संकट में है गौरैया

बचपन से देखता आ रहा हूं मेरी मां गौरेया को आटे की नन्हीं नन्हीं गोलियां बनाकर देती है और एक एक कर गौरैया का झुंड मेरे घर की दालान में इकट्ठा हो जाता था और इन आटे को अपना भोजन बनाता था। मेरी भुआ ने हम भाई बहनों को गौरैया का झूठा पानी ये सोच कर कईं बार पिलाया है कि हम भी इनकी भांति चहचहाते रहे और आबाद रहें। बरसों हम भाई बहनों ने इनके लिए घौंसले बनाए हैं और इनके जमीन पर गिरे अंडों को बिना हाथ लगाए वापस घौसलों में रखा है। घर के आंगन में लगे कांच पर जब ये गौरैया अपनी चोंच मारती तो ऐसा लगता जैसे दो पक्षी आपस में लड रहे हो और मां आकर उस कांच पर कोई पर्दा डाल देती ताकि इसकी चोंच को नुकसान न हो। बचपन की हम सबकी ये मित्र और प्रकृति की सहचरी आज संकट के दौर में है। कभी हमारे घरों में और आस पास बिना डर के फुदकती ये गौरैया आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। कभी घर की अटारी पर, छत की मुंडेर पर और घर के आंगन में इस नन्हीं गौरैया का बेरोक टोक आना जाना था। गौरैया की ये चहचहाना सबको शुरू से भाता रहा है। ऐसा माना जाता है कि जिन घरों में गौरैया का आना जाना रहता है वहां रौनक और बरकत हमेषा रहती है। आज भी ये गौरेया मेरे घर में आती है पर पिछले कईं वर्षों से गौर किया है कि इनकी संख्या कम होती जा रही है। जहां कभी मौहल्ला और पूरा घर आंगन इनसे भरा रहता था वहीं अब कम होती संख्या ने सबका ध्यान खींचा है। ऐसा लग रहा है कि सीमेंट और कंक्रीट के इन समंदरों में घरों के साथ साथ दिल भी छोटे होते जा रहे हैं। सिमटते परिवारों ने स्व की कोटर में सब बंद कर लिया है और प्रकृति की अनदेखी ने इस गौरैया को भी संकट में डाल दिया है। अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही ये गौरैया आज विलुप्त होती प्रजाती की सूची में आ गई है। अगर समय रहते इस पर गौर नहीं किया गया तो परिवार का ये सदस्य हमेषा के लिए गायब हो जाएगा। तथ्यात्मक आंकडे बता रहे हैं कि 20 से 80 प्रतिषत तक की संख्या में प्रांतानुसार गौरैया की संख्या में कमी आती जा रही है। प्रकृति से दूरी और आधुनिक घरों की निर्माण शैली के साथ साथ असुरक्षित जीवन ने गौरैया पर संकट पैदा किया है। मोबाईल टावरांे के रेडियेषन ने भी इस प्रजाति पर असर डाला है साथ ही बढते शहरीकरण और घटते जंगलों ने गौरैया के अस्तित्व पर संकट पैदा किया है। गौरैया के लुप्त हो जाने से हम पर क्या फर्क पडेगा इस सवाल का जबाब यह है कि प्रकृति में कोई जीव अनावष्यक नहीं है, वह किसी न किसी तरह पारिस्थिति तंत्र का हिस्सा है और गौरैया पर आए संकट से यह तो बात माननी ही पडेगी कि हमारे आस पास का पारिस्थिति तंत्र ठीक नहीं है। गौरैया खेतों के लिए हानिकारक अल्फा और कटवर्म कीडों को अपने बच्चों का भोजन बनाती है और पारिस्थिति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। दुनियाभर में गौरैया की 26 प्रजातियों में से भारत में 5 ही पाई जाती है। 2010 से पूरे विष्व में 20 मार्च को विष्व गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है। दिल्ली सरकार ने इस पर संकट को देखते हुए इसको राज्य पक्षी का दर्जा भी दिया है। प्रयास काफी हो रहे है पर फिर भी अभी काफी जरूरत है। सबसे पहले तो हमें अपने दिलों में और घरों में गौरैया को जगह देनी होगी और प्यार स्नेह से इसे अपनाना होगा। अपने घरों में इनके लिए घोैसलें बनाए और दाना पानी रखें। इसके प्रजनन के समय अंडों की रखवाली करें। थोडा सा प्रयास इस प्रजाति को सुरक्षित करने में मील का पत्थर साबित होगा।
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’

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