कविता

बिल से निकले साँप

रेंग रहे जिस ढंग से, बिल से निकले साँप।
जागा सारा देश तब, लिया समय पर भाँप॥

छल-प्रपंच की ओट में, करते रहे प्रहार।
सत्य-सूर्य के सामने, टिक न सका अँधियार॥

राष्ट्र-विरोधी सोच का, हुआ स्वयं अवसान।
जागृत जनता ने रखा, भारत का सम्मान॥

झूठ मुखौटा ओढ़कर, करते रहे प्रहार।
सच की पहली किरण से, टूटा उनका जाल॥

देश-धर्म से जो फिरे, लेकर मन में दोष।
जनमत देता है सदा, ऐसे जन को रोष॥

बिल से निकले विषधर सभी, फैला अपना जाल।
भारत जागा एकदम, विफल हुई हर चाल॥

राष्ट्र-विरोधी सोच का, होता नहीं विकास।
सत्य और विश्वास से, मिटता उसका त्रास॥

देश-विरोधी हरकतें, राष्ट्र-विरोधी काम।
जनमत ने पहचानकर, दिया उचित अंजाम॥

— डॉ. सत्यवान सौरभ