व्यंग्य/ एक दुआ, सज्जनों के लिए

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-अशोक गौतम

रोज की तरह खुजलाता हुआ दफ्तर के लिए बारह बजे बिना किसी टेंशन के गुनगुनाता निकला था, पर अचानक सड़क में कहीं भी जाम न दिखा तो मेरी तो जैसे सारी हवा ही निकल गई। खटारा ट्रांसपोर्ट की बस थी की हवाई जहाज की तरह उड़े जा रही थी। सच कहूं! उस वक्त मेरा तो दम घुटने को आ गया था। लगा, जैसे देश की ऑक्सीजन ही खत्म हो गई हो। पहली बार अपने शहर की सड़क का ये हाल देखा तो रोना आ गया। इतना रोना तो मुझे अपना विवाह होने पर भी नहीं आया था। अपने शहर की सड़कों की यही एकबात तो मुझे सबसे अच्छी लगती है कि कोई न कोई हर रोज उसे अपनी पुश्‍तैनी जायदाद मान उस पर अड़े रहता है कभी दरी बिछाए, तो कभी, कभी दरी उठाए। मुहल्ले में पानी नहीं आया तो उतर आए मटके लेकर सड़क पर और लो भैया शुरू हो गई सड़क जाम! मुहल्ले में बिजली नहीं तो उतर आए लोग बाग बल्ब लेकर सड़क पर और हो गई सड़क जाम! कभी सरकार के पक्ष में सड़क जाम तो कभी सरकार के विपक्ष में सड़क! कभी महंगाई के विरोध में सड़क जाम तो कभी महंगाई के समर्थन में सड़क जाम! किसीका शादी- विवाह तो भैया, सड़क से बेहतर जगह और क्या हो सकती है ठुमके लगाने को, जश्‍न मनाने को? वे तो बीच सड़क में ही ठुमके लगा कमर को दर्द कर ही दम लेंगे, सड़क में जाम लगता है तो लगता रहे। शादी-विवाह कौन से रोज- रोज होने हैं। कुछ और नहीं तो पता चला कि आज सड़क जाम है। क्यों? कि पढ़े लिखे बेरोजगारों ने रोजगार के लिए सड़क जाम कर दी है। चलो, कुछ तो काम मिला। वे दफ्तर की कुर्सी तोड़ते- तोड़ते थक गए तो लो पदियाने उतर आए सड़क पर और हो गई सड़क जाम! और तो और, भगवान के साथ फेक तो फेक, नेक बंदे भी आए दिन सड़क पर शान से जाम लगाए रहते हैं। जाम इस देश की नियति है।

पर ये क्या हो गया मेरे शहर को यार? जिस शहर की सड़क को कोई न कोई जाम ढोने की लत्त लग गई थी वह आज जाम विहीन! लग रहा था कि दम अब निकला, कि अब निकला! आज साहब को क्या कहूंगा कि आज लेट क्यों हो गया? मैं तो इस जाम के आसरे ही आज ग्यारह के बदले शान से स्वयं को गौरवान्वित करता बारह बजे घर से निकला था।

अभी अपने शहर की सड़क के मौत के बारे में सोच ही रहा था कि तभी डीसी आफिस के सामने सड़क में कुछ ढोरों को हाथों में बैनर लिए देखा तो आधी उदासी खत्म हो गई। सांस में सांस आई। मेरे शहर के आदमी थक गए तो चलो कम से कम ढोरों ने तो परंपरा को जीवित रखा। उनके फटे गले से नारों की आवाजें सुनी तो मन बाग बाग हो उठा। या खुदा! आज तूने अपने बंदे को साहब के जूते खाने से बचा लिया। उसे तो बस मातहत अपने सामने कुर्सी पर चाहिए, चाहे उबासियां ही लेता रहे। मैंने आव देखा न ताव, ज्यों ही बस रूकने को हुई उसमें से शर्ट के बटन खोल कूद पड़ा और गिरते पड़ते ढोरों के नेता के पास पहुंचा, उसके पांव छुए, उसे गला साफ करने के लिए स्ट्रेपसिल दे सादर पूछा, ‘नेता जी प्रणाम! आज आपने दफ्तर में मेरी गिरती साख बचा दी। सच कहूं , हर उसके गले लगने को मन करता है जब कोई सुबह दफ्तर जाने के वक्त सड़क में जाम लगाए होता है। आपने सड़क में जाम किस खुशी में लगा रखा है? क्या आपका चारा पशुपालन विभाग खा गया?’

‘उसका बस चले तो वह तो हम ढोरों को ही खा जाए। यह तो ढोर एकता ने हमें बचाकर रखा है ,’ कह ढोरों के पहली पंक्ति के खा खाकर भेड़ से भैंसे हुए नेता ने और मरिअल ढोरों की पूंछों में ताव देते कहा।

‘क्या आपको समाज में वह आदर नहीं मिल रहा जिसके आप हकदार हैं?’

‘समाज हमें क्या आदर देगा! वह पहले अपना आदर खुद करना तो सीखे। सच कहें, अगर आदमी के पास पूंछ हो जाए तो उसे हम मेंसे अलग करना खुदा को भी मुश्किल हो जाए।’

‘तो आपके जाम का कारण?’

‘क्यों पूछ रहे हो ये सब? पत्रकार हो?’

‘क्या इस देश में कुछ भी पूछने का हक केवल पत्रकारों को ही है? मत पूछो मुझे कितनी खुशी हुई आपको इस तरह सड़क को रोके देखकर। वह भी डीसी आफिस के आगे। ‘

‘कानून तोड़ने का जो मजा कानून के रखवालों के सामने आता है वैसा और कहां आता है?’ उसने जिस रौब से कहा तो एक बात तो साफ हो गई कि बंदे की पीठ पर जरूर किसी का तो हाथ है। बिन पीठ पर हाथ के तो आज के दौर में बंदा अपने घर में भी खड़ा नहीं हो सकता, मेरी तरह।

‘तो इस पवित्र कार्य के पीछे आपका मकसद?’

‘ढोरों को सरकार जो स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवा रही है वे ऊंट के में मुंह में जीरे के समान हैं। जब तक सरकार हमें पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं देगी तब तक धरना, सड़क जाम जारी रहेगा।’

‘अगर सरकार के पास पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं होतीं तो क्या वह महंगाई ,बेरोजगारी, भूख, भय, भ्रष्‍टाचार का इलाज न करती?’

‘हम कुछ नहीं जानते। जबतक हमारी मांग पूरी नहीं होती सड़क जाम लगा रहेगा।’

‘अगर सरकार ने आश्‍वासन दे दिया तो?’ मैंने मन का बचा खुचा शक साफ करने के इरादे से पूछा तो वह ताड़ से बोला,’ हम वोटर नहीं जो आश्‍वासन के सहारे मरते रहें, पैदा होते रहें । ढोर हैं ढोर!!’ उसने जिस आत्म विश्‍वास से कहा मेरी कई दिनों की दफ्तर को लेट होने की टेंशन छू हो गई।

हे निस दिन सड़क पर जाम का पुण्य कर्म कर धर्म खटने वालो! भगवान आपको लंबी उम्र दे, स्वर्ग दे। मेरी यही कामना है कि आप बिन बहाने भी सड़क पर रोज निसंकोच जाम लगाएं। आप हमेशा स्वस्थ रहें। हे सड़क जामियों! आप हम जैसे लेट लतीफों के लिए हर युग में पूजनीय थे, पूजनीय हो और प्रात: वंदनीय रहोगे।

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अशोक गौतम
जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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