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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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army in kashmirरमेश शर्मा

जम्मू कश्मीर में बाढ़ का पानी उतर गया है। जिंदगी दोबारा अपनी रफ़्तार पकडऩे के लिए जूझ रही है। तूफान की धुंध खत्म हो गई है। तूफान के दौरान क्या घटा, मौन उजड़ा, कौन बचा सब साफ दिखने लगा है। इन साफ तस्वीरों में कुछ बातें चौंकाने वाली है। सबसे पहली तो यही कि तूफान,आंधी और पानी की प्रलयकारी बौछारों के बीच पीडि़तों की मदद के लिए केवल दो ही हाथ सामने आए एक सेना का और दूसरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का और हैरत में डालने वाली दूसरी बात यह है कि घाटी में कुछ लोगों ने मदद के लिए सामने आए स्वयंसेवकों और सैनिकों पर पत्थर बरसाए। लेकिन पत्थर खाकर भी मददगार पीछे नहीं हटे बल्कि डटे रहे। इसका कारण यह था कि पत्थर बरसाने वाले लोग गिरोह-बंद तो थे लेकिन उनकी सं या कम थी जबकि मदद के  आकांक्षी हजारों लोग हसरत की नजरों से अपने मददगारों को देख रहे थे और दुआ दे रहे थे।

पीडि़तों की मदद करना भारतीय सेना के जवानों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की अपनी शैली है। वे स्थान, समूह, वर्ग, वर्ण, धर्म, जाति अथवा आपदा के स्वरुप पर भेद नहीं करते। खबर मिलते ही पहुंचते हैं। भूकंप, रेल दुघर्टनाओं तथा बाढ़ की विभीषिका में ऐसे उदाहरण भी हैं जब स्वयंसेवक पहले पहुंचे और सरकार बाद में। अपने उसी संगठन के तहत स्वयंसेवक कश्मीर घाटी में पीडि़तों की सहायता के लिए पहुंचे। हालांकि संघ पर यह आरोप हमेशा लगता है कि वह केवल हिन्दुत्व के लिए काम करता है। हिन्दु का अर्थ किसी के लिए कुछ भी हो लेकिन संघ की नजर में हिन्दुस्तान में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति ‘हिन्दु’ है भले ही उसका पंथ और सम्प्रदाय कुछ भी हो। इसी भाव के साथ स्वयंसेवक घाटी में पहुंचे थे जबकि वहां 99 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। घाटी में एक समूह ऐसा है तो सदैव भारत विरोधी वातावरण बनाता है। भारत और भारत से जुड़े तमाम संदर्भों का विरोध करता है। वह नहीं चाहता कि भारतीय सेना या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्र को समर्पित संगठन की साख घाटी में प्रतिष्ठित हो। पत्थर मारने के पीछे असली मंशा यही थी। अब पत्थरों की बौछार के बीच सैनिक और स्वयंसेवकों की सेवा कैमरे में कैद है। इसका विवरण सेना के पास भी है और संघ के पास भी जो पिछले दिनों लखनऊ में संपन्न संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक में सामने आया। संघ की इन तमाम सेवाओं को नजर अंदाज करते हुए उत्तरप्रदेश समाजवादी पार्टी के चर्चित नेता आजम खान ने राज्य और केन्द्र सरकार को चिट्ठी लिखी। उनका आरोप है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सांप्रदायिक राजनीति करता है। उन्हें संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत द्वारा हिन्दू शब्द का प्रयोग करने पर ऐतराज है। उनका यह भी तर्क हैं कि केन्द्र में भाजपा सरकार आने के बाद संघ के ‘अच्छे दिन’ आ रहे हैं। लगभग ऐसी ही मिलती जुलती प्रतिक्रिया कांग्रेस नेता श्री दिग्विजय सिंह ने भी व्यक्त की। इन दोनों प्रतिक्रिया करने वालों को ‘इंडियन’ शब्द से एतराज नहीं है जो अंग्र्रेजों का दिया हुआ है और उस शब्द के मूल में भी ‘हिंदू’ शब्द है लेकिन संघ प्रमुख द्वारा‘हिन्दू’ शब्द के उपयोग पर आपत्ति होती है। प्रजातंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजी राय रखने और व्यक्त करने का अधिकार है लेकिन सरेआम सा प्रदायिक राजनीति करने वाले हैदराबाद के औवेसी के भाषण पर कोई टिप्पणी न हो या दिल्ली के इमाम बुखारी के कथनों पर कोई प्रतिक्रिया न हो तब इनकी प्रतिक्रियाओं पर आश्चर्य होना स्वाभाविक है। खासकर तब जब  संघ के सेवा कार्यों में भेदभाव नहीं दिखता। संघ के स्वयं सेवक सेवा के लिए यदि उत्तराखंड जाते हैं तो कश्मीर की घाटी में  भी जाते हैं। बाढ़ में, रेल-बस दुर्घटनाओं में अथवा भूंकप से प्रभावित क्षेत्रों में भी वे बिना जाति धर्म पूछ सेवा करते हैं किन्तु श्री आजम खान इस सेवा कार्य पर कोई टिप्पणी नहीं करते।

कश्मीर की आपदा में एक खास बात और देखी गई। मौलाना बुखारी, आजम खान और हैदराबाद  के औवेसी जिनकी जुबान पर केवल मुसलमानों की बात होती है, इनमें से कोई व्यक्ति या इनका प्रतिनिधि अथवा इनके द्वारा संरक्षित संस्थाओं में कोई भी कश्मीर घाटी में राहत या सेवा के लिए नहीं पहुंचा। वहां अगर सबसे पहले कोई पहुंचा तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक पहुंचे,सुरक्षा बलों के जवान पहुंचे जिन्हें कुछ लोगों ने अपशब्द कहकर या पत्थर मारकर  भगाने की कोशिश की बावजूद इसके वे डटे रहे। अपने दायित्व को पूरा करके ही वहां से रवाना हुए। संघ के इन्हीं सेवा कार्यों का नतीजा है कि उसका काम निरंतर विस्तार पा रहा है। संघ की स्थापना से आज तक यह अकेला संगठन है जिसे निरंतर विस्तार मिल रहा है। जो विपरीत परिस्थिति में भी अपनी जगह कायम रहा।

संघ द्वारा की जाने वाली यह जमीनी सेवा और विचलित हुए बिना राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण का भाव ही है जिससे हजार विरोधों के बावजूद संघ के काम बढ़ रहा है। कार्यकारी मंडल के सामने संघ ने कार्य-विस्तार का जो विवरण आया उसके अनुसार देश में 43500 शाखाएं नियमित लग रही हैं। जबकि 11854 साप्ताहिक शाखाएं इससे अलग हैं। संघ की दुनिया में वे लोग सामूहिक शाखा में जाते हैं जो किन्हीं कारणों से नियमित शाखाओं में नहीं जा पाते जबकि इस वर्ष 59 हजार स्थानों पर गुरुपूजा हुई। भारत के अलावा 36 अन्य देशों में संघ का प्रत्यक्ष कार्य चल रहा है। इनमें अमेरिका में140, इंग्लैंड में 80 और श्रीलंका में 70 स्थानों पर संघ कार्य हो रहे हैं।

राजनैतिक या अन्य कारणों से मीडिया में कुछ लोग कुछ भी प्रचारित करें लेकिन संघ के प्रति लोगों का विशेषकर नौजवानों का रुझान किस प्रकार बढ़ रहा है इसका उदाहरण उस बेवसाइड से मिलता है जिसपर 67 हजार लोगों ने संघ से जुडऩे के लिए पंजीयन कराया। प्रत्यक्ष शाखाओं के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक ज्वाइन आर.एस.एस. नाम से एक बेवसाइट बनाई है। इस बेबसाइड को प्रतिदिन हजारों लोग खोलकर देखते हैं और संघ से जुडऩे की इच्छा दिखाते है। पिछले दिनों हम‘आन-लाइन’ स्वयंसेवकों का एक समागम कर्नाटक में आयोजित किया गया जिसमें चार हजार लोगों ने हिस्सा लिया इस समागम में 650 महिलाएं थीं जिन्होंने ‘समर्थ भारत’ का संकल्प लिया।

इस समागम में आए 35 लोगों ने सेवा के लिए पूर्णकालिक बनने की इच्छा व्यक्त की। इन्हें सेवा का यह जज्बा संघ के सेवा कार्यों को देखकर ही हुआ। बेबसाइट के माध्यम से शिविर में आए कार्यकर्ताओं को 47 प्रकार के सेवा कार्यों का परिचय दिया गया इन कार्यकर्ताओं को यह संकल्प भी दिलाया गया है कि बिना किसी भेदभाव, बिना परवाह किए सेवा के संकल्प को पूरा करते हैं जिसका नमूना कश्मीर के तूफान में देखने को मिला कि पत्थर खाकर भी सेवा के कामों में जुटे रहे।

No Responses to “पत्थर खाकर भी कश्मीर में सेवा की संघ और सेना दोनों ने”

  1. kkailash

    हालांकि संघ पर यह आरोप हमेशा लगता है कि वह केवल हिन्दुत्व के लिए काम करता है। हिन्दु का अर्थ किसी के लिए कुछ भी हो लेकिन संघ की नजर में हिन्दुस्तान में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति ‘हिन्दु’ है भले ही उसका पंथ और सम्प्रदाय कुछ भी हो। इसी भाव के साथ स्वयंसेवक घाटी में पहुंचे थे जबकि वहां 99 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। घाटी में एक समूह ऐसा है तो सदैव भारत विरोधी वातावरण बनाता है। भारत और भारत से जुड़े तमाम संदर्भों का विरोध करता है। वह नहीं चाहता कि भारतीय सेना या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्र को समर्पित संगठन की साख घाटी में प्रतिष्ठित हो। पत्थर मारने के पीछे असली मंशा यही थी

    क्या इसी का नाम सम्प्रयदिकता है यदि ऐसा है तो स्वयंसेवक को बार बार नमन है। पत्रकारिता क्या इतनी गरीब हो गया है की इसके बारे में कही भी इसका जिक्र नहीं किया गया

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