-अशोक “प्रवृद्ध”
श्रावण मास की पूर्णिमा का चंद्र अपनी पूर्ण सोलह कलाओं से आकाश में दैदीप्यमान था। उसकी धवल, दुग्ध जैसी धवल चांदनी से झारखंड के वनांचल में स्थित पितामह प्रवृद्ध का आश्रम आलोकित हो रहा था। पितामह प्रवृद्ध वेद, वेदांग और प्राचीन भारतीय विज्ञान के प्रकांड मनीषी थे। उनके मुखमंडल पर सात्विक तेज और आँखों में शाश्वत सत्य की सौम्यता थी। तभी उनका दस वर्षीय पौत्र नीलाक्ष दौड़ता हुआ आया। उसके नन्हे हाथों में कुश, अक्षत और रंग-बिरंगे सूती धागे थे। नीलाक्ष की आँखें कुतूहल से चमक रही थीं।
“पितामह! पितामह!” नीलाक्ष ने उनके चरणों को स्पर्श करते हुए पूछा, “आज माता ने मुझे यह धागा देकर कहा कि मैं इसे अपने हाथ पर बंधवा लूं और इसे रक्षाबंधन कहें। विद्यालय में मेरे मित्रों ने कहा कि यह केवल भाई-बहन का त्योहार है, जहाँ बहनें भाई को राखी बांधती हैं और भाई उन्हें उपहार देते हैं। किंतु आज प्रात: आपने नदी तट पर जाकर अन्य ऋषियों के साथ नए सूती धागे बदले और ऋषियों का तर्पण किया। पितामह, इस श्रावणी पूर्णिमा का वास्तविक रहस्य क्या है? क्या यह केवल एक पारिवारिक त्योहार है या इसके पीछे कोई गहरा विज्ञान भी है?”
पितामह प्रवृद्ध मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने नीलाक्ष को अपने समीप कुशासन पर बिठाया और वात्सल्य से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “वत्स नीलाक्ष! तुमने आज अत्यंत महत्वपूर्ण और अनुसंधानात्मक प्रश्न किया है। हमारी सनातन संस्कृति में कोई भी पर्व केवल आमोद-प्रमोद के लिए नहीं बना। उसके पीछे खगोल, अध्यात्म और समाज कल्याण का विज्ञान छिपा है। आओ, मैं तुम्हें श्रावणी पूर्णिमा की त्रिवेणी समझाता हूँ।”
नीलाक्ष एकाग्र होकर सुनने लगा।
पितामह ने आकाश में चमकते चंद्रमा की ओर संकेत करते हुए कहा, “पुत्र, आज चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में है। श्रवण का अर्थ होता है- ध्यानपूर्वक सुनना और ज्ञान को ग्रहण करना। प्राचीन काल में हमारे पूर्वज इसी दिन से नए शैक्षणिक सत्र का आरंभ करते थे, जिसे उपाकर्म कहा जाता है। नदी के पवित्र जल में स्नान कर हम अपनी कमियों को विसर्जित करते हैं और नया यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान कभी पुराना या जड़ नहीं होना चाहिए, उसका प्रतिवर्ष नवीनीकरण होना आवश्यक है।”
“अच्छा! तो प्रात:काल का अनुष्ठान ज्ञान के संवर्धन के लिए था,” नीलाक्ष ने सिर हिलाते हुए कहा। “किंतु पितामह, फिर इस धागे (रक्षासूत्र) का रहस्य क्या है?”
पितामह प्रवृद्ध ने गंभीर स्वर में कहा, “वत्स, जिसे आज लोग केवल राखी कहते हैं, शास्त्रों में उसे रक्षासूत्र कहा गया है। यह केवल भाई-बहन के संकुचित प्रेम तक सीमित नहीं है। इसका फलक संपूर्ण ब्रह्मांड को एक सूत्र में पिरोने जैसा व्यापक है। भविष्य पुराण में कथा आती है कि जब असुरों और देवताओं में भयंकर युद्ध छिड़ा, और देवराज इंद्र परास्त होने लगे, तब देवगुरु बृहस्पति के परामर्श पर इंद्र की पत्नी शची ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई पर एक अभिमंत्रित धागा बांधा था। उस धागे की शक्ति से इंद्र ने अपनी इंद्रियों और भय पर विजय प्राप्त की और धर्म की रक्षा की।”
“अरे! इसका अर्थ है कि प्राचीन काल में पत्नियां भी पतियों को रक्षासूत्र बांधती थीं?” नीलाक्ष ने विस्मय से पूछा।
“हाँ वत्स!” पितामह ने आगे कहा, “यही नहीं, श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु राजा बलि के द्वारपाल बन गए, तब माता लक्ष्मी ने राजा बलि को भाई मानकर रक्षासूत्र बांधा और उपहार में अपने पति को मांग लिया। इस धागे का मूल मंत्र जानते हो क्या है? ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः, तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।’ अर्थात, जिस सूत्र से महादानी राजा बलि को धर्म के बंधन में बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अपने कर्तव्य से कभी विचलित मत होना।”
पितामह की बातें सुनकर नीलाक्ष का बाल मन गहरे चिंतन में डूब गया। उसने अपनी कलाई पर बंधे धागे को देखा और बोला, “पितामह! इसका अर्थ तो यह हुआ कि यह धागा हमें हमारे कर्तव्य और उत्तरदायित्व की याद दिलाता है?”
“अति उत्तम नीलाक्ष! तुमने इसका वास्तविक बोध प्राप्त कर लिया,” पितामह प्रवृद्ध ने गद्गद कंठ से कहा। “यह रक्षासूत्र प्रतिज्ञा है। जब कोई बहन भाई को बांधती है, तो भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। जब एक आचार्य अपने शिष्य को बांधता है, तो शिष्य राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेता है। यहाँ तक कि इस दिन हमारे देश के पश्चिमी तटों पर मछुआरे समुद्र देव (वरुण) को नारियल अर्पित करते हैं, जिसे नराली पूर्णिमा कहते हैं। वह प्रकृति और मनुष्य के बीच रक्षा का अनुबंध है।”
नीलाक्ष उठ खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर अब संशय के बादल छंट चुके थे और उसकी जगह एक नई समझ ने ले ली थी। उसने पितामह से कहा, “पितामह, आज मुझे समझ आया कि श्रावणी पूर्णिमा केवल उपहार लेने-देने का दिन नहीं है। यह दिन हमारे ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का, अपने ज्ञान को मांजने का और समाज के हर कमजोर वर्ग की रक्षा का संकल्प लेने का महापर्व है।”
पितामह प्रवृद्ध ने संतोष की सांस ली। उन्हें विश्वास हो गया कि सनातन संस्कृति की यह वैचारिक धरोहर अब सुरक्षित हाथों में है। उन्होंने नीलाक्ष की कलाई पर मंत्रोच्चार के साथ वह पावन रक्षासूत्र बांध दिया।
बोध –
भारतीय त्योहार केवल बाह्य आडंबर या सीमित सामाजिक रीति-रिवाज नहीं हैं। उनके मूल में गहरा दार्शनिक और सामाजिक विज्ञान छिपा है। रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ स्वयं को धर्म, कर्तव्य, प्रकृति और समाज की निस्वार्थ रक्षा के संकल्प में बांधना है।
– अशोक प्रवृद्ध