लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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मौजूदा दौर की विशेषता है सेक्स का औद्योगिकीकरण। आज सेक्स उद्योग है। पोर्न उसका एक महत्वपूर्ण तत्व है। पोर्न एवं उन्नत सूचना तकनीकी के अन्तस्संबंध ने उसे सेक्स उद्योग बना दिया है।

भूमंडलीकरण के कारण नव्य-उदारतावादी आर्थिक नीतियों के आधार पर नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण किया गया है। इस व्यवस्था में निरंतर स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट पर जोर है। उसी के आधार पर रीस्ट्रक्चरिंग हो रही है। इस समूची प्रक्रिया का लक्ष्य है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इसके लिए जरूरी है कि जनता की स्वीकृति हासिल की जाए।

जनता की सहमति के बगैर यदि रीस्ट्रक्चरिंग की जाती है है तो तनाव पैदा होगा,झगड़े होंगे और अराजकता फैलेगी। इस सबसे निबटने के लिए बल प्रयोग करना होगा। यही वह बिन्दु है जिसे केन्द्र में रखकर नव्य उदारतावादी नीतियों की सारी रणनीति काम कर रही है। अब जोर व्यक्तिवादी विचारधारा पर है।प्रतिस्पर्धी रूपों पर है। व्यवसायिकता पर जोर दिया जा रहा है।ये सारी चीजें मिलकर संरचनात्मक असमानता पैदा कर रही हैं।निरंतर शोषण,गरीबी, हताशा, डेसपरेशन आदि पैदा कर रही हैं। इस स्थिति से ध्यान हटाने के लिए समूचा मनोरंजन उद्योग, इच्छा उद्योग और सेक्स उद्योग सक्रिय है। वह असल मुद्दों या समस्या से ध्यान हटाने या गलत दिशा देने का काम कर रहा है।

नव्य-उदारतावाद सामान्य लोगों को यह बताने में व्यस्त है कि नव्य विश्व व्यवस्था लोगों को संतुष्ट करने की कोशिश कर रही है। वह व्यक्ति के उपभोग, व्यक्तिगत चयन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। यह धारणा भी प्रसारित की जा रही है कि माल और व्यक्ति का विनिमय हो सकता है। निजी उद्योग का लक्ष्य सार्वजनिक भलाई करना है। कारपोरेट सक्षमता विकसित करने के लिए वस्तुकरण जरूरी है।

तीसरी दुनिया के देशों में श्रम का नव औपनिवेशीकरण हो रहा है।नस्लवाद और सेक्सवाद को सहज,स्वाभाविक और सहनीय बनाया जा रहा है। नस्लवाद, सेक्सवाद, नव्य उपनिवेशवाद मूलत: नयी विश्व व्यवस्था के एजेण्ट के रूप में सक्रिय हैं। सामाजिक मुक्ति के नाम पर बहुराष्ट्रीय मीडिया एवं सूचना कंपनियों ने इच्छाओं और सहजजात वृत्तियों पर हमला बोला है।इच्छाओं के आधार पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक लाभ, कामुक शांति,वेश्यावृत्ति, जिस्म फरोशी तार्किक परिणति के रूप में सामने आई है।

ऐतिहासिक नजरिए से वेश्यावृत्ति के बारे में विचार करें तो यह पेशा संभवत: दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक है।बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। सेक्स के सभी विचारधारा के इतिहासकार इस पर एकमत हैं कि वेश्यावृत्ति की शुरूआत मंदिरों अथवा मंदिर क्षेत्र से हुई।

कालान्तर में रजवाडों की राजनीतिक हमलावर कार्रवाईयों ने इसे नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया। गुलाम व्यवस्था में गुलामों के मालिक गुलाम वेश्याएं पालते थे। अनेक गुलाम मालिकों ने वेश्यालय भी खोले। असल में जो औरतें गुलाम थीं उनसे वेश्यावृत्ति करायी जाती थी। वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं। वेश्यावृत्ति के विस्तार ने अन्य व्यक्ति के लिए संपदा और सामाजिक

हैसियत की सृष्टि की।इसी क्रम में बच्चों की बिक्री का मामला भी सामने आया।बच्चों को श्रम के लिए बेचा जाता था।

सामाजिक विकास के क्रम में स्त्री के लिए कानून बनाए गए,उसे सम्मानित नजरिए से देखा जाने लगा। फलत: स्त्री शुचिता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।खासकर बेटी की शुचिता को सम्मानित नजरिए से देखा गया।पवित्र बेटी परिवार की संपत्ति मानी गयी। कालान्तर में वेश्यावृत्ति ने अपना रूपान्तरण किया और मर्द की सामाजिक और शारीरिक जरूरतों की पूर्त्ति के रूप में अपना विकास किया। इसी क्रम में स्त्रियों के बीच में छोटे-बड़े के भेदभाव ,ऊँच-नीच आदि की केटेगरी का उदय हुआ। स्त्री को नैतिकता आधार पर वर्गीकृत किया गया। ये सारे अंतर स्त्री की कामुक उपलब्धता पर आधारित थे।इसमें सबसे ऊपर विवाहिता को दर्जा दिया गया,इसके बाद शादी लायक पवित्र कन्या ,इन दोनों के बीच उपपत्नी,सबसे नीचे अविवाहित देवदासी और गुलाम औरत को स्थान दिया गया।

वेश्यावृत्ति के पेशे में वे औरतें ठेली गयीं जो शोषित थीं। गुलाम थीं। कामुक संपत्ति थीं। जिनका सामाजिक उपहार के रूप में आदान-प्रदान होता था। जिन्हें तरह-तरह के काम दिलाने के बहानों से फुसलाया जाता था। सामन्ती दौर में स्त्री के विनिमय या उपहार स्वरूप देने की प्रथा ने स्त्री के शोषण को एक आकर्षक वैध व्यवस्था बनाया।

आधुनिक समाज में पुरूष के अधिकार और स्वतंत्रता की स्थापना हुई। स्त्री को किन्तु ये दोनों अधिकार नहीं मिले। वह पहले की तरह पराधीन बनी रही। इसके कारण वेश्यावृत्ति का एक खास किस्म की सामाजिक रूप से अवैध व्यवस्था के रूप में विकास किया गया।

आधुनिक काल के पहले वेश्यावृत्ति सामाजिक व्यवस्था का वैध हिस्सा थी। किन्तु आधुनिक काल में इसे समाज का अवैध हिस्सा घोषित कर दिया गया। सवाल उठता है कि वेश्यावृत्ति अवैध है तो इसके उन्मूलन के प्रयास क्यों सफल नहीं हुए,पूंजीवादी व्यवस्था ने वेश्यावृत्ति को क्यों बनाए रखा ?

क्या कारण है कि वेश्यावृत्ति खत्म होने की बजाय बढ़ी है। वेश्यावृत्ति के खात्मे का संघर्ष स्त्री मुक्ति के संघर्ष से अभिन्न रूप से जुड़ा है। पूंजीवादी समाज में वेश्यावृत्ति के फलने-फूलने का प्रधान कारण है सामाजिक तौर पर स्त्री का वस्तुकरण , विनिमय के रूप में उसका इस्तेमाल और स्त्री विरोधी भेदभावपूर्ण सामाजिक परिवेश। वेश्यावृत्ति सिर्फ स्त्री हिंसा या पितृसत्ता के

कारण नहीं पैदा हो रही बल्कि उल्लिखित कारण उसके लिए जिम्मेदार हैं। इसके अलावा उपनिवेशवाद,सैन्यवाद, भूमंडलीय संरचनाएं वेश्यावृत्ति के नए कारकों में प्रमुख हैं। वेश्यावृत्ति में वे औरतें ज्यादा हैं जो वंचित हैं,हाशिए पर हैं, विस्थापित हैं,श्रम क्षेत्र से निकाल दी गयी हैं।

5 Responses to “सेक्स का औद्योगिकीकरण”

  1. sk maltare

    महिलाये तब भी बिकती थी , अब भी बिकती है , समाज के जिन लोगो को इसे रोकने के लिये जिम्मेदारी दी गई , वे भी खरदते ओर बेचते है . चूकि सरकार ओर समाज इसे समाज से अलग रखना चाहते है इसलिए इसके सही आंकड़े भी नही मिलेगे . जो लोग एस धंधे में लगे है वे समाज के राजनैतिक एवं गुंडा वर्ग से जुड़े है , अर्थात शक्तिशाली वर्ग . मै इस पक्ष में नही होते हुए भी कहना चाहूँगा की इस धंधे को वैध करने से तुरंत फायदे जो दिखाए देते है की, पुलिस से परेशानी , आंकड़े , सरकारी सुरक्षा , सामाजिक स्थिति आदि . हम इसे बंद तो नहीं कर पायेगे , उत्पीडन को कण किया जा सकता है

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  2. R.Kapoor

    रामकृष्ण जी, छीनकर खाना, नंगे रहना भी आदि मानव के व्यवहार मैं था ना ? क्योकि तब आदमी असभ्य था.
    आपकी बात मानें तो अब सभ्य लोगों का नंगे रहना उचित होगा. मेरे दोस्त तर्क और कुतर्क मैं फर्क आप जरूर समझते होंगे.
    वेश्यावृत्ति तब भी थी-अब भी है; छीनकर खानेवाले वाले तब भी थे-अब भी हैं; नंगे रहने के समर्थक आज भी हैं. पर क्या चन्द पागलों के कहने से हम सबको भी पागल बन जाना चाहिए? आदिम काल के असभ्यों का व्यवहार हमारा आदर्श बनसकता है क्या?
    सुसंस्कृत होने का अर्थ है मानवीय दुर्बलताओं को जीतने का प्रयास निरंतर करते जाना, न की वासनाओं के दलदल में डूबते जाना, उनको बढ़ावा देना,मनुष्यता की बजाय पशु प्रवृत्तियों को उभारना. यही करना है तो सभ्य होने का अर्थ क्या रह जाएगा. अत: मेरे प्यारे भाई यदि आदि काल मैं वेश्यावृत्ति थी तो इसका यह अर्थ नहीं कि उसको सम्मान, प्रतिष्ठा या मान्यता देदीजाय. हम सब उसके समर्थक बन जाएँ. आशा है आप बुरा नहीं मानेंगे और मेरे कहे पर विचार करेंगे.

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  3. ramkrishna

    Bilkul Ghatiya vichaar, Hindi ke saath Itihaas ka uphaas mat karie.

    ‘ऐतिहासिक नजरिए से वेश्यावृत्ति के बारे में विचार करें तो यह पेशा संभवत: दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक है।बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। सेक्स के सभी विचारधारा के इतिहासकार इस पर एकमत हैं कि वेश्यावृत्ति की शुरूआत मंदिरों अथवा मंदिर क्षेत्र से हुई।’

    aap bilkul bakvaas likh rahe hain. devdasi pratha ko vaisyavrutti batana aapki nirlaajjata aur agyanta ko sarshata hai.

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