कुमार कृष्णन
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत केवल चुनाव नहीं होती, बल्कि यह भी होती है कि नागरिक बिना भय के सरकार से सवाल पूछ सकें। विशेष रूप से छात्र आंदोलन किसी भी लोकतांत्रिक समाज की जीवंतता का प्रमाण माने जाते हैं। विश्वविद्यालयों और सड़कों पर उठने वाली आवाजें केवल तत्कालीन मुद्दों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे भविष्य की राजनीति, नीतियों और सामाजिक चेतना को भी प्रभावित करती हैं। इसलिए जब किसी छात्र आंदोलन का उत्तर व्यापक गिरफ्तारियों, कठोर धाराओं और पुलिस बल से दिया जाता है, तब प्रश्न केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक चरित्र का बन जाता है।
नीट परीक्षा में कथित धांधली, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर बिहार में शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का विषय बन चुका है। बिहार बंद के दौरान कुछ स्थानों पर हिंसा, पथराव और आगजनी की घटनाएं भी सामने आईं। सरकार और पुलिस का कहना है कि इन्हीं घटनाओं के आधार पर कानून के अनुरूप कार्रवाई की जा रही है। दूसरी ओर विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों का आरोप है कि हिंसा में शामिल लोगों की पहचान कर कार्रवाई करने के बजाय पूरे आंदोलन को अपराध की तरह देखा जा रहा है।
पटना में 22 और 25 जुलाई की घटनाओं के बाद 24 एफआईआर दर्ज की गईं और 258 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 87 छात्रों को आधी रात में न्यायिक पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर बेउर केंद्रीय कारागार भेज दिया गया। बाद में राज्य के अन्य जिलों में भी गिरफ्तारियों का सिलसिला तेज हुआ। छपरा, भागलपुर, सासाराम और अन्य जिलों में भी बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया। पुलिस का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जा रही है तथा कानून से ऊपर कोई नहीं है।
लेकिन इस कार्रवाई के तरीके ने बहस को जन्म दिया है। आधी रात को छात्रों को न्यायिक पदाधिकारी के आवास पर प्रस्तुत करना, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां, सोशल मीडिया पर संदिग्धों की तस्वीरें जारी करना और लगातार छापेमारी—इन सबने यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या राज्य आंदोलन को नियंत्रित करने की बजाय उसे अपराधीकरण की दिशा में ले जा रहा है?
यही कारण है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तीखी हुई हैं। सांसद पप्पू यादव ने लोकसभा में छात्रों के समर्थन में तख्तियां लेकर विरोध दर्ज कराया। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या अपने हक और न्याय के लिए आवाज उठाना कोई गुनाह है?” उनका कहना था कि प्रदर्शन करने वाले बच्चों और बेटियों के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। उनके अनुसार लोकतंत्र में छात्रों की आवाज को पुलिस बल से दबाने का प्रयास भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार का पहला दायित्व परीक्षा प्रणाली को निष्पक्ष बनाना, पेपर लीक रोकना और शिक्षा व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है। यदि इसके बजाय भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों पर मुकदमे दर्ज किए जाएं, लाठीचार्ज हो और उन्हें जेल भेजा जाए, तो यह लोकतंत्र की भावना के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। उन्होंने युवाओं के साथ हो रहे व्यवहार को अमानवीय बताते हुए सरकार से दमन के बजाय संवाद का रास्ता अपनाने की अपील की।
कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के अध्यक्ष पवन खेड़ा ने भी बिहार में छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने विशेष रूप से सीवान में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस द्वारा कथित गोलीबारी और अत्यधिक बल प्रयोग की निंदा करते हुए कहा कि युवाओं के साथ जिस प्रकार की कार्रवाई की जा रही है, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों के विरुद्ध अत्यधिक बल प्रयोग किया गया और इस पूरे घटनाक्रम पर केंद्र तथा राज्य सरकार को जवाब देना चाहिए। उन्होंने गृह मंत्री से संसद में इस मामले पर विस्तृत वक्तव्य देने की मांग करते हुए कहा कि लोकतंत्र में छात्रों की आवाज का उत्तर संवाद से दिया जाना चाहिए, न कि भय और दमन से। कांग्रेस ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने तथा पीड़ित छात्रों को न्याय दिलाने की भी मांग की है।
यहां यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि सीवान की घटना को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावे सामने आए हैं। विपक्ष ने जहां पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए हैं, वहीं प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई। ऐसे मामलों में तथ्यों का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए।
उधर सामाजिक कार्यकर्ता परिधि के उदय ने पुलिस की भूमिका की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए कहा कि पुलिस सुधार के लिए राष्ट्रीय पुलिस आयोग से लेकर अनेक समितियां गठित हुईं और सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए, लेकिन व्यवहार में पुलिस की कार्यशैली में अपेक्षित परिवर्तन दिखाई नहीं देता। उनका मानना है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रति पुलिस का रवैया अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। यदि पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत करेगी।
इन आलोचनाओं के समानांतर सरकार और पुलिस का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी प्रदर्शन में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, पुलिस पर हमला हुआ या आगजनी की गई, तो कानून के अनुसार कार्रवाई करना राज्य का दायित्व है। किसी भी लोकतंत्र में हिंसा को वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता। इसलिए हिंसा करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या कार्रवाई केवल दोषियों तक सीमित है या उसका दायरा पूरे आंदोलन तक फैल गया है? यही विवाद का मूल बिंदु है।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। यही अधिकार लोकतंत्र को जीवंत बनाते हैं। दूसरी ओर संविधान राज्य को यह दायित्व भी देता है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखे। चुनौती तब पैदा होती है जब इन दोनों दायित्वों के बीच संतुलन बिगड़ने लगता है। लोकतांत्रिक शासन की कसौटी इसी संतुलन को बनाए रखने में है।
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि छात्र आंदोलनों ने देश को नई दिशा दी है। स्वतंत्रता आंदोलन में विद्यार्थियों की भागीदारी हो, गुजरात का नव निर्माण आंदोलन हो या 1974 का जयप्रकाश नारायण का छात्र आंदोलन—युवाओं ने समय-समय पर व्यवस्था परिवर्तन की मांग उठाई। विडंबना यह है कि बिहार वही राज्य है जहां से संपूर्ण क्रांति का आंदोलन शुरू हुआ था और जिसके अनेक आंदोलनकारी बाद में सत्ता के शीर्ष पदों तक पहुंचे। आज भी जेपी आंदोलन के सेनानियों को सम्मान और पेंशन दी जाती है। ऐसे राज्य में छात्र आंदोलनों के प्रति कठोर प्रशासनिक रवैया स्वाभाविक रूप से व्यापक बहस को जन्म देता है।
1974 के छात्र आंदोलन के दिनों में कवि रामगोपाल दीक्षित की पंक्तियां युवाओं की चेतना का उद्घोष बन गई थीं— “तिलक लगाने तुम्हें जवानों, क्रांति द्वार पर आई है।” यह केवल एक कविता नहीं थी, बल्कि उस दौर के युवाओं के आत्मविश्वास, परिवर्तन की आकांक्षा और व्यवस्था से सवाल पूछने के साहस का प्रतीक थी। आधी सदी बाद बिहार की सड़कों पर फिर छात्र अपने भविष्य, शिक्षा व्यवस्था और अवसरों को लेकर खड़े हैं। समय, परिस्थितियां और मुद्दे भिन्न हैं, इसलिए दोनों आंदोलनों की सीधी तुलना उचित नहीं होगी। लेकिन एक प्रश्न दोनों दौरों को जोड़ता है—क्या लोकतंत्र युवा पीढ़ी की असहमति को सुनने का धैर्य रखता है?
इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस सुधार के पुराने प्रश्न को भी फिर से जीवित कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त, अधिक जवाबदेह और पेशेवर बनाने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। राष्ट्रीय पुलिस आयोग सहित अनेक समितियों ने भी पुलिस को नागरिक-हितैषी बनाने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद जब भी बड़े आंदोलन होते हैं, पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर वही पुराने प्रश्न सामने आ जाते हैं। क्या पुलिस निष्पक्ष है? क्या बल प्रयोग अंतिम विकल्प था? क्या गिरफ्तारियां आवश्यक सीमा तक ही सीमित थीं? इन प्रश्नों का उत्तर किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही मिल सकता है।
यह विवाद केवल बिहार तक सीमित नहीं है। जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध का राष्ट्रीय प्रतीक रहा है। किसान आंदोलन से लेकर छात्र आंदोलनों तक, अनेक जन आंदोलनों ने वहीं से अपनी आवाज बुलंद की। यदि आज वही बेचैनी बिहार की सड़कों पर दिखाई दे रही है, तो यह संकेत है कि युवाओं का असंतोष केवल परीक्षा तक सीमित नहीं है। वह रोजगार, शिक्षा, अवसर, पारदर्शिता और शासन की जवाबदेही जैसे व्यापक प्रश्नों से जुड़ चुका है।
लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी होती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून का पालन हो, लेकिन कानून के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं का अनावश्यक हनन न हो। विपक्ष को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन का समर्थन करता है, न कि हिंसा का। यदि दोनों पक्ष अपने-अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन करें, तो किसी भी आंदोलन का समाधान संवाद से निकल सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हिंसा में शामिल व्यक्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। जिनके विरुद्ध ठोस साक्ष्य हैं, उनके खिलाफ निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई हो। वहीं जिन छात्रों पर केवल भीड़ का हिस्सा होने के कारण कठोर धाराएं लगाई गई हैं, उनके मामलों की निष्पक्ष समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। न्याय का अर्थ केवल अपराधियों को दंड देना नहीं, बल्कि निर्दोषों की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है।
बिहार का यह छात्र आंदोलन अंततः केवल एफआईआर, गिरफ्तारियों या जेल भेजे गए छात्रों की संख्या से नहीं आंका जाएगा। इतिहास हमेशा यह दर्ज करता है कि सत्ता ने असहमति के साथ कैसा व्यवहार किया, न्यायपालिका ने नागरिक स्वतंत्रताओं की कितनी रक्षा की, विपक्ष कितना जिम्मेदार रहा और समाज ने युवाओं की बेचैनी को किस गंभीरता से समझा। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति विरोध को कुचलने में नहीं, बल्कि उसे सुनने और उसका उत्तर देने में होती है। यदि बिहार का यह घटनाक्रम शासन और समाज दोनों को संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही की ओर ले जाता है, तो यह केवल एक आंदोलन नहीं, लोकतंत्र के आत्ममंथन का अवसर भी सिद्ध हो सकता है। यही जंतर-मंतर की वास्तविक चेतावनी है।