लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जनलोकपाल बिल के लिए अन्ना हजारे ने अप्रिल, २०११ में दिल्ली के जन्तर-मन्तर में आमरण अनशन किया। मंच की पृष्ठभूमि में भारत माता का चित्र लगा हुआ था। स्वामी अग्निवेश उस समय अन्ना के मुख्य सलाहकार हुआ करते थे। उन्होंने सलाह दी कि भारत माता का चित्र लगाने से अल्पसंख्यक समुदाय में गलत संदेश जाएगा। अनशन के दो दिन के बाद मंच की पृष्ठभूमि से भारत माता का चित्र हटा दिया गया। अन्नाजी के अगस्त आन्दोलन के दौरान देश के करोड़ों युवकों ने ‘वन्दे मातरम्‌’ और‘भारत माता की जय’ के उद्‌घोष के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जो मोर्चा खोला वह अद्‌भुत और अविस्मरणीय है। १९७४ के जेपी आन्दोलन के बाद पहली बार देश की युवा शक्ति एकजुट होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अन्ना के नेतृत्व में प्रत्यक्ष संघर्ष के लिए उतरी। करोड़ों भारतवासियों के हृदय में राष्ट्र के लिए सबकुछ न्योछावर करने का जज्बा भरने वाले उद्‌घोष – वन्दे मातरम्‌, पर दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही ईमाम मौलाना बुखारी ने गंभीर आपत्ति दर्ज़ की, इस नारे को ईस्लाम के खिलाफ़ बताया और मुसलमानों को अन्ना के आन्दोलन से दूर रहने का फ़तवा जारी कर दिया। अन्ना के हाथ-पांव फूल गए। फ़ौरन किरण बेदी को मनाने के लिए जामा मस्जिद भेजा। बुखारी से किरण बेदी ने घंटों मिन्नतें की लेकिन बुखारी टस से मस नहीं हुए। निराश किरण बेदी वापस आ गईं। इस घटना के कुछ ही दिन बाद अन्नाजी का अनशन समाप्त हो गया – वन्दे मातरम्‌ बच गया। अन्नाजी के अगले आन्दोलन से वन्दे मातरम्‌ और भारत माता गायब हो जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

प्रशान्त भूषण टीम अन्ना के सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं और अन्नाजी के मुख्य सलाहकार भी। उनके और अरविन्द केजरीवाल के मुख से निकली वाणी अन्नाजी की ही मानी जाती है। अक्टुबर, २०११ के पहले सप्ताह में वाराणसी में उन्होंने बयान दिया कि कश्मीर से भारत को अपनी सेना अविलंब हटा लेनी चाहिए और जनमत संग्रह कराकर कश्मीरियों को आज़ादी दे देनी चाहिए। इस राष्ट्रद्रोही बयान के कारण १२, अक्टुबर को तीन आक्रोशित युवकों ने प्रशान्त भूषण की लात-घूसों से मरम्मत की। इस घटना के बाद प्रशान्त का बयान पुनः सुर्खियों में आया। अन्नाजी से इस बयान पर अपनी राय जाहिर करने के लिए असंख्य लोगों ने पत्र लिखकर, फेसबूक के माध्यम से, उनके ब्लाग पर टिप्पणी द्वारा आग्रह किया। उत्तर में अन्नाजी एक हफ़्ते के मौन व्रत पर चले गए। मौन रहते हुए भी वे पर्चियों पर पूछे गए प्रश्नों का लिखित उत्तर देते हैं, निर्देश भी जारी करते हैं, लेकिन प्रशान्त भूषण के अराष्ट्रीय बयान पर उन्होंने एक शब्द भी नहीं लिखा।

अन्नाजी के आन्दोलन के दौरान प्रथमतया भारत माता के चित्र का मंच की पृष्ठभूमि से अचानक गायब हो जाना, द्वितीयतया मौलाना बुखारी जैसे घोर सांप्रदायिक व्यक्ति के यहां किरण बेदी का जाकर समर्पण की मुद्रा में समर्थन के लिए याचना करना और तृतीयतया प्रशान्त भूषण का पाकिस्तान समर्थक देशद्रोही बयान क्या एक सोची-समझी रणनीति के तीन कदम नहीं हैं? क्या यह कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति की सीधी नकल नहीं है? क्या यह बहुसंख्यक राष्ट्रवादियों का अपमान नहीं है?

मैं व्यक्तिगत रूप से अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का प्रबल समर्थक हूं। अपने मित्रों के साथ अन्ना के समर्थन में २१ अगस्त को वाराणसी के भारत माता मन्दिर में एक दिन का प्रतीक अनशन भी रखा। मैं हृदय से चाहता हूं कि अन्नाजी का जनलोकपाल बिल शीघ्रातिशीघ्र कानून का रूप ले ले। लेकिन कश्मीर की आज़ादी की वकालत करते हुए उनके प्रिय सहयोगी प्रशान्त भूषण का देशद्रोही बयान और इसपर अन्नाजी की सप्रयास चुप्पी ने मुझे आहत किया है। कही अन्नाजी वही गलती तो नहीं दुहराने जा रहे हैं, जो १९४७ में महात्मा गांधी ने की थी? उस समय महात्मा गांधी कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेता थे, राष्ट्रपिता थे। उन्होंने मुसलमानों और जिन्ना को खुश करने की हर संभव कोशिश की, लेकिन देश के बंटवारे को नहीं टाल सके। जिन्ना को कायदे आज़म का खिताब महात्मा गांधी ने ही दिया था। अन्ना हजारे को आज दूसरे गांधी का दर्ज़ा दिया जा रहा है। कही अन्नाजी भी तुष्टीकरण की पुरानी ग्रन्थि के शिकार तो नहीं हैं? कहा जाता है कि अन्नाजी ठेठ स्पष्टवादी हैं। उनसे अपेक्षा है कि इन विषयों पर मतिभ्रम की स्थिति में आए युवाशक्ति का मार्गदर्शन करेंगे। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सारा देश उनके साथ है लेकिन भारत की अखंडता के मुद्दे पर यदि उन्होंने प्रशान्त भूषण का समर्थन किया, तो उनके साथ भूषण द्वय ही बचेंगे। अभी तक तो ऐसा ही लग रहा है – मौनं स्वीकृतिं लक्षणं।

8 Responses to “देश की अखंडता और अन्ना का मौन”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    विपिन किशोर जी,यदि आपने मेरे बारे में यह लिखा है कि मैं टिप्पणी लिखने में आप खो देता हूँ तो यह आपकी गलत फहमी है..मैं तो बोलने में भी आपा नहीं खोता,लिखने में तो प्रश्न ही नहीं उठता.मैंने भारत माता के चित्र पर जो टिप्पणी की है उसपर मैं अभी भी कायम हूँ .वन्दे मातरम के सम्बन्ध में तो मैंने कुछ नहीं कहा.अगर कहा है तो बुखारी के बहाने बाजी के बारे में.मेरे टिप्पणी का वह अंश फिर से पढ़िए,शायद आपकी गलत फहमी दूर हो जाए.

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    • विपिन किशोर सिन्हा

      आपा खोने वाली बात मैंने आपके लिए नहीं लिखी है। आप मेरी पूरी टिप्पणी पढ़ें। यह बात मैंने अपने हमनाम विपिन कुमार सिन्हा (बी.के.सिन्हा) के लिए कही है। टिप्पणी में उनका नाम भी अन्तिम पंक्तियों में लिखा है। मैं आपकी विद्वतापूर्ण टिप्पणियों का प्रशंसक हूं। मेरी किसी भी बात से अगर आपकी भावनाएं आहत हुई हैं, तो मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

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  2. विपिन किशोर सिन्हा

    वन्दे मातरम संविधान सम्मत राष्ट्रगीत है। इसका अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं है। छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों और बुखारी जैसे राष्ट्रद्रोहियों ने इसे विवादास्पद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन आज भी विधिवत यह हमारा राष्ट्रगीत है। कोई राष्ट्रगीत का अपमान करे, देश को खंडित करने का बयान दे और हम चुप बैठे रहें? यह कार्य भी अराष्ट्रीय होगा। टिप्पणी लिखने में आप अक्सर आपा खो देते हैं। मेरे प्रिय हमनाम विपिन जी, क्या आप बता सकते हैं कि कहो कौन्तेय का कौन प्रसंग काल्पनिक है और वेद व्यास जी के महाभारत से भिन्न है। क्या सारे प्रगतिशील (तथाकथित) ऐसी ही बे सिर-पैर की बातें करते हैं?

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  3. आर. सिंह

    R.Singh

    मैंने अपनी पिछली टिप्पणी में शक किया था कि विपिन किशोर सिन्हा और बी.के.सिन्हा एक ही व्यक्ति तो नहीं हैं.इसके उत्तर में श्री विपिन किशोर सिन्हा ने एक पत्र मेरे निजी इमेल पर भेजा है,जिसे मैं यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ.
    ” मेरा पूरा नाम विपिन किशोर सिन्हा है और लेख या टिप्पणी में मैं अपना पूरा नाम ही लिखता हूं। बी.के. सिन्हा दूसरे व्यक्ति हैं जिनका पूरा नाम विपिन कुमार सिन्हा है। मैं छद्म नाम से कुछ भी नहीं लिखता। अन्ना जी ने इस तरह का बयान जैसा आपने लिखा है, अगर दिया है, तो यह स्वागत योग्य है। फिर भी अपनी टीम में प्रशान्त भूषण जैसे देशद्रोही को रखना अखरने वाली बात है। उनके जैसा सात्विक आदमी ऐसा समझौता (compromise) क्यों कर रहा है? वर्तमान व्यवस्था से मेरे संतुष्ट होने का प्रश्न ही नहीं है। मैं तो पूर्ण रूप से व्यवस्था परिवर्तन का प्रबल समर्थक हूं। जनलोकपाल बिल, जिसमें प्रधान मंत्री, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, सारे एन.जी.ओ., कारपोरेट घराने और मीडिया शामिल हो, व्यवस्था परिवर्तन में सहायक सिद्ध हो सकता है, लेकिन अभी भी ढेर सारे क्षेत्र हैं जिसमे मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है। हमारे संविधान पर ब्रिटिश इन्डिया की गहरी छाप है। इन्डियन पेनल कोड, न्यायपालिका, कार्यपालिका तो पूरी तरह अंग्रेजों के समय की ही है। हमें हिन्दुस्तानी संविधान चाहिए जिसमें इंडिया नहीं भारत की आत्मा दृष्टिगोचर हो।
    बात समाप्त करने के पहले एक प्रश्न – क्या आप बताने का कष्ट करेंगे कि अप्रिल में अन्ना जी के मंच
    से भारत माता का चित्र क्यों हटा दिया गया और वन्दे मातरम का विरोध करने पर बुखारी के घर मान-मनौवल के लिए किरण बेदी को क्यों भेजा गया?”
    मैं श्री विपिन किशोर सिन्हा जी को इसके लिए धन्यबाद देता हूँ और साथ साथ फिर अनुरोध करता हूँ कि प्रवक्ता में लिखे गए टिप्पणियों का उत्तर अगर वे यहीं दे तो ज्यादा अच्छा हो.जैसा कि उपरोक्त उद्धृत अंश से जाहिर है कि उन्होंने नाम का खुलासा करने के साथ कुछ अन्य प्रश्न भी उठायें हैं.प्रथम तो मैं कश्मीर के बारे में भिन्न विचार रखने से किसी को देश द्रोही नहीं मानता. भारत के वे सपूत जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं वे सबसे बड़े देश द्रोही हैं दूसरे भारत माता काएक काल्पनिक चित्र ,जिसका इस देश के नक़्शे से कोई सम्बन्ध नहीं है सर्वग्राही हो यह आवश्यक नहीं है.किरण बेदी का बुखारी के पास उनकी गलतफहमी दूर करने के लिए एकबार जाना भी कोई गुनाह नहीं है.कारपोरेट,मिडिया या एनजीओ के बारे में मैं अपना विचार पहले ही प्रकट कर चूका हूँ.अब मैं फिर बुखारी वाली बात पर आता हूँ.मेरे विचार से बुखारी का विरोध प्रदर्शन उनके भ्रष्टाचार से होने वाले लाभ के कारण था न की वन्दे मातरम से.वन्दे मातरम तो एक बहाना था.अगर यह नहीं रहता तो वे कोई अन्य बहाना ढूंढते.आपने बहुत सीअन्य बातें भी उठाई हैं,उनके बारे में मैं यही कहूँगा कि पहले हम भ्रष्टाचार तो काबू पा लें.

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  4. आर. सिंह

    R.Singh

    अन्ना जी ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा है कि प्रशांत भूषण द्वारा काश्मीर के सम्बन्ध में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत विचार हैं.टीम अन्ना का उनसे कोई लेना देना नहीं है.उन्होंने अपने व्यक्तिगत विचार व्यक्त करते हुए यह भी साफ किया है कि मैं कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानता हूँ.उन्होंने आगे यह भी कहा है कि मैं कश्मीर की यात्रा कर चूका हूँ और वहां भी मैंने बिना किसी डर भय के यह विचार व्यक्त किया था.टाइम्स आफ इंडिया के अंतर्जाल सस्करण पर तो दो दिनों पहले तक इसका विडिओ भी उपलब्ध था.अन्ना जी के इस व्यान पर गिलानी की प्रतिक्रिया भी आ चुकी है.यह सब अन्ना जी के मौन व्रत पर जाने के पहले हो चुका है.मुझे तो आश्चर्य इस बात पर है कि इन सब पर श्री विपिन किशोर सिन्हा की नजर क्यों नहीं पड़ी? ऐसे भी श्री विपिन किशोर सिन्हा के अन्यत्र व्यक्त विचारों से भी आभास होता है कि कहीं कहीं उनके अंतर्मन में वर्तमान परस्थितियों के प्रति संतोष है.ऐसा साधारणत: दो कारणों से होता है.या तो आपको वर्तमान व्यवस्था या यथास्थिति से लाभ है या आपको भय है कि इस तरह का आन्दोलन ऐसी अव्यवस्था न ला दे जिससे हालात और बिगड़ जाए..
    पुनश्च: क्षमा चाहता हूँ,अपनी अल्पज्ञता के लिए,पर मैं थोडा भ्रमित सा हूँ.लेख और उसपर की गयी टिप्पणी से तो यह जाहिर है कि विपिन किशोर सिन्हा और बी.के.सिन्हा दो व्यक्ति हैं,पर टाइम्स आफ इंडिया का नियमित पाठक होने के कारण यह भी जानता हूँ कि उसमे अनेक विषयों पर टाइम्स का अपना विचार और विरोधी विचार दोनों साथ साथ प्रकाशित होता है.कहीं यहाँ भी ऐसा ही तो नहीं है?श्री बी.के.सिन्हा जी से अनुरोध है कि वे भी अपना पूरा नाम दे दें ,जिससे किसी भ्रान्ति की गुंजायश न रहे.

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  5. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन उवाच

    विपिन किशोर सिन्हा जी–
    (१)सही सही लेख।धन्यवाद, अन्ना जी का गलत पैंतरा दर्शाने के लिए।
    (२)अन्ना जी को आदर सहित, चेतावनी!
    आज छोटे मुंह बडी बात करूंगा; आपके (और हमारे भी) आंदोलन की सफलता के लिए, और सभी (अल्प-संख्य सहित) प्रजाजनों की भलाई के लिए।
    ===>
    (३) अन्ना जी आप बडी भारी भूल कर रहे हैं।नेहरू और गांधी की(अनादर अभिप्रेत नहीं) गलतियों को दुहरा रहे हैं। इतिहास से सीखा जाता है। ना सीखनेवाला देश, इतिहास दोहराता है।
    (४) राष्ट्र द्रोही तत्त्वों के साथ, अन्ना क्यों समझौता कर रहे हैं?
    ऐसा मानकर कि, कश्मिर के देशद्रोही अलगाववादी, और उनका परोक्ष समर्थन करने वाला अशान्त दूषण(?), और भारत माँ को वंदन करने में जिसे बुखार आता है, वह बुखारी,
    और छद्म-वेष अग्निवेश, ऐसे कपटी जयचंदो को, आप जिस भाषा में, शासन को हाथ उठाकर चेतावनी देते हैं; वैसे इन लोगोंको भी चेतावनी दे दीजिए।
    (५)लोग इनके कारण आप के साथ नहीं है, वे आपकी सात्त्विकता के कारण आपके साथ है।
    आपका सात्त्विक बल कई गुना बढ जाएगा।
    आर्य चाणक्य ने कहा था,” मुझे सभी छोडकर चले जाएं, केवल मेरा चारित्र्य छोड कर ना जाए।”
    (६) सभी को साथ लेने के चक्कर में, आप सभी को खो बैठेंगे।और एक समीप आया हुआ सुअवसर हाथ से निकल जाएगा। भ्रष्टा चारी शासन यही चाहता है। देश के शत्रु यही चाहते हैं।
    ॥ वंदे मातरम्‌ ॥

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    • Rekha Singh

      मधु भाई के विचारों से हम इस तथ्य को सही समझ सकते है |कुछ लोगो को समझने में यदि कठिनाई न हो तो | बहुत सुंदर और जानकारी पूर्ण है |ॐ

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  6. B K Sinha

    यह लेख अपने अंतर विरोधों से भरा हुआ है एक तरफ अन्ना को लताड़ते भी है और जल्दी से क्षमा याचना की मुद्रा में यह कहना कि मै अन्ना का बड़ा समर्थक रहा हूँ यह क्या दिखाता है ? एक ओब्शेशन भारत माता की तस्वीर और वन्दे मातरम को ले कर मुसलमानों को है तो बिपिन किशोर जी को भी कम नहीं है आपको क्या अधिकार है किसी की धार्मिक भावनाओं और पूजा पद्धति को ले कर जबरदस्ती करने की वन्देमातरम शब्द राजनीति में प्रयोग आनंदमठ नामक बंकिम चन्द्र की किताब से है अब उस किताब में जो कि एक उपन्यास है जिसकी कथा वस्तु काल्पनिक है एतिहासिक नहीं उसमे खुल्लम खुल्ला मूर्ति पूजा है और मुसलमानों के खिलाफ उन्हें विदेशी शाशक के तौर पर चित्रित किया गया है हिन्दू इस उपन्यास को अपने जोड़ कर देखना चाहे तो जरूर देखे पर क्या यह सत्य नहीं है कि अंग्रेज भी विदेशी थे तो उनकी बंकिम बाबु ने संरक्षक के रूप में चित्रण क्यों किया ? हालाँकि बंकिम बाबु ने यह सोचा भी नहीं था कि उनके उपन्यास के इस शब्द के लिए इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा हो जायेगा खैर सन्दर्भों को तोड़ मरोड़ कर संघियों और फासिस्टों कि पुरानी आदत रही है
    इतिहासिक सत्य को तोड़ मरोड़ कर अपने पक्ष में कर लेना इनके बाएं हाथ का खेल है इनका इतिहास लेखन जो वस्तुता इतिहास लेखन नहीं है कब धार्मिक आख्यान बन जाता है और कब धार्मिक आख्यान इतिहास बन जाता है मिथकों को इतिहास मान लेना और उस पर झगडा करना .बिपिन किशोर अन्ना के मुह से उगलवाना चाहते कि तुम देश प्रेमी हो कि नहीं क्यों कि तुमने भारत माता की तस्वीर को मंच पर से उतरवा दिया था वजह चाहे जो भी हो जो आदमी देश के लिए आर्मी में रह कर देश के लिए लड़ा उससे ये जनाब देस प्रेम का प्रमाण मांगते है इनके लिए हिन्दू भ्रस्ताचार अलग है मुस्लिम भ्रटाचार अलग है
    इस तरह से ये मुद्दे को भटकाना चाहते है अब प्रशांत भूषण का ही मामला ले ये लोग अन्ना के मुह में उंगली डाल कर कहलवाना चाहते है कि बोलो प्रशांत के बारे में तुम्हरी क्या राइ है अरे भाई वे प्रशांत के निजी विचार थे उनसे पूछो उसे तो मार मार कर अधमरा कर दिया मारने वाले को भारत रत्ना दिलवा देना .अब आप कहो कौन्तेय लिख रहे है तो अपने द्रितिकोंन से ही ना इतिहास तो नहीं लिख रहे है अब अगर किसी को इसमें कोई बात नागवार गुजरे और आपसे धक्का मुक्की कर ले तो आप क्या कहेंगे जरा सोचिये
    बिपिन कुमार sinha

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