नहीं, बल्कि चौबीस घंटे और सप्ताह के सातों दिन अपनाई जाने वाली जीवनशैली है।
स्व-देखभाल का अर्थ केवल बीमारी से बचना या समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है-अपने शरीर, मन, भावनाओं, विचारों और आत्मा की समग्र सुरक्षा एवं संवर्धन करना। आज विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि यदि व्यक्ति अपनी जीवनशैली को संतुलित बनाए, पौष्टिक भोजन ग्रहण करे, नियमित व्यायाम करे, मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखे और रोगों की रोकथाम को प्राथमिकता दे, तो स्वास्थ्य प्रणालियों पर अनावश्यक दबाव कम होगा और समाज अधिक स्वस्थ बनेगा। किंतु केवल चिकित्सकीय उपाय पर्याप्त नहीं हैं। मनुष्य का स्वास्थ्य तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक उसके भीतर मानसिक संतुलन, नैतिक चेतना और आध्यात्मिक शांति का विकास न हो। वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि मनुष्य बाहर से जितना आधुनिक हुआ है, भीतर से उतना ही अशांत होता गया है। प्रतिस्पर्धा, उपभोगवाद और अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं ने जीवन की सहजता को छीन लिया है। तनाव अब केवल कार्यालयों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परिवारों, विद्यालयों और बच्चों तक पहुँच गया है। यही कारण है कि आज मानसिक रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग और अवसाद जैसी समस्याएँ वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी हैं। ऐसे समय में स्व-देखभाल केवल व्यक्तिगत आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व भी है।
भारत की दृष्टि से देखें तो स्व-देखभाल का विचार कोई नया नहीं है। यह हमारी सनातन सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग रहा है। भारत ने हजारों वर्ष पहले ही यह उद्घोष किया था-‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् शरीर ही सभी श्रेष्ठ कार्यों का प्रथम साधन है। भारतीय चिंतन ने स्वास्थ्य को केवल शरीर की निरोगता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलन को भी स्वास्थ्य का अनिवार्य आधार माना। आयुर्वेद, योग, ध्यान, प्राणायाम, उपवास, संयम, अहिंसा और सात्त्विक जीवनशैली इसी समग्र दृष्टि के अंग हैं। यही कारण है कि भारत में स्वास्थ्य और अध्यात्म कभी अलग-अलग विषय नहीं रहे, बल्कि एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। आज जब संपूर्ण विश्व योग को अपनाकर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। योग शरीर को स्वस्थ करता है, प्राणायाम मन को संतुलित करता है, ध्यान चेतना को निर्मल बनाता है और अध्यात्म जीवन को दिशा देता है। इसी प्रकार जैन दर्शन का संयम, अहिंसा, प्रेक्षाध्यान और आत्मनिरीक्षण, बौद्ध दर्शन का विपश्यना मार्ग तथा गीता का समत्व योग मनुष्य को भीतर से स्वस्थ बनाते हैं। भारत की यही आध्यात्मिक परंपरा आज विश्व के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।
यदि हम वास्तव में स्व-देखभाल को जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं तो हमें इसे केवल स्वास्थ्य संबंधी गतिविधि न मानकर जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकार करना होगा। प्रातःकाल का भ्रमण, नियमित योगाभ्यास, ध्यान, स्वाध्याय, आध्यात्मिक प्रवचनों का श्रवण, संतुलित एवं सात्त्विक भोजन, पर्याप्त नींद, डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग से बचाव, प्रकृति के साथ समय बिताना, स्व-संवाद, आत्म-साक्षात्कार तथा प्रतिदिन आत्मचिंतन-ये सभी स्व-देखभाल के ऐसे सूत्र हैं जो व्यक्ति को भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर स्वस्थ बनाते हैं। यह जीवनशैली न केवल रोगों से बचाती है, बल्कि मनुष्य को सकारात्मक, करुणामय और संतुलित भी बनाती है। आज विकसित भारत का जो स्वप्न देश देख रहा है, उसकी आधारशिला केवल आर्थिक प्रगति नहीं हो सकती। यदि राष्ट्र को वास्तव में विकसित बनाना है तो उसके नागरिकों का स्वस्थ, अनुशासित, संस्कारित और जागरूक होना अनिवार्य है। बीमार और तनावग्रस्त समाज कभी समृद्ध राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता। स्वस्थ नागरिक ही उत्पादक होंगे, रचनात्मक होंगे और राष्ट्र निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे। इसलिए स्व-देखभाल को राष्ट्रीय विकास की रणनीति का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग बनाया जाना चाहिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, कार्यस्थलों और सामाजिक संस्थाओं में योग, ध्यान, मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली शिक्षा को व्यापक रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
भारत आज विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है। विश्वगुरु बनने का अर्थ केवल आर्थिक या सामरिक शक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि मानवता को जीवन जीने की श्रेष्ठ दिशा देना है। भारत ने सदैव दुनिया को अहिंसा, करुणा, सह-अस्तित्व, योग और अध्यात्म का संदेश दिया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत ‘स्व-देखभाल से विश्वकल्याण’क का नया मंत्र भी विश्व को दे। यदि भारत यह संदेश दे कि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन अपने शरीर, मन और आत्मा के लिए कुछ समय अवश्य निकाले, तो यह केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का अभियान नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शांति का आधार बन सकता है। अहिंसा का वास्तविक अर्थ केवल किसी दूसरे को कष्ट न देना नहीं है। स्वयं के शरीर और मन के साथ हिंसा करना भी अहिंसा के विरुद्ध है। अनियमित दिनचर्या, नशा, तनाव, क्रोध, असंयमित भोजन और प्रकृति के नियमों की उपेक्षा भी आत्म-हिंसा के ही रूप हैं। इसलिए स्व-देखभाल वास्तव में अहिंसा का प्रथम सोपान है। जो व्यक्ति स्वयं के प्रति संवेदनशील होगा, वही दूसरों के प्रति भी करुणाशील बनेगा। इस प्रकार स्व-देखभाल से परिवार में सौहार्द, समाज में सद्भाव और विश्व में शांति का वातावरण निर्मित हो सकता है।
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, महामारी, मानसिक असंतुलन और जीवनशैली संबंधी रोगों जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रही है। इन समस्याओं का समाधान केवल अस्पतालों, दवाइयों और तकनीक से संभव नहीं है। इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन, आत्म-अनुशासन और आध्यात्मिक जागरण आवश्यक है। भारत के पास इस परिवर्तन का हजारों वर्षों का अनुभव और ज्ञान है। योग, आयुर्वेद, ध्यान, प्राकृतिक चिकित्सा, सात्त्विक आहार और आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि भारत की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें यदि आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वित रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत किया जाए तो वे मानवता के लिए वरदान सिद्ध हो सकती हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्व-देखभाल दिवस का वास्तविक संदेश भी यही है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य का प्रथम संरक्षक स्वयं बने। चिकित्सक, अस्पताल और दवाइयाँ आवश्यक हैं, लेकिन वे तभी प्रभावी हो सकते हैं जब व्यक्ति स्वयं अपने जीवन के प्रति उत्तरदायी बने। प्रतिदिन कुछ समय शरीर के लिए योग, मन के लिए ध्यान, बुद्धि के लिए स्वाध्याय और आत्मा के लिए आध्यात्मिक चिंतन को समर्पित किया जाए तो जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं।
आज आवश्यकता केवल ‘फिट इंडिया’ की नहीं, बल्कि ‘स्पिरिचुअली फिट इंडिया’, ‘मेंटली हेल्दी इंडिया’ और ‘कम्पैशनेट इंडिया’ के निर्माण की है। यही नया भारत होगा, यही विकसित भारत होगा और यही वह भारत होगा जो अपनी आध्यात्मिक ज्योति, योग की शक्ति, अहिंसा की संस्कृति और समग्र स्वास्थ्य के दर्शन से पूरी दुनिया का मार्गदर्शन करेगा। जब भारत से यह संदेश उठेगा कि ‘स्वयं को स्वस्थ बनाना ही विश्व को स्वस्थ बनाने की पहली शर्त है,’ तब वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय स्व-देखभाल दिवस अपने उद्देश्य को प्राप्त करेगा और भारत विश्वगुरु के रूप में मानवता को केवल विकास का नहीं, बल्कि संतुलित, स्वस्थ, शांत और आध्यात्मिक जीवन का भी मार्ग दिखा सकेगा।