आर्थिकी

तो फिर लौटेगा कैश का जमाना?

यूपीआई पर डी एम आर  : आख़िरी बोझ तो उपभोक्ता ही भरेगा। 

डॉ घनश्याम बादल 

आज सरकार के ही सपनों को साकार करता भारत में डिजिटल भुगतान तकनीकी सफलता से आगे बढ़कर सामाजिक-आर्थिक बदलाव का पर्याय बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े कारोबारी भुगतान तक, यूपीआई ने लेन-देन की आदत बदल दी है और बैंकिंग को भी मोबाइल तक पहुंचाया है लेकिन अब तक यह सुविधा मुफ्त में उपलब्ध थी और लागत सरकार, बैंकों और सार्वजनिक संसाधनों ने उठा रखी थी।

एनपीएल की घोषणा के मुताबिक पंद्रह अक्टूबर से इस व्यवस्था में  दो हजार रुपये से अधिक के व्यापारी भुगतान पर सामान्यतः शून्य दशमलव चार प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगेगा जबकि पचहत्तर हजार रुपये या उससे अधिक के लेनदेन यह तीन सौ रुपये होगी। ग्राहक के खाते से रकम सीधे नहीं कटेगी और लागत व्यापारी देगा। यहां सरकार का तर्क बिल्कुल थोथा है क्योंकि अंततः किसी भी लागत या कटौती का असर उपभोक्ता पर ही पड़ता है इसलिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसका असर उपभोक्ता की जेब पर ही पड़ना तय है ।  

सरकार कहती है कि व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान और दो हजार रुपये तक के व्यापारी भुगतान मुक्त रहेंगे। आवश्यक सेवाओं के कुछ क्षेत्रों के लिए पांच रुपये की स्थिर दर और छोटे व्यापारियों के लिए छूट का प्रावधान भी है। इसलिए हर यूपीआई भुगतान महंगा नहीं होगा, लेकिन यह मानना  गलत होगा कि बदलाव का अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

एमडीआर लागू करने के पीछे सरकार का तर्क है कि यूपीआई के सर्वर, बैंकिंग तकनीक, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी-रोधी प्रणालियों और बढ़ती क्षमता पर भारी खर्च हो रहा है। सरकारी आकलन के अनुसार डिजिटल भुगतान व्यवस्था की लागत करीब बीस हजार करोड़ रुपये सालाना है। अगस्त दो हजार छब्बीस में यूपीआई पर चौबीस दशमलव पांच अरब से अधिक लेनदेन हुए जिनका मूल्य करीब उनतीस दशमलव आठ लाख करोड़ रुपये था। इतने बड़े तंत्र को अनिश्चितकाल तक सरकारी सहायता पर चलाना कठिन है। मुफ्त सेवा लोकप्रिय हो सकती है लेकिन सर्वर और सुरक्षा मुफ्त नहीं होते। सरकारी पक्ष की दलील है कि बैंक, ऐप संचालक और भुगतान सेवा प्रदाता भी सर्वर, ग्राहक सहायता, अनुपालन और साइबर सुरक्षा पर खर्च करते हैं, इसलिए शुल्क व्यवस्था का सिद्धांत पूरी तरह अनुचित नहीं है मगर इसका लाभ तभी उचित होगा जब कंपनियां लागत, आय और सेवा-गुणवत्ता में पारदर्शिता रखें। कुछ बड़े ऐप का बढ़ता प्रभुत्व प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता विकल्पों को सीमित कर सकता है।

मुख्य समस्या उसकी पारदर्शिता और संभावित परिणामों में है। सरकार को बताना होगा कि शुल्क से प्राप्त रकम का कितना हिस्सा तकनीकी ढांचे, सुरक्षा और भुगतान कंपनियों को जाएगा तथा सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। यह भी ज़रूरी है कि इन दावों का स्वतंत्र सत्यापन हो।

व्यापारियों की चिंता जायज है। भले ही अधिक लाभ के क्षेत्र में या बाजार प्रतिस्पर्धा के चलते वें लागत को मार्जिन घटाकर, अन्य खर्च कम करके या कीमतें बढ़ाकर संभाल लें और बड़े कारोबारी शायद इसे वहन कर लें लेकिन कम मार्जिन वाले छोटे व्यापारियों के लिए छोटी रकम भी महीने के अंत में बड़ी लागत बन सकती है। 

सरकार ग्राहक से सीधे शुल्क रोक सकती है लेकिन बाजार में लागत का अंतिम भार तय नहीं कर सकती। यदि व्यापारी यूपीआई से बचने या नकद भुगतान के लिए दबाव डालने लगें तो डिजिटल भुगतान कमजोर होगा या फिर विभिन्न तरीकों से व्यक्ति और व्यापारी का भेद करना मुश्किल हो जाएगा।  

   यूपीआई की सफलता तकनीक के साथ भरोसे पर भी टिकी है। लोग इसे सरल, तेज और मुफ्त होने के कारण अपनाते रहे हैं। अब शुल्क की शुरुआत से यह आशंका पैदा हो सकती है कि सीमा घटेगी या दर बढ़ेगी नहीं कहा जा सकता, इसलिए सरकार को भविष्य की दरों और सीमाओं पर स्पष्ट नीति घोषित करनी चाहिए। लेकिन सरकार ऐसा करेगी इसकी संभावना ने के बराबर है क्योंकि सरकार को बहुत सारे कम तात्कालिक परिस्थितियों एवं अर्थव्यवस्था की हालात के अनुसार लेने पड़ते हैं। 

अमेरिकी कार्ड कंपनियों का प्रश्न भी इसी संदर्भ में उठता है। यूपीआई और रुपे ने वीजा तथा मास्टरकार्ड जैसे नेटवर्क के उस मॉडल को चुनौती दी है जिसमें हर भुगतान से एमडीआर मिलता है। 

 विपक्ष का आरोप है कि नया शुल्क सीधे अमेरिकी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए लगाया गया है, जो अमेरिकी दबाव के परिणाम स्वरुप लिया गया है. ब्राजील के लिए भी अमेरिका ने ऐसा ही दबाव बनाया था लेकिन वहां की सरकार और राष्ट्रपति ने दो टूक इंकार कर दिया तो ऐसे में सरकार पर निशाना साधना और भी आसान हो गया है। 

    भारत का स्वदेशी डिजिटल ढांचा आर्थिक संप्रभुता का प्रश्न है । घरेलू और विदेशी नेटवर्क के लिए समान, पारदर्शी और निष्पक्ष नियम ज़रूरी हैं। यूपीआई का डिजिटल भुगतान में लगभग चौरासी प्रतिशत हिस्सा और वैश्विक रियल-टाइम भुगतान में करीब उनचास प्रतिशत योगदान उसकी ताकत दिखाता है मगर इतने बड़े तंत्र में तकनीकी बाधा, साइबर हमला या व्यापक धोखाधड़ी करोड़ों लोगों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए स्थायी वित्तीय मॉडल जरूरी है पर वह उपयोगकर्ता के भरोसे की कीमत पर नहीं बनना चाहिए।

हालांकि यह सही है कि छोटी खरीदारी और व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान मुक्त रहेंगे तथा बड़ी खरीदारी में भी सीधे अतिरिक्त रकम नहीं ली जाएगी, फिर भी लागत मूल्य वृद्धि, छूट में कमी और दूसरे नकद या वायदा कारोबार भुगतान आदि विकल्पों के रूप में सामने आ सकती है और यदि ऐसा होता है तो यह अर्थव्यवस्था में काले धन की फिर से वृद्धि के रूप में सामने आएगा जिसका फायदा स्वार्थी तत्व उठाने से नहीं चूकेंगे अब चाहे वह बड़े उद्योगपति हों या राजनीतिक दल अथवा व्यक्ति। 

  जैसे यूपीआई को मुफ्त रखना विनिमय पवित्रता की गारंटी नहीं है वैसे ही शुल्क लगाना भी अपने आप में सुधार नहीं है। सुधार तभी होगा जब व्यवस्था सस्ती, सुरक्षित, पारदर्शी और सर्वसुलभ रहे। सरकार को राजस्व, कंपनियों के हित, व्यापारियों की लागत और उपभोक्ता सुविधा के बीच संतुलन बनाना होगा।