संदर्भः मोदी के संकल्प की चीता परियोजना के चार साल
दुर्लभ चीता परियोजना की सफलता अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास की देन है। मोदी देश ही नहीं दुनिया के ऐसे विरल सोच वाले नेता हैं, जो एक साथ अनेक विषयों पर सोचने के साथ क्रियान्वयन तो करते ही हैं, प्रकृति, पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण भी उनके सोच के दायरे में। देश में चीता पुनर्वास परियोजना उनकी इसी दृष्टि का एक सफल कीर्तिमान है। मध्यप्रदेश जिले के श्योपुर जिले में स्थित कूनो अभयारण्य की धरती पर अफ्रीका से लाए चीतों का पालन-पोषण चार साल पहले आरंभ हुआ था, जो अब एक बड़े भारतवंशी चीतों के कुल में बदल गया है। अफ्रीका से लाए चीतों के जीवित रहने की दर अनुमान से ज्यादा बेहतर रही। इसी का परिणाम है कि भारत में जन्म लेने वाले चीता शावकों का वंश लगातार बढ़ रहा है। कूनो में जन्मी मादा चीताएं अनेक बार मां बन चुकी हैं। इनसे जन्मे 19 शावक पूरी तरह स्वस्थ रहते हुए जंगली बाड़े में नटखट अठखेलियां करते हुए देखे जा सकते हैं। मानवीय निगरानी के बीच इनकी वृद्धि शत-प्रतिशत आंकी गई है। मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर 2022 को कूनो में नामीबियाई चीतों को छोड़ने के साथ इनके पुनर्वास की पहल हुई थी। वर्तमान में यहां चार मादाओं के 19 शावक उछलकूद मचाए हुए हैं।
भारत की धरती पर अब तक 49 चीतों का जन्म हो चुका है, जिनमें से 32 जीवित हैं। यानी कूनो में चीतों के जीवित रहने की दर 65.3 प्रतिशत है, जबकि इनके मूल निवास स्थल अफ्रीकी जंगलों में प्राकृतिक रूप से महज 5 से 10 प्रतिशत शावक ही वयस्क होने का सुख भोग पाते हैं। यहां ऐसा इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि वनकर्मी अपने दायित्व का निर्वहन ईमानदारी से कर रहे हैं। दरअसल कूनो का प्रबंधन बाहरी हस्तक्षेप से लगभग मुक्त है। इसीलिए यह वन प्रांत अफ्रीकी देशों से लाए गए चीतों के वंश के महाद्वीप में बदलता जा रहा है। यहां के वातावरण से अफ्रीका के वातावरण को भिन्न एवं प्रतिकूल माना जा रहा था, किंतु अब चीतों की संख्या में वृद्धि ने जता दिया है कि कूनो के जंगल का परिवेश इन चीतों के रहवास हेतु अनुकूलन का रच रहा है। यह प्रकृति की ही देन हैं। प्रदेश के जंगलों में बाघ, तेंदुए और स्याहगोश तो पूर्व से ही हैं, अब बिल्ली प्रजाति का चीता भी यहां के अभयारण्यों में देखा जाने लगा है। प्रदेश के ही गांधी सागर अभयारण्य में भी चीते छोड़े गए हैं, लेकिन यहां इनकी फिलहाल वंशवृद्धि शुरू नहीं हुई है। हालांकि चीता शावकों के जन्म को लेकर यह विडंबना देखने में आ रही है कि जो चीते बाड़े में जन्म लेते हैं, उनके जीवित रहने की दर तो उत्तम है, किंतु खुले जंगल में जन्मे ज्यादातर चीते जिंदा नहीं रह पा रहे हैं। कूनो में जन्मी मादा केजीपी-12 ने 11 अप्रैल 2026 को खुले जंगल में चार शावकों को जन्म देकर इतिहास रचा था। यह भारत में जन्मी किसी मादा द्वारा वन में प्राकृतिक प्रसव का पहला मामला था, लेकिन एक महीने के भीतर 12 मई को चारों शावक मृत पाए गए। इसके बाद छह जून को इनकी मां का भी निधन हो गया। ये मौतें कैसे हुईं, यह रहस्य ही बना हुआ है।
नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में प्रधानमंत्री ने छोड़ा था। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते और लाकर छोड़े गए थे। नई धरती और जलवायु परिवर्तन के चलते इन चीतों को आरंभ में यहां के मौसम से तालमेल बिठाने में दिक्कतें आईं। नतीजतन छह वयस्क और यहीं पैदा हुए चार शावकों में से तीन की मौतें भी हुई थीं, इस कारण परियोजना पर सवाल भी खड़े किए गए थे। दक्षिण अफ्रीका से लाकर बसाए गए 12 चीतों को 18 फरवरी 2024 को दो साल पूरे हो हुए थे, इस अवधि में इन चीतों की मृत्यु दर में कमी ने परियोजना की सफलता के प्रथम लक्ष्य को प्राप्त कर लिया था। इनकी जीवित रहने की दर शुरुआत में नामीबिया से लाए चीतों से बेहतर रही थी। दक्षिण अफ्रीका से आए 12 चीतों में से 33.3 प्रतिशत की मौत हुई,जबकि नामीबिया से लाए गए चीतों में से 37.5 प्रतिशत चीतों की मौत हुई। अफ्रीका से लाई गई तीन मादा चीताओं ने अब तक 12 शावकों को जन्म दिया, जो भारतीय परिवेश में पलते एवं बढ़ते चले गए। इन्होंने ही नए घर कूनो में आबादी बढ़ाने की शुरुआत की थी। नए आवास स्थलों में 50 फीसदी चीतों की मौत को सामान्य माना जाता है।
एक समय था जब चीते की रफ्तार भारतीय वनों की शान हुआ करती थी। लेकिन 1947 के आते-आते चीतों की आबादी पूरी तरह लुप्त हो गई। 1948 में अंतिम चीता छत्तीसगढ़ के सरगुजा में देखा गया था। जिसे मार गिराया गया था। चीता तेज रफ्तार का आश्चर्यजनक चमत्कार माना जाता है। अपनी विशिष्ट एवं लोचपूर्ण देहयष्टि के लिए भी इस हिंसक वन्य जीव की अलग पहचान थी। शरीर में इसी चपलता के कारण यह जंगली प्राणियों में सबसे तेज दौड़ने वाला धावक है।
बीती सदी में चीतों की संख्या एक लाख तक थी, लेकिन अफ्रीका के खुले घास वाले जंगलों से लेकर भारत सहित लगभग सभी एशियाई देशों में पाया जाने वाला चीता पूरे एशियाई जंगलों में गिनती के रह गए हैं। राजा चीता (एसिनोनिक्स रेक्स) जिम्बाब्वे में मिलता है। अफ्रीका के जंगलों में भी गिने-चुने चीते रह गए हैं। तंजानिया के सेरेंगती राष्ट्रीय उद्यान और नामीबिया के जंगलों में गिने-चुने चीते हैं। प्रजनन के तमाम आधुनिक व वैज्ञानिक उपायों के बावजूद जंगल की इस फुर्तीली नस्ल की संख्या बढ़ाई नहीं जा पा रही थी। यह प्रकृति के समक्ष वैज्ञानिक दंभ की नाकामी मानी जाने लगी थी। जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन की रिपोर्ट को मानें तो दुनिया में 91 प्रतिशत चीते 1991 में ही समाप्त हो गए थे। एशिया के ईरान में केवल 50 चीते शेष हैं। अफ्रीकी देश केन्या के मासीमारा क्षेत्र को चीतों का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब इनकी संख्या गिनती की रह गई है। ऐसे में भारत में चीतों की वंशवृद्धि दुनिया के लिए खुशखबरी है।
बीती सदी के पांचवें दशक तक चीते अमेरिका के चिड़ियाघरों में भी थे। प्राणी विशेषज्ञों की अनेक कोशिशों के बाद इन चीतों ने 1956 में शिशुओं को जन्म भी दिया, परंतु किसी भी शिशु को बचाया नहीं जा सका। चीते द्वारा किसी चिड़ियाघर में जोड़ा बनाने की यह पहली घटना थी, जो नाकाम रही। जंगल के हिंसक जीवों का प्रजनन चिड़ियाघरों में आश्चर्यजनक ढंग से प्रभावित होता है, इसलिए शेर, बाघ, तेंदुए व चीते चिड़ियाघरों में जोड़ा बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं। भारत में चीतों की अंतिम पीढ़ी के कुछ सदस्य बस्तर-सरगुजा के घने जंगलों में थे, जिन्हें 1947 में देखा गया था। प्रदेश अथवा भारत सरकार इनके संरक्षण के जरूरी उपाय करने हेतु हरकत में आती, इससे पहले ही चीतों के इन अंतिम वंशजों को भी शिकार के शौकीन राजा-महाराजाओं ने मार गिराया और भारतीय चीतों की नस्ल पर पूर्ण विराम लग गया था। कूनो के बाद अब मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के गांधीसागर अभयारण्य में चीते छोड़े गए हैं। यहां भी कूनो की तरह इनकी वंशवृद्धि की उम्मीद है।
हमारे देश के राजा-महाराजाओं को घोड़ों और कुत्तों की तरह चीते पालने का भी शौक था। चीता शावकों को पालकर इनसे जंगल में शिकार कराया जाता था। राजा लोग जब जंगल में आखेट के लिए जाते थे, तो प्रशिक्षित चीतों को बैलगाड़ी में बिठाकर साथ ले जाते थे। इनकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती थी, जिससे यह किसी मामूली वन्य जीव पर न झपटे। जब शिकार राजाओं की दृष्टि के दायरे में आ जाता था, तो चीते की आंखों की पट्टी खोलकर शिकार की दिशा में हाथ से इशारा कर दिया जाता था। पलक झपकते ही शिकार चीते के जबड़े में होता। शिकार का यह अद्भुत करिश्मा देखना भी एक आश्चर्यजनक रोमांच की बात रही होगी ?