व्यंग्य/ मेरो मंत्र भरत ने भी माना!

अशोक गौतम

पत्नी के हजार बार घर से बाजार को यह कह कर कि दीवाली सिर पर आ गई है, अपने लिए नहीं तो न सही, पर पड़ोसियों के लिए अब तो बाजार जा आओ! नहीं तो पड़ोसियों को क्या मुंह दिखाएंगे? और मैं लोक लाज के लिए बड़ी हिम्मत जुटा बाजार निकल ही गया। पर मत पूछो मेरे क्या हाल थे।

बड़े अजीब से दिन आ गए हैं भाई साहब अब तो! अपने लिए नहीं, औरों के लिए जीना पड़ रहा है। बाजार में दूर से ही हर दिखावटी और मिलावटी चीजों को छूने के बदले उंगली लगा हरेक के दाम पूछ ही रहा था कि सामने भरत आते दिखे। आए होंगे बेचारे दीवाली के लिए सामान खरीदने? पर मायूस से! कमाल है यार! दीवाली में राम के लौटने के चंद ही दिन तो शेष बचे हैं। देश की जनता है कि राम के आने के बहाने की खुशी में बाजार को ही सिर पर उठाए घर आ रही है, कराहती हुई, लंगड़ाते हुई। ऐसे में जबकि पूरा देश खुश है, तो बंदे को खुश भी होना चाहिए कि चलो, हर बंदे को खुश रखने का पंगे से तो निजात मिलेगी। वरना आज तो जनता के हाल ये हैं कि उसे चाहे चौबीसों घंटे घी में ही तर कर रखो। चुनाव के वक्त वोट मांगने जाओ तो खुश्‍क की खुश्‍क ही मिलेगी। कहेगी, कौन जात के हो साहब! पहली बार देखा। कुछ लाए हो क्या? फोक्ट में कोई बात नहीं। मुंह का टेस्ट तुमने ही तो बिगाड़ कर रखा है।

पर फिर सोचा ,चौदह साल सत्ता का उपभोग करते कम नहीं होते! अब तो सत्ता का उपभोग करने अडिक्टिड हो गए होंगे। सोच रहे होंगे कि राम के आने पर सब मौज मस्ती चली जाएगी। आह रे सत्ता सुख! तबही उदास होंगे। यहां तो हमने ऐसे ऐसे बंदे भी देखे हैं कि दो दिन पहले जैसे कैसे चुन कर आते ही कुर्सी पर यों पसर जाते हैं मानों कुर्सी पर ही पैदा हुए हों। ऐसे में सत्ता का चौदह साल उपभोग तो बहुत होता है भाई साहब! क्या कहना है आपका इस बारे में?

उनसे जन्मों का परिचय था सो उन्हें रोकते पूछा,’ नमस्कार भाई साहब! और क्या हाल हैं? कुछ अधिक ही परेषान दिख रहे हो! राम के आने पर सत्ता सौंपने के बाद आम आदमी होने का दुख तो नहीं साल रहा है?ये सत्ता का नशा होता ही ऐसा है कि नेता तो नेता, नेता का चमचा खुद को नेता का बाप कहता फिरता है। पर साहब!सत्ता सदा को किसकी रही, चौदह साल मजे कर लिए अब तो …. ‘ तो वे मेरे कांधे पर अपना सिर रख बोले, ‘ मित्र! गलतफहमी पाल रखी है मेरे बारे में तुमने! मैं उनके आने पर दुखी नहीं हूं। मैं आदर्श भाई हूं! आज चाहे आपका बेटा भी आदर्श न रहा हो! मैंने तो उनके जाने के बाद सत्ता सुख को नहीं, उनके आदर्शों को पूजा है। मैं तुम्हारे लोकतंत्र के नेताओं की तरह नहीं जो कुर्सी मिलने पर बेचारे चाहकर कहीं अपना इलाज भी नहीं करवा पाते इस डर से कि अगर वे अपना इलाज करवाने किसी अस्पताल गए तो कहीं ऐसा न हो कि अगले क्षण उनमें आस्था रखने वाला ही उनकी कुर्सी पर फन न मार डाले और वे बेचारे अस्पताल में ही लेटे लेटे अपने में विश्‍वास रखने वालों को उंगली पर गिनते रहें। असल में मैं तो परेशान इसलिए हूं कि उनको लाने के लिए एक भी रथ ही नहीं मिल रहा। जहां थी रथ किराए पर लेने की बात करता हूं, रथ वाले कहते हैं कि रथ खाली नहीं। वैसे भी देश में अब गिनती के ही रथ बचे हैं। और जो हैं उनपर तुम्हारे नेता लोकनायक हो रथयात्रा पर हैं। बस, मुझे अब यही गम खाए जा रहा है । उनके आने को अब बचे ही कितने दिन हैं? और मैं अभी तक एक अदद रथ का भी इंतजाम नहीं कर पाया हूं। क्या सोचेंगे वे! कैसा शासन रहा मेरा! जब उनके आने पर उनके लिए ही एक रथ का इंतजाम नहीं कर पाया तो जनता के लिए क्या करता रहा हूंगा मैं?’ कह उनकी आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई तो मैंने उन्हें सांत्वना देते कहा,’ उनसे बात करके देख लो! शायद बात बन जाए। अबके उनकी रथयात्रा को कोई विषेश मकसद तो है नहीं। अपने लिए भर है। उनसे कहना कि भगवान जी से पार्टी को कहलवा उन्हें पार्टी से प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनवा देंगे,’ तो जैसे भरत को संजीवनी मिली,’ उनका नंबर है आपके पास?’ ‘ हां! ये लो!’ मैंने नंबर दिया तो वे थैंक्स मेरे हनुमान कह मुझे गले लगा आगे हो लिए। आइडियों की अपने पास कोई कमी नहीं है साहब! पर हम जैसों का मोल पारखी ही जानते हैं।

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