देश में वैज्ञानिकों की कमी

प्रमोद भार्गव

दे
श के लगभग सभी शीर्ष संस्थानों में वैज्ञानिकों की कमी बनी हुई है। 70 प्रमुख शोध-संस्थानों में 3200 वैज्ञानिकों के पद खाली हैं। बेंगलुरु के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) से जुड़े संस्थानों में सबसे ज्यादा 177 पद रिक्त हैं। पुणे की राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों के 123 पद खाली हैं। देश के इन संस्थानों में यह स्थिति तब है, जब सरकार ने पदों को भरने के लिए कई आकर्षक योजनाएं शुरू की हुई हैं। इनमें रामानुजम शोधवृत्ति, सेतु-योजना, प्रेरणा-योजना और विद्यार्थी-वैज्ञानिक संपर्क योजना शामिल हैं। महिलाओं के लिए भी अलग से योजनाएं लाई गई हैं। इनमें शोध के लिए सुविधाओं का भी प्रावधान है। साथ ही विदेश में कार्यरत वैज्ञानिकों को स्वदेश लौटने पर आकर्षक पैकेज देने के प्रस्ताव दिए जा रहे हैं। बावजूद न तो छात्रों में वैज्ञानिक बनने की रुचि पैदा हो रही है और न ही स्वदेश से वैज्ञानिक लौट रहे हैं। वैज्ञानिकों को यह भरोसा पैदा नहीं हो रहा है कि जो प्रस्ताव दिए जा रहे है, वे निरंतर बने रहेंगे। नौकरशाही द्वारा कार्यप्रणाली में अड़ंगों की प्रवृत्ति भी भरोसा पैदा करने में बाधा बन रही है। शोध-संस्थानों में वैज्ञानिकों की इस कमी की जानकारी संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में पृथ्वी एवं विज्ञान मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने बीते सत्र में दी है।मौजूदा परिदृश्य में कोई भी देश वैज्ञानिक उपलब्धियों से ही सक्षमता हासिल कर सकता है। मानव जीवन को यही उपलब्धियां सुखद और समृद्ध बनाए रखने का काम करती हैं। भारत में युवा उत्साहियों या शिक्षित बेरोजगारों की भरमार है। बावजूद वैज्ञानिक बनने या मौलिक शोध में रुचि लेने वाले युवाओं की संख्या कम ही है। इसकी प्रमुख वजहों में एक तो वैज्ञानिकों को हम खिलाड़ी, अभिनेता, नौकरशाह और राजनेताओं की तरह रोल मॉडल नहीं बना पा रहे हैं। सरकार विज्ञान से ज्यादा महत्व खेल को देती है। दूसरे, उस सूचना तकनीक को विज्ञान मान लिया गया है, जो वास्तव में विज्ञान नहीं है। बावजूद इसके विस्तार में प्रतिभाओं को खपाया जा रहा है। वैज्ञानिक प्रतिभाओं को तवज्जो नहीं मिलना भी प्रतिभाओं के पलायन का एक बड़ा कारण है। जाहिर है, हमें ऐसा माहौल रचने की जरूरत है, जो मौलिक अनुसंधान व शोध-संस्कृति का पर्याय बने। इसके लिए हमें उन लोगों को भी महत्व देना होगा, जो अपने देशज ज्ञान के बूते आविष्कार में तो लगे हैं, लेकिन अकादमिक ज्ञान नहीं होने के कारण उनके आविष्कारों को वैज्ञानिक मान्यता नहीं मिल पाती है। हाल ही में कर्नाटक के किसान गणपति भट्ट ने पेड़ पर चढ़कर नारियल व सुपारी तोड़ने वाली मोटरसाइकिल बनाई है। लेकिन इस आविष्कार को न तो विज्ञान सम्मत माना गया और न ही गणपति भट्ट को अशिक्षित होने के कारण केंद्र या राज्य सरकार से सम्मानित किया गया। यह व्यवहार प्रतिभा का अनादर है।हमारे नेता संसद में विज्ञान पर चर्चा तो कम करते हैं, लेकिन विज्ञान की उपलब्धियों के उद्घाटन और विज्ञान समारोहों में मुख्य अतिथि की भागीदारी करने से नहीं चूकते। हर वर्ष जनवरी के पहले सप्ताह में भारतीय वैज्ञानिकों और विज्ञान को प्रोत्साहित करने व उनकी वार्षिक उपलब्धियां सामने लाने की दृष्टि से बड़ा जलसा दिल्ली के विज्ञान भवन में होता है। इसमें मुख्य अतिथि हमेशा प्रधानमंत्री रहते हैं। दुनिया में भारत के अलावा कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां विज्ञान संबंधी कार्यक्रमों का उद्घाटन राजनेता करते हों। ऐसे समारोहों में वैज्ञानिक से ज्यादा राजनेताओं को महत्व देने से श्रेष्ठ वैज्ञानिकों का आत्म-सम्मान आहत होता है। हमारे यहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सरकार का प्रभुत्व है। लिहाजा उसमें जोखिम उठाने की इच्छाशक्ति का अभाव है। जबकि वैज्ञानिक अनुसंधानों की बुनियाद कल्पनाशीलता और दूरदर्शिता पर टिकी होती है, जिसे बिना जोखिम उठाए अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता है। हालांकि चंद्रयान की असफलता पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसरो के वैज्ञानिकों को जिस अनौपचारिक ढंग से ढांढस बंधाया था, वह एक अपवाद है।वैश्वीकरण के दौर में आज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन उदारवादी अर्थव्यवस्था का दुखद पहलू है कि हमारे उच्च दर्जे के विज्ञान शिक्षा संस्थान प्रतिभाओं को आकर्षित ही नहीं कर पा रहे हैं। हमारी ज्यादातर प्रतिभाएं या तो विदेश पलायन कर जाती हैं अथवा इंजीनियरिंग के साथ एमबीए करके निजी बैंकों, बीमा कंपनियों अथवा अन्य प्रबंधन संस्थानों से जुड़ जाते हैं। यहां ये प्रतिभाएं जो बुनियादी शिक्षा हासिल की होती हैं, उसके विपरीत कार्य-संस्कृति में काम करने को विवश होती हैं। यही काम हमारे राष्ट्रीयकृत बैंकों में इंटर पास कर्मचारी करते हैं। क्या यह विरोधाभासी कार्य संस्कृति प्रतिभा के साथ छल नहीं है? क्या इंजीनियर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सोडा, साबुन, कोला, सिगरेट, टीवी, कंप्युटर या दोपहिया अथवा चार पहिया वाहनों के लिए ग्राहक तलाशने के लिए हैं? विज्ञान संस्थानों में जब प्रतिभाओं को अनुकूल काम करने का माहौल नहीं मिलता है, तो वे इतर उपभोक्ता संस्थानों में काम करने को मजबूर हो जाते हैं।एक समय था जब विज्ञान संस्थाओं में धन की कमी थी। लेकिन अब संस्थानों में अर्थ और संसाधनों की कमी नहीं रह गई है। बावजूद युवा विज्ञान से किनारा कर रहे हैं, तो वैज्ञानिक कार्य-संस्कृति में ही खोट होना तय है। यही वजह है कि जो शोध हो रहे हैं, उनमें पूर्व में ही हो चुके कार्यों को अदल-बदलकर दोहराया जा रहा है। दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय अपनी जगह नहीं बना पाता है। निजीकरण की खुली छूट देने के बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी देश में उच्च शिक्षा क्षेत्र का भौतिक ढांचा पर्याप्त नहीं है। 1930 में जब देश में फिरंगी हुकूमत थी, तब देश में वैज्ञानिक शोध का बुनियादी ढांचा न के बराबर था। विचारों को रचनात्मकता देने वाला साहित्य भी अपर्याप्त था। अंग्रेजी शिक्षा शुरुआती में दौर में थी। बावजूद सीवी रमन ने साधारण देशी उपकरणों के सहारे देशज ज्ञान और भाषा को आधार बनाकर काम किया और भौतिक विज्ञान में नोबेल पाया। सत्येंद्रनाथ बसु ने आइंस्टीन के साथ काम किया। मेघनाथ साहा, रामानुजम, पीसी रे और होमी जहांगीर भाभा ने कई उपलब्धियां पाईं। एपीजे अब्दुल कलाम और के. सिवन जैसे वैज्ञानिक मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा लेकर महान वैज्ञानिक बने हैं। लेकिन अब उच्च शिक्षा में तमाम गुणवत्तापूर्ण सुधार होने और अनेक प्रयोगशालाओं के खुल जाने के बावजूद गंभीर अनुशीलन का काम थमा है। उपलब्धियों को दोहराना मुमकिन नहीं हो रहा। हालांकि मंगल अभियान इस दिशा में अपवाद के रुप में पेश आया है, जिसे स्वदेशी तकनीक से अंतरिक्ष में छोड़ा गया है।दरअसल बीते 70 सालों में हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी अवधारणाओं का शिकार हो गई है, जिसमें रटने की पद्धति विकसित हुई है। शिक्षा को विचार व ज्ञानोन्मुखी बनाने की बजाय, नौकरी अथवा कैरियर उन्मुखी बना दिया गया है। लिहाजा कल्पनाशीलता कुंठित हो रही है। अंग्रेजी का दबाव भी नैसर्गिक प्रतिभाओं को कुंठित कर रहा है। हमारे राजनेताओं में इस जड़ता को तोड़ने की इच्छाशक्ति का अभाव है। देश में जब तक वैज्ञानिक कार्य संस्कृति के अनुरुप माहौल नहीं बनेगा, तब तक दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा में आगे निकलना मुश्किल होगा। हमारे युवा वैज्ञानिक बनने की दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे। 

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