टण्डन चाहते थे गोवध को मानव वध के समान माना जाए

Purushottam-Das-Tandonराजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन जी ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने गोवध को मानववध के समान दण्डनीय अपराध माना था। उन्होंने अपनी इस मान्यता को बलवती करने के लिए 22 जनवरी 1956 को कलकत्ता में आयोजित सर्वदलीय गोरक्षा सम्मेलन में बोलते हुए कहा था कि-गाय यद्यपि एक पशु है, किंतु हिंदू जाति और गौ का संबंध आदि काल से माता-पुत्र के जैसा है।

आज पाश्चात्य सभ्यता में रंग गये मानस की आलोचना करते हुए आपने दुख प्रकट किया कि-हिंदू जाति अपनी जड़ पर ही कुठाराघात करने को आमादा हो गयी है, जो नेता विदेशों के उदाहरण देकर हमें समझाना चाहते हैं, वे अपनी जाति और देश के मर्मस्थल पर चोट पहुंचा रहे हैं? कोई भी उदाहरण अथवा तर्क हमें अपनी मातृभूमि से बिलघ नही कर सकता।

पुरूषोत्तम दास टण्डन ने कहा था-‘‘यह पाप यहां पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है और यह देश के लिए महान कलंक और अभिशाप है। वर्ष में तीन लाख से अधिक अच्छी-अच्छी गायें यहां काट दी जाती हैं। यही स्थिति बंबई की है। यदि यही क्रम जारी रहा, इसी प्रकार गौ का हृास होता रहा तो देश की अमूल्य निधि से हमें हाथ धोना पड़ेगा। औरों के लिए रूपये पैसे, सोना चांदी का बहुत मूल्य हो सकता है, परंतु भारत का तो गौ ही प्रधान धन है। यहां तो गोधन का ही माहात्म्य है। लाख-लाख गौओं के दान का प्रकरण शास्त्र एवं पुराणों में आता है। गोदान यहां का प्रधान धार्मिक कत्र्तव्य है। इस गोधन की रक्षा सब प्रकार के प्रयत्न से होनी चाहिए।’’ पुरूषोत्तम दास टण्डन के इस मंतव्य की गहनता से समीक्षा की जानी अपेक्षित है कि उन्होंने इस देश का प्रधान कत्र्तव्य गोदान बताया। गोदान को हमारे पूर्वजों के सर्वोत्तम दान समझा। इसका कारण यह था कि दान देने के लिए हमारे पूर्वज किसी ऐसी वस्तु को उत्तम माना करते थे जिसके देने से दानग्राही व्यक्ति को कोई कष्ट क्लेश ना हो। उसके लिए वह दान किसी भी प्रकार से हानिकारक ना हो। यदि आप किसी को धन दान करते हैं तो यह आवश्यक नही कि वह उस धन से अपने लिए अन्न, वस्त्रादि ही लेकर आये। यह भी संभव है कि उस धन दान को ग्रहण कर उससे किसी को मारने के लिए हथियार ले आये या उसे जुआ आदि खेलने या मांस मद्यादि खाने-पीने में ही नष्ट कर दे। पर जो कोई व्यक्ति गोदान को ग्रहण करता है, उसका वह अन्यथा दुरूपयोग कर ही नही सकता। गौ के घर में रहने से दुग्ध, दधि की प्राप्ति तो होगी ही साथ ही गोमूत्र की भी प्राप्ति होगी। जिससे शारीरिक स्वास्थ्य और सौंदर्य की रक्षा होगी। बुद्घि में सात्विकता का प्राबल्य होगा और घर का परिवेश भी अत्यंत सात्विक बनेगा। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति गोदान को ग्रहण कर रहा है उसके खेत खलिहान में अन्नादि भी भरपूर मात्रा में रहेंगे।

यही कारण था कि टण्डन गोवध को मानव वध के समान दण्डनीय बना देने के समर्थन थे। हमारे पूर्वज गौ के प्रति अत्यंत सेवा भावी थे और गौ के प्रति उनकी श्रद्घा भी देखते ही बनती थी। डा. सत्यस्वरूप मिश्र लिखते हैं-‘‘प्राचीन समय में जब आर्य लोग भारत से बाहर ईरान तथा विभिन्न यूरोपीय देशों में गये थे तो गो सेवा भी वैदिक धर्म के साथ वहां ले गये थे, संस्कृत में गो शब्द का अर्थ गाय तथा पृथ्वी से है। फारसियों के प्राचीन धर्म ग्रंथ अवेस्ता में भी ‘गो’ का रूप गाउस मिलता है। जिसका अर्थ गाय तथा पृथ्वी है, यूरोप की कई भाषाओं में गाय का प्रतिरूप मिलता है। जो कि तुलनात्मक भाषा विज्ञान की दृष्टि से गो शब्द के साथ संयुक्त है। यथा अंग्रेजी काव मध्य अंग्रेज ‘कू’ तथा काऊ (Cou) प्राचीन अंग्रेजी ‘कू’ (Cu) प्राचीन आइसलैण्डिक कुअर (Kyr) डच कोए (Koe) स्वीडिश तथा डेनिश को (Ko) जर्मन ‘कू’ (Kuh)प्राचीन आइरिश बो, वेल्श (Buw) बुव, लैटिन बोस (Bos) ग्रीक बोउस (Bous) तथा रसियन गोविआदो (Goviado)

इस प्रकार विभिन्न देशों में गाय को लगभग एक ही प्रकार से पुकारा जाता है, और हर देश की अपनी संस्कृति में गाय का अपना विशिष्ट महत्व है। श्री मिश्र जी लिखते हैं-‘‘गोमाता ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप है। इसका प्रमाण है गोमाता का स्वाभाविक निष्काम भाव, उसके भोजन की सात्विकता तथा सभी के प्रति समदृष्टि। मनुष्य सर्वदा उसके बछड़े को दूध पीने से रोककर भी उसका दूध दुह लेता है। किंतु गोमाता अपने वत्स की भी चिंता न करके हमेें सहज ही दूध उपलब्ध करा देती है। उसका मनुष्य तथा अपने बच्चे के प्रति समभाव ही नही अपितु वह इतनी कल्याणकारिणी और परोपकारी है कि अपने वत्स (बछड़ा) की भी उपेक्षा कर देती है। पशु रूप में शरीर धारण करके भी इसका सहज स्वभाव एक ब्रहमज्ञानी के समान है। उसके मलमूत्र को शास्त्र में पवित्र माना गया है। गोबर तथा गोमूत्र भी मनुष्य के लिए विशेष कल्याणकारी है। इससे स्पष्ट है कि देवमयी माता ईश्वर का ही प्रत्यक्ष स्वरूप है।’’ आयुर्वेद में गाय को विशेष महत्व और स्थान देते हुए कहा गया है-

‘‘गव्यं पवित्रम् च रसायनम् च
पय्यम् च हृदयं बलबुद्घिदम् स्यात्।
आयु: प्रदम् रक्तविकार हारि
त्रिदोषहृद्रोग विषापहम् स्यात्।।’’

अर्थात पंचगव्य परमपवित्र रसायन है, पथ्य है हृदय को आनंद देने वाला है और बल-बुद्घि प्रदान करने वाला है। यह आयु प्रदान करने वाला रक्त के समस्त विकारों को दूर करने वाला, कफ, वात तथा पित्त जन्य तीनों दोषों, हृदय के रोगों और तीक्ष्ण विष के प्रभाव को भी दूर करने वाला है।

आयुर्वेद में कहा गया है :-

(1) गोमूत्र को कान में डालने से समस्त कर्ण रोग समाप्त हो जाते हैं, अच्छा सुनाई देने लगता है।

(2) प्रात:काल में निराहार एक तोला गोमूत्र का प्रयोग करने से कैंसर तक का नाश होता है।

(3) प्रथम बार ब्याही हुई गौ का प्रथम बार दूध निकालकर पी लेने से बिना रोकटोक पीना अच्छा है। जीवन भर के लिए दमा का रोग समाप्त हो जाता है।

(4) गोमूत्र में छोटी हर्रे 24 घंटे भिगोकर छाया में सुखाकर गोघृत में भूनकर चूर्ण बनाकर दोपहर एवं सायंकाल भोजन के पश्चात एक-एक तोला लेने पर समस्त रोग (पेट की बीमारियां) नष्ट हो जाते हैं।

(5) उदर के समस्त विकृत कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए सर्वोत्तम औषध गोमूत्र है।

गौ के कण्डे को जलाकर उसका मंजन बनाने से दांतों के सारे रोग शांत हो जाते हैं। यूरोप के वैज्ञानिक भी अब स्वीकार करने लगे हैं कि गोबर में प्लेग, हैजे के कीटाणुओं को नष्ट करन्ने की अदभुत शक्ति है। भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए गोबर परम उपयोगी तत्व है। इससे बढक़र संसार में कोई दूसरा खाद नही है।
-आर.के. आर्य

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