राजनीति

पेपर लीक पर गैर-भाजपा सरकारों से जवाबदेही कब?

– डॉ. सत्यवान सौरभ

-भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल रोजगार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, परिवारों की उम्मीदों और सामाजिक न्याय की आधारशिला भी हैं। कोई भी परीक्षा तभी सार्थक मानी जाती है जब उसमें प्रतिभा, मेहनत और निष्पक्षता का सम्मान हो। लेकिन जब प्रश्नपत्र लीक हो जाता है, तो केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। दुर्भाग्य यह है कि ऐसी घटनाओं पर देश में सबसे पहले समाधान की नहीं, बल्कि राजनीति की शुरुआत होती है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ता है और छात्रों का भविष्य राजनीतिक बहस का विषय बनकर रह जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में देश के अनेक राज्यों में पेपर लीक की घटनाएं सामने आई हैं। कहीं शिक्षक भर्ती परीक्षा प्रभावित हुई, कहीं पुलिस भर्ती, कहीं लोक सेवा आयोग की परीक्षा तो कहीं अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि पेपर लीक किसी एक राज्य, किसी एक दल या किसी एक परीक्षा संस्था की समस्या नहीं है। यह पूरे परीक्षा तंत्र की चुनौती है। फिर भी राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने-अपने हितों के अनुसार प्रस्तुत करते हैं।

जब राष्ट्रीय स्तर की किसी परीक्षा में गड़बड़ी होती है, तब विपक्ष केंद्र सरकार और संबंधित मंत्री से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की मांग करता है। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। सरकार से जवाब मांगना विपक्ष का दायित्व है। लेकिन यही प्रश्न तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब गैर-भाजपा शासित राज्यों में बार-बार पेपर लीक की घटनाएं सामने आती हैं। वहां वही राजनीतिक दल, जो केंद्र में नैतिकता और जवाबदेही की बात करते हैं, अक्सर इसे केवल प्रशासनिक चूक बताकर आगे बढ़ जाते हैं। यहीं से दोहरे मानदंडों की बहस शुरू होती है।

लोकतंत्र में नैतिकता का अर्थ यह नहीं कि वह केवल विरोधी दल पर लागू हो। यदि किसी सरकार से इस्तीफे की मांग उचित है तो वही कसौटी हर सरकार पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। जवाबदेही दल देखकर तय नहीं हो सकती। यदि भाजपा शासित राज्य में पेपर लीक सरकार की विफलता है तो गैर-भाजपा सरकारों में वही घटना केवल अधिकारियों की गलती कैसे बन जाती है? यदि एक जगह मंत्री से इस्तीफे की मांग होती है तो दूसरी जगह वही मांग अनुचित क्यों मानी जाती है?

दरअसल, भारतीय राजनीति में नैतिकता का पैमाना अक्सर सत्ता और विपक्ष के साथ बदल जाता है। विपक्ष में रहते हुए हर दल जवाबदेही की सबसे ऊंची बातें करता है, लेकिन सत्ता में आते ही वही दल जांच, प्रक्रिया और प्रशासनिक कारणों का हवाला देने लगता है। यह प्रवृत्ति किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। लगभग सभी दल समय-समय पर इसी राजनीतिक सुविधा के शिकार हुए हैं। इसलिए समस्या किसी दल विशेष की नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति की है।

हालांकि यह भी उतना ही सच है कि विपक्ष का दायित्व केवल सवाल उठाना नहीं, बल्कि अपने शासनकाल में बेहतर उदाहरण प्रस्तुत करना भी है। यदि कोई दल भाजपा सरकारों से इस्तीफे की मांग करता है, तो उसे अपने राज्यों में भी वही नैतिक मानदंड अपनाने चाहिए। लोकतंत्र में विश्वसनीयता तभी बनती है जब सिद्धांत सत्ता बदलने के साथ न बदलें।

पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान उस छात्र को होता है जिसने वर्षों तक कठिन परिश्रम किया होता है। हजारों-लाखों रुपये कोचिंग, पुस्तकों, आवेदन शुल्क और रहने-खाने पर खर्च होते हैं। परिवार अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर बच्चों की पढ़ाई पर निवेश करता है। परीक्षा रद्द होने का अर्थ केवल एक नई तारीख नहीं होता, बल्कि मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता भी होता है। कई बार उम्र सीमा पार होने का खतरा भी छात्रों के सामने खड़ा हो जाता है। ऐसे में राजनीतिक दलों के बयान छात्रों के घावों पर मरहम नहीं लगा सकते।

पेपर लीक की घटनाएं यह भी बताती हैं कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। यदि प्रश्नपत्र सुरक्षित रखने, मुद्रण, परिवहन, डिजिटल सुरक्षा और परीक्षा केंद्रों की निगरानी में कमियां बनी रहेंगी तो अपराधी नए रास्ते खोज लेंगे। इसलिए आवश्यकता मजबूत तकनीकी व्यवस्था, पारदर्शी प्रक्रियाओं और समयबद्ध जांच की है। दोषियों को शीघ्र और कठोर दंड मिलना चाहिए ताकि भविष्य में कोई ऐसा अपराध करने का साहस न कर सके।

इसके साथ ही शीर्ष स्तर की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि हर घटना पर तुरंत इस्तीफा ही एकमात्र समाधान है। लेकिन यदि किसी विभाग में लगातार पेपर लीक हो रहे हों, यदि सुरक्षा व्यवस्था बार-बार विफल हो रही हो और यदि निगरानी में गंभीर लापरवाही सामने आए, तो मंत्री और शीर्ष अधिकारियों की नैतिक जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता। उच्च पद केवल अधिकार नहीं देता, बल्कि उससे कहीं अधिक उत्तरदायित्व भी देता है।

गैर-भाजपा सरकारों के संदर्भ में यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि राजनीतिक विमर्श में अक्सर भाजपा शासित राज्यों की घटनाओं को प्रमुखता से उठाया जाता है, जबकि अन्य राज्यों में हुई समान घटनाओं पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। यदि लोकतंत्र में समानता का सिद्धांत स्वीकार है तो चर्चा भी समान होनी चाहिए और जवाबदेही भी। जनता यह नहीं देखती कि सरकार किस दल की है; वह यह देखती है कि उसके बच्चों का भविष्य सुरक्षित है या नहीं।

मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यदि मीडिया केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से घटनाओं को प्रस्तुत करेगा तो वास्तविक समस्या पीछे छूट जाएगी। पत्रकारिता का दायित्व तथ्यों को सामने लाना, जांच की दिशा पर नजर रखना और छात्रों की आवाज़ को प्रमुखता देना है। मीडिया को सत्ता और विपक्ष दोनों से समान कठोरता के साथ प्रश्न पूछने चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है।

सोशल मीडिया ने भी इस बहस को नया आयाम दिया है। यहां कई बार तथ्यों से अधिक राजनीतिक प्रचार दिखाई देता है। समर्थक अपने-अपने दल का बचाव करते हैं और विरोधियों पर आरोप लगाते हैं। परिणाम यह होता है कि पेपर लीक जैसे गंभीर विषय पर भी विमर्श समाधान की जगह राजनीतिक ध्रुवीकरण में बदल जाता है। इससे छात्रों का भरोसा और कमजोर होता है।

समय की मांग है कि परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह आधुनिक बनाया जाए। प्रश्नपत्रों की डिजिटल एन्क्रिप्शन प्रणाली, सुरक्षित वितरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, परीक्षा केंद्रों का वैज्ञानिक चयन और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए। साथ ही एक ऐसी स्वतंत्र परीक्षा निगरानी संस्था का गठन किया जाए जो किसी भी राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होकर पूरे तंत्र की निगरानी करे। इससे जनता का विश्वास भी बढ़ेगा और जवाबदेही भी स्पष्ट होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर न्यूनतम साझा नैतिक मानक विकसित करने होंगे। यदि किसी सरकार से विपक्ष में रहते हुए इस्तीफे की मांग की जाती है, तो सत्ता में आने पर उसी सिद्धांत को स्वीकार करने का साहस भी होना चाहिए। लोकतंत्र की विश्वसनीयता भाषणों से नहीं, आचरण से बनती है।

आज भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। यह युवा शक्ति तभी देश की ताकत बनेगी जब उसे निष्पक्ष अवसर मिलेंगे। यदि प्रतियोगी परीक्षाओं पर भरोसा कमजोर पड़ता गया तो प्रतिभा का मनोबल टूटेगा और व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ेगा। यह किसी भी राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकता।

इसलिए प्रश्न केवल इतना नहीं है कि पेपर लीक कहां हुआ। प्रश्न यह है कि वहां जवाबदेही किसकी तय हुई। यदि भाजपा शासित राज्यों में नैतिक जिम्मेदारी की मांग उचित है तो गैर-भाजपा सरकारों में भी वही कसौटी लागू होनी चाहिए। और यदि किसी राज्य में जांच पूरी होने तक इस्तीफे की आवश्यकता नहीं मानी जाती, तो यही सिद्धांत हर सरकार पर समान रूप से लागू होना चाहिए। लोकतंत्र चयनात्मक नैतिकता पर नहीं, समान मानकों पर चलता है।

अंततः देश के युवाओं को राजनीतिक बयान नहीं, भरोसेमंद व्यवस्था चाहिए। उन्हें यह विश्वास चाहिए कि उनकी मेहनत किसी भ्रष्ट तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगी। यह विश्वास तभी लौटेगा जब हर सरकार, चाहे वह किसी भी दल की हो, पेपर लीक जैसी गंभीर घटनाओं पर समान जवाबदेही स्वीकार करेगी। शिक्षा और रोजगार के प्रश्न दलगत राजनीति से ऊपर हैं। इन्हें वोट की राजनीति का हथियार नहीं, राष्ट्र निर्माण का आधार माना जाना चाहिए।

यही कारण है कि आज सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि “पेपर लीक पर गैर-भाजपा सरकारों से जवाबदेही कब?” बल्कि यह भी है कि क्या भारत की राजनीति कभी ऐसी परिपक्वता दिखाएगी, जहां नैतिकता का पैमाना सत्ता बदलने के साथ न बदले? जिस दिन इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर मिल जाएगा, उसी दिन छात्रों का व्यवस्था पर विश्वास भी मजबूत होना शुरू हो जाएगा।