कस्तूरी दिनेश
शकूर भाई ही नहीं उनके पूरे परिवार के चेहरे पर आजकल बड़ी रौनक है | कलकत्ता में इतने साल से हैं पर पूरे परिवार के चेहरे पर ऎसी चमक कभी नहीं दिखी थी | अंडे की उनकी दुकान से बस इतनी ही आमदनी हो पाती थी कि ले-देकर वे परिवार का भरण -पोषण कर पाते थे | पिछली ईद में तो हाल ये था कि बच्चो के लिए नये कपड़े भी नहीं सिलवा पाए थे ! मैं उनसे जब भी मिलता ,उनके चेहरे की घड़ी की सुई बारह पर अटकी मिलती पर इस बार पूछिए मत ! बीवी-बच्चों के नये-नये लिबास के साथ खुद भी रोज झक्क सफेद कुरते पैजामे में इत्र की खुशबू बिखेरते,हंसते-मुस्कुराते वे ऐसे मिलते जैसे घर के पिछवाड़े खुदाई में कोई गड़ा धन मिल गया हो ! कल उनकी दुकान की तरफ से गुजरा तो मन हुआ कि रोज-रोज सब्जी की चिकचिक के बदले आज शाम घर के लिए अंडे ही ले चलूँ ! उनकी दुकान पहुंचा तो वहाँ भारी भीड़ और धक्का-मुक्की का आलम था ! कोई एक साथ दो दर्जन अंडे ले रहा है तो कोई चार दर्जन ! भीड़ और धक्कम-धुक्की ऎसी कि जैसे किसी राजनीतिक पार्टी की चुनाव की टिकट के लिए रेलमपेल हो ! शकूर भाई और उनके साहबजादे भीड़ को सम्हालते और अंडे की मांग को पूरा करते–करते पसीने-पसीने हो रहे थे ! वहाँ अंडे की दुकान के बदले प्लासी के युद्ध जैसा दृश्य था | मेरी तो हिम्मत ही नहीं हुई कि उस भयानक रणभूमि में प्रवेश पा सकूं ! मैं भीड़ के छटने का इंतजार करते हुए एक किनारे खड़ा हो गया | काफी देर के बाद उस हड़बोंग भरे माहौल में किसी ग्राहक से उलझते हुए अचानक शकूर भाई की पिंपियायी आवाज सुनाई पड़ी—“अब अंडे हई नई मियाँ,तो कहाँ से दूं…? मैं पैदा करूँ क्या…?” थोड़ी देर में भीड़ चेहरे पर शिकायत और निराशा लिए दुकान के सामने से एक-एक कर छट गई ! शकूर भाई की नजर अचानक मुझ पर पड़ी ! वे भीड़ से जूझने की परेशानी वाले चेहरे पर खिसियायी मुस्कान बिखेरते हुए सामने रखी कुर्सी खिसकाते हुए कूके—“अरे दिनेश जी, आप…? वहाँ क्यों खड़े हैं…? आइये न अंदर आइये…? मैं भी मुस्कुराते हुए इस आशा के साथ दुकान के अंदर घुसा कि जान-पहचान होने के कारण शायद घर के अंदर दबे माल की तरह कुछ अंडे हों तो मुझे मिल जाएँ! मैंने ओठों पर मजाकिया हंसी सजाये कुर्सी में बैठते हुए कहा—“ शकूर भाई,क्या राज है…? आजकल तो दुकान में बिक्री के चौके-छक्के लग रहे हैं…! इस बार उनके चेहरे की झुंझलाहट पूरी तरह गायब हो चुकी थी और उसके बदले ओंठों पर छतीस इंची मुस्कान खिलखिला रही थी | वे मेरी तरफ देखकर शरारती आवाज में बोले-“सब टीएमसी और दीदी की इनायत…!”उनकी रहस्यवादी बात सुनकर पहले तो मैं चकराया, फिर उनको भौकवायी नजर से घूरते हुए पूछा—“ये टीएमसी और दीदी क्या बला है भाई…?”
वे संसद में विपक्षी पार्टी को जवाब देते गृहमंत्री शाह की तरह व्यंग्य से मुस्कुराते हुए बोले-“नई समझे..? दीदी और दीदी की टीएमसी पार्टी जब से चुनाव हारी है,अंडा-पूजा का ट्रेंड चल रहा है ! जहां भी टीएमसी का कोई मंत्री ,सांसद ,विधायक दिखा कि दे दनादन अंडा मारो प्रतियोगिता शुरू ! ‘सन्डे हो या मंडे, रोज खाओ अंडे’ के साथ–साथ अब पूरे बंगाल में ‘रोज मारो अंडे” का दौर चला हुआ है ! बस यही मेरे अंडा बिजिनेस के दिन दूनी रात चौगुनी सफलता के चौके-छक्के का राज है !’ अपनी बात को खत्म करते हुए वे आदत के अनुसार मेरी पीठ पर धौल जमाकर बड़ी जोर से खिलखिलाए ! मैं उनका वजनदार धौल खाकर, पान से रंगे उनके कत्थई दांतों को किसी नये नवेले भोंदू डेंटिस्ट की तरह भौचक देखता ही रह गया !
कस्तूरी दिनेश