-अशोक “प्रवृद्ध”
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतलाष्टमी व्रत मनाये जाने की पौराणिक परिपाटी है। शीतलाष्टमी को जनसाधारण में बसोड़ा भी कहा जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि स्वास्थ्य और आयुर्वेद की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्कंद पुराण में मां शीतला का विस्तृत वर्णन अंकित है। इन्हें भगवती दुर्गा का ही एक शक्ति अवतार माना जाता है, जो रोगों और चेचक या छोटी माता जैसे संक्रामक बीमारियों को दूर करने वाली देवी हैं। शीतला माता का स्वरूप वर्णन करते हुए पौराणिक ग्रंथों में कहा गया है कि माता शीतला गर्दभ पर सवार रहती हैं। उनके एक हाथ में कलश अर्थात शुद्ध जल का प्रतीक, दूसरे में मार्नी या झाड़ू अर्थात स्वच्छता का प्रतीक, तीसरे में सूप अर्थात वायु शुद्धि का प्रतीक और चौथे हाथ में नीम के पत्ते होते हैं। यह स्वरूप स्पष्ट रूप से स्वच्छता और आरोग्य का संदेश देता है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब पृथ्वी पर ज्वर और चेचक का प्रकोप बढ़ा, तब माता पार्वती ने शीतला रूप धारण कर भक्तों के कष्टों को हरा और उन्हें आरोग्य का वरदान दिया। माता शीतलता का प्रतीक है। शीतला शब्द का अर्थ ही शीतलता प्रदान करने वाली है। इस दिन चूल्हा न जलाने और बासी भोजन अर्थात ठंडा भोजन ग्रहण करने की परंपरा है। यह इस बात का संकेत है कि अब ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो रहा है और अब से ताजा व सुपाच्य भोजन ही स्वास्थ्य के लिए उत्तम होगा। यह ऋतु परिवर्तन का काल है और स्वास्थ्य व वैज्ञानिक दृष्टि से यह पर्व संधि काल अर्थात मौसम बदलने के समय पर आता है। इस समय संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। माता की पूजा और नीम के पत्तों का प्रयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने और वातावरण को कीटाणुमुक्त रखने की प्रेरणा देता है। इसमें बासोड़ा अर्थात ठंडा भोजन नैवेद्य के रूप में प्रयोग में लाये जाते हैं। सप्तमी की रात को ही विशेष पकवान, जैसे- मीठे चावल, राबड़ी, पुए आदि बनाए जाते हैं और अष्टमी के दिन माता को इनका भोग लगाया जाता है। यह स्वच्छता का संदेश देता है। इस दिन घर की सफाई की जाती है और शीतला माता के मंदिर जाकर जल अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि शीतला माता की कृपा से कुल के सभी रोग और दोष दूर हो जाते हैं। शीतलाष्टमी का पर्व हमें सिखाता है कि स्वच्छता ही सेवा है और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहना ही लंबी आयु और निरोगी काया का आधार है। वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी (बसोड़ा) 11 मार्च, बुधवार को मनाई जाएगी। अष्टमी तिथि का प्रारंभ 11 मार्च 2026 दिन बुधवार रात्रि 01:54 बजे होगा और समापन 12 मार्च 2026 दिन बृहस्पतिवार को प्रातः 04:19 बजे होगा। पूजा का शुभ समय 11 मार्च को सुबह 06:36 पूर्वाह्न से शाम 06:27 अपराह्न तक माना गया है। इस दिन सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है, जो सुबह 09:12 के बाद प्रभावी होगा।
शीतला माता की सबसे प्रचलित पौराणिक कथा एक निर्धन बुढ़िया और एक राजा के नगर से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार एक राजा के नगर में भीषण आग लग गई। पूरा नगर जलकर राख हो गया, लेकिन एक निर्धन कुम्हारिन की झोपड़ी सुरक्षित बच गई। राजा ने आश्चर्यचकित होकर इसका कारण पूछा, तो कुम्हारिन ने बताया कि उसने शीतला अष्टमी का व्रत किया था और माता को बासी (ठंडा) भोजन अर्पित किया था। माता उसकी भक्ति से प्रसन्न थीं और उन्होंने अपनी शीतलता से उसकी झोपड़ी की रक्षा की। राजा को अपनी भूल का आभास हुआ कि उसने और उसके नगरवासियों ने माता का निरादर किया था। इसके बाद राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि चैत्र कृष्ण अष्टमी के दिन कोई चूल्हा नहीं जलाएगा और सभी माता को बासी भोजन का भोग लगाकर उनकी पूजा करेंगे। मान्यता है कि जो भी भक्त इस दिन ठंडे जल से स्नान कर बासी भोजन (जैसे मीठे चावल, राबड़ी) का भोग लगाता है, उसके घर में चेचक (माता), हैजा और ज्वर जैसे रोग प्रवेश नहीं करते। इसकी पूजा विधि के मुख्य नियम में अष्टमी के दिन घर में अग्नि प्रज्वलित करना वर्जित माना जाता है। माता को एक दिन पूर्व सप्तमी को बना हुआ भोजन ही अर्पित किया जाता है, जिसे बसोड़ा कहते हैं। पूजा के बाद उस जल को घर के कोनों में छिड़कना शुभ माना जाता है, जो नकारात्मकता को दूर करता है।
यूँ तो शीतला अष्टमी का मुख्य पर्व चैत्र मास में मनाया जाता है, लेकिन इसके बाद आने वाले वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ महीनों में भी माता की विशेष पूजा की जाती है, जिसके पीछे गहरे धार्मिक, ऋतु-संबंधी और वैज्ञानिक कारण हैं। यह ग्रीष्म ऋतु और संक्रामक रोगों का प्रकोप के समय का सूचक है। तापमान में वृद्धि होती है। चैत्र से आषाढ़ तक का समय उत्तर भारत में भीषण गर्मी का होता है। यह बीमारियों का समय होता है। इन महीनों में चेचक, खसरा, हैजा और त्वचा संबंधी रोगों का प्रकोप सबसे अधिक होता है। ऐसे समय में माता शीतला आरोग्य की देवी के रूप में सामने आती हैं। माता शीतला को इन तापजन्य अर्थात गर्मी से होने वाले रोगों की अधिष्ठात्री देवी माना गया है, इसलिए पूर्ण ग्रीष्म काल के दौरान उनकी निरंतर उपासना की जाती है ताकि परिवार इन महामारियों से सुरक्षित रहे। इसके साथ शीतला जुड़वास और स्थानीय परंपराएं भी जुडी हुई हैं, जिससे ज्येष्ठ मास का महत्व प्रकट होता है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान के ग्रामीण अंचलों सहित देश के कुछ क्षेत्रों में, ज्येष्ठ की तपती गर्मी में शीतला जुड़वास त्योहार मनाया जाता है। इसका उद्देश्य तपती धरती और शरीर को शीतलता प्रदान करना होता है। इसकी मासिक उपासना भी प्रचलन में है। कुछ समुदाय प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी और चतुर्दशी को माता की पूजा करते हैं, जिसमें चैत्र मास की अष्टमी सबसे प्रमुख मानी जाती है। यह ऋतु संधि और स्वच्छता का संदेश देती है। आषाढ़ मास ग्रीष्म और वर्षा ऋतु का मिलन विन्दु है। वर्षा के आगमन के इस संधि काल में वातावरण में कीटाणु तेजी से पनपते हैं। माता के हाथों में झाड़ू और कलश स्वच्छता का प्रतीक हैं। इन महीनों में उनकी पूजा भक्तों को साफ-सफाई बनाए रखने और बासी या दूषित भोजन से बचने की निरंतर याद दिलाती है। स्वच्छता की प्रेरणा देती है।
स्कंद पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने माता शीतला को पृथ्वी पर आरोग्य और स्वच्छता की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा था। चूंकि गर्मी का प्रभाव केवल चैत्र तक सीमित नहीं रहता, इसलिए अगले तीन महीनों तक उनकी विशेष साधना की परंपरा बनी रही। यह केवल एक तिथि का पूजन नहीं, बल्कि भीषण गर्मी के चार महीनों (चैत्र-आषाढ़) में स्वास्थ्य और शीतलता बनाए रखने का एक आध्यात्मिक सुरक्षा चक्र है। चैत्र मास के अतिरिक्त वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ महीनों में शीतला माता की पूजा के पीछे मुख्य कारण भीषण ग्रीष्म ऋतु और उससे उत्पन्न होने वाले रोगों से सुरक्षा है। इन चारों महीनों में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतला माता की पूजा का विधान है। इन चार महीनों में गर्मी अपने चरम पर होती है, जिससे चेचक खसरा और हैजा जैसी महामारियों का खतरा बढ़ जाता है। माता की पूजा स्वच्छता और शरीर को ठंडा रखने की प्रेरणा देती है। कुछ समुदायों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को भी शीतला माता की विशेष पूजा की जाती है।
ग्रीष्म काल के दौरान राजस्थान और हरियाणा में भव्य मेलों का आयोजन होता है। चाकसू (जयपुर) का लक्खी मेला राजस्थान का सबसे प्रसिद्ध शीतला माता मेला है, जो जयपुर के पास शील की डूंगरी पर आयोजित होता है। चैत्र कृष्ण अष्टमी को यहाँ मेला का आयोजन होता है। यहां स्थित मंदिर लगभग 500 वर्ष पुराना है और मेले में लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। जोधपुर की कागा पहाड़ियों में 200 वर्ष पुराना मेला लगता है, जिसे जोधपुर का कागा मेला कहा जाता है। कहा जाता है कि महाराजा विजयसिंह ने माता के प्रकोप के कारण उन्हें शहर से निष्कासित कर दिया था, तब से शहर के बाहर पहाड़ियों पर यह पूजा होती है। हरियाणा के गुरुग्राम स्थित शीतला माता मंदिर एक प्रमुख शक्तिपीठ है, जहां चैत्र और आषाढ़ के महीनों में भारी भीड़ जुटती है। अजमेर में भी दो दिवसीय मेले का आयोजन होता है, जहाँ रांदा-पुआ (विशेष पकवान) बनाकर माता को भोग लगाया जाता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात आदि उत्तर भारत में इसे बासोड़ा के रूप में मनाया जाता है, जहां बासी भोजन का ही उपयोग होता है।कुछ स्थानों पर इस दिन माता की सवारी गधे की विशेष सेवा की जाती है और उन्हें अनाज खिलाया जाता है। कई परिवारों में इन महीनों के दौरान शीतला माता के मंदिर में बच्चों का मुंडन संस्कार कराने की भी परंपरा है।