विश्ववार्ता

बलूचिस्तान की आजादी के लिए संप्रभुता के मानक, संसाधन और भू-राजनीतिक समीकरण

दुर्गेश्वर राय

सोशल मीडिया पर हाल ही में बलूचिस्तान की आजादी से जुड़ा एक पत्र तेजी से वायरल हुआ। इस पत्र में रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान के गठन और नई मुद्रा जारी करने का दावा किया गया। स्वतंत्र जांचकर्ताओं और वैश्विक मीडिया ने इस दावे को पूरी तरह अपुष्ट और इंटरनेट प्रोपेगैंडा माना है। जमीनी स्तर पर बलूचिस्तान में स्वतंत्रता की माँग को लेकर संघर्ष लंबे समय से चल रहा है। इस संघर्ष के पीछे कई ऐतिहासिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण मौजूद हैं।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक राजनीति की कसौटी पर किसी भी क्षेत्र के लिए एक नए देश का दर्जा पाना आज के दौर में बेहद दुरूह है। मोंटेवीडियो कन्वेंशन के अनुसार किसी नए राष्ट्र के लिए स्थायी आबादी, निश्चित भूभाग, प्रभावी सरकार और विदेशी संबंध बनाने की क्षमता जैसे बुनियादी मानकों को पूरा करना होता है। बलूचिस्तान के पास आबादी और भूभाग तो है लेकिन वहां एक संप्रभु और प्रभावी प्रशासनिक सरकार की स्थापना करना पाकिस्तानी सैन्य नियंत्रण के रहते व्यावहारिक रूप से असंभव बना हुआ है हालांकि पाकिस्तान बलूचिस्तान पर अपना नियंत्रण लगतार खोता जा रहा है। इसके आगे की बाधा और भी विकट है जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी और महासभा के दो-तिहाई देशों का समर्थन आवश्यक होता है। बलूचिस्तान के संदर्भ में, सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य चीन अपने विशाल आर्थिक हितों और सी.पी.ई.सी. परियोजना को बचाने के लिए किसी भी स्वतंत्रता प्रस्ताव पर तुरंत अपने वीटो का इस्तेमाल कर उसे निरस्त कर देगा। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था किसी भी संप्रभु देश की प्रादेशिक अखंडता को प्राथमिकता देती है इसलिए जब तक मूल देश स्वयं विभाजित होने की अनुमति न दे या उसका पूर्ण विघटन न हो जाए, तब तक एकतरफा स्वतंत्रता को वैश्विक मान्यता मिलना लगभग नामुमकिन होता है।

बलूचिस्तान के विद्रोह का इतिहास विभाजन के समय से शुरू होता है। वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय जब अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत में शामिल होने या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया तो कलात रियासत ने अपनी स्वतंत्रता चुनी थी लेकिन 1948 में पाकिस्तान ने बलपूर्वक इसका विलय कर लिया। इसके बाद 1954 से 1958 के बीच पाकिस्तान की वन-यूनिट पॉलिसी के विरुद्ध दूसरा बड़ा विद्रोह हुआ जिसका नेतृत्व नवाब नौरोज खान ने किया। वर्ष 1963 से 1970 के दौरान सेना की वापसी की माँग  को लेकर बलूच कबायली नेताओं ने शेरों मूरी के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ा। इन दोनों ही चरणों में बलूच नेताओं को बातचीत के बहाने बुलाकर गिरफ्तार किया गया और फांसी दे दी गई जिससे बलूच जनता में अविश्वास की खाई और गहरी हो गई। वर्ष 1973 में जब जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार ने बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार को बर्खास्त किया, तब बांग्लादेश से प्रेरित होकर चार वर्षीय स्वायत्तता आंदोलन छिड़ गया। वर्ष 2000 के बाद से विद्रोह की पाँचवीं लहर चल रही है, जिसमें सैन्य ज्यादतियों और मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर असंतोष चरम पर है।

इस असंतोष का एक बड़ा कारण आर्थिक शोषण और मानवाधिकारों का हनन है। बलूचिस्तान खनिज संसाधनों के मामले में अत्यधिक समृद्ध है, लेकिन यह पाकिस्तान का सबसे गरीब प्रांत बना हुआ है। यहाँ बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस, तांबा और सोने के भंडार हैं, परंतु इसका स्थानीय लाभ न्यूनतम है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और ग्वादर बंदरगाह जैसी बड़ी परियोजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी न के बराबर है। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2011 से अब तक 10,000 से अधिक बलूच नागरिक लापता हो चुके हैं, जिन्हें जबरन गायब करने और फर्जी मुठभेड़ों में मारने के आरोप पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर लगते रहे हैं। क्षेत्र में बढ़ती असुरक्षा के कारण तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और अल-कायदा जैसे उग्रवादी समूहों की सक्रियता भी बढ़ी है, जिससे शिया समुदायों पर सांप्रदायिक हमले हो रहे हैं।

बलूचिस्तान के अलग होने या अस्थिर होने का सीधा प्रभाव उसके पड़ोसियों और वैश्विक शक्तियों पर पड़ता है। चीन ने सी.पी.ई,सी. और ग्वादर में भारी निवेश किया है जिससे उसकी सीधी पहुंच अरब सागर तक होती है। बलूचिस्तान में अस्थिरता से चीन के आर्थिक हितों को गहरा धक्का लग रहा है।

जहाँ तक भारत के रुख का प्रश्न है, भारत इस पूरे मामले में एक सतर्क दृष्टिकोण रखता है। भारत बलूचिस्तान में किसी भी तरह के सीधे हस्तक्षेप से इनकार करता है और पाकिस्तान के इन आरोपों को खारिज करता है। भारत का मानना है कि यह पाकिस्तान का आंतरिक मुद्दा है जिसे उन्हें स्वयं हल करना चाहिए। हालांकि, वर्ष 2016 में भारत के प्रधानमंत्री ने अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में बलूचिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठाया था, जो भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और अल्पसंख्यक अधिकारों की वकालत के अनुरूप है। भारत वैश्विक मंचों पर हमेशा अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के भीतर रहकर क्षेत्रीय स्थिरता और बलूच नागरिकों के अधिकारों की पैरवी करता है। वैश्विक मंतव्य भी यही है कि बलूचिस्तान में हिंसा और सैन्य दमन रुकना चाहिए ताकि दक्षिण एशिया में सुरक्षा की चुनौतियां और अधिक गंभीर न हों।