सुन्दरम् सुन्दरम्
सुन्दरम् सुन्दरम् विश्व अति सुन्दरम् !
कुन्दनम् ज्योतिमय भव्य उर केशवम् !
अखिल आलोकमय है त्रिलोकी स्वयम् !
पुष्प जल प्राण मय सूर्य सुर प्रेरितम्!
शुभ्र सुषमा प्रखर माधवी मन विचर;
शैल संयम समाहित खड़ा है रुचिर!
चिर अनिद्रित है मन्द्रित उदधि प्रति प्रहर;
प्रणव अँगड़ाई लेता सुमन ज्यों सिहर !
भाव भव में फुरा, अग्नि भूमा त्वरा;
प्रौढ़ हर तत्व कर, गौण हर भूत कर !
गर्व चूर्णित करा, लक्ष धूमिल करा;
धूसरित धूल को धवल धरिणी करा !
वह विदग्धित विलोके विहर बस रहा;
रच रचा रस रसा रास करता रहा !
छवि सुरभि ‘मधु’ मनों की संजोये मर्म;
शिव अनन्दित उषा उर उमा शोभितम् !
गोपाल बघेल ‘मधु’