लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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वीरेन्द्र सिंह परिहार
सुशासन यानी कि अच्छा शासन, #कुशासन का, #भ्रष्टाचार का, #भाई-भतीजेवाद का अभाव। सम्प्रदाय, जाति, अपने-पराये के आधार पर कार्य न होकर समता और न्यायपूर्ण दृष्टि से सरकार के कार्य हों। नागरिकों को वाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा प्राप्त हो, नागरिक लालफीताशाही, नौकरशाही के शिकार न हो। समाज में सबसे अंतिम छोर पर खड़े कमजोर-से-कमजोर व्यक्ति की भी सुनवाई हो, और उसे यह एहसास हो सके कि शासन-व्यवस्था उनके लिए तो है ही इसमें उनकी भी भागीदारी है। जब हम सुशासन की बातें करते हैं तो सहसा रामराज्य की बातें याद आती हैं। जैसा कि बाबा तुलसी ने लिखा- ‘‘नहि कोउ दरिद्र, दुखो न दीना, नहि कोई अबुध न लक्षण हीना।’’ कहने का आशय यह कि रामराज्य में कोई भी व्यक्ति दरिद्र, दुखी और दीन तो है ही नहीं, इसके अलावा कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसे बुद्धिहीन और व्यक्तित्व-विहीन कहा जा सके। कहने का आशय यह कि रामराज्य में भौतिक दृष्टि से ही सक्षम नागरिक तो हैं हीं, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक तौर पर भी समर्थ नागरिक हैं। तभी तो सभी सुशिक्षित ही नहीं, अपने-अपने कार्यों में उन्हें विशेषज्ञता भी हासिल है, न लक्षण हीना से तात्पर्य यहीं है।
आधुनिक सन्दर्भों में जब हम सुशासन की बातें करते हैं तो हमें छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मरण आता है। छत्रपति शिवाजी महाराज का अपने सैनिकों के लिए स्पष्ट आदेश था कि उनके सैनिकों द्वारा किसानों की खड़ी फसल को किसी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाना, व्यापारियों से कोई चीज पूरे दाम चुका कर ही खरीदना, महिलाओं के साथ यहां तक कि शत्रु की महिलाओं के साथ भी कोई अनुचित व्यवहार न करना। यदि इनमें कोई चूक किसी से हुई तो कठोर दण्ड का भागी होना! शिवाजी महाराज की सुशासन नीति का ही कमाल था कि समाज के अन्यतम छोर पर खड़े दीन-हीन मावले स्वराज्य के श्रेष्ठ सैनिकों में रुपांतरित हो गए- जिन्होंने सिर्फ आदिलशाही के ही नहीं, बल्कि मुगलिया सल्तनत की भी चूलें हिला दीं।
उपरोक्त सन्दर्भों में जब हम मोदी सरकार को कसौटी पर कसते हैं, तो यह पाते हैं मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही सुशासन की दिशा में ऐसे कदम उठाने शुरु कर दिए- जिन्हें निस्संदेह मील का पत्थर कहा जा सकता है। जहां तक देश में कानून-व्यवस्था एवं देश की आंतरिक सुरक्षा का सवाल है, संविधान के अनुसार वह राज्यों का विषय है, इसलिए मोदी सरकार से इस विषय पर अपेक्षा करना उचित नहीं होगा। लेकिन जहां तक वाह्य सुरक्षा का प्रश्न है, उस दिशा में मोदी सरकार ने ऐतिहासिक कार्य किया है। पहली बात तो यह कि मोदी सरकार ने रक्षा सौदे के क्षेत्र में यू.पी.ए. सरकार के दौर में व्याप्त जड़ता को समाप्त किया है। देश की सुरक्षा की दृष्टि से दूसरे देश से जहां लाखों करोड़ के अस्त्र-शस्त्रों की खरीदी हुई है, वहां दूसरे देशों के सहयोग से भारत में अस्त्र-शस्त्र बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़े हैं। पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक कर देश में जहां एक नया विश्वास भरा है, वहीं चीन की दादागीरी की कतई परवाह न करते हुए उत्तर-पूर्वी सीमा तक सड़कों और रेल लाइनों का जाल बिछाने का काम शुरू किया है, वहीं चीन की सीमाओं पर ब्रम्होस जैसी मिसाइल और राफेल जैसे लड़ाकू विमानों की तैनाती की है। वह दौर गया जब चीनी सैनिक हमारी सीमाओं में चार-चार कि.मी. तक घुस आते थे, और मनमानी करते थे। अब चीनी सैनिकों को रंच-मात्र घुसपैठ का भी हमारी सेनायें पूरी ताकत से प्रतिरोध करती हैं। निस्संदेह अमेरिका से रक्षा-संधि मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि है, जिसके चलते डैªगन को सिर्फ संतुलित ही नहीं किया जाएगा, बल्कि उसे नियंत्रित भी रखा जा सकेगा। कुल मिलाकर देश के नागरिक इस बात से पूरी तरह संतुष्ट हो सकते हैं कि मोदी सरकार देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए पूरी तरह सजग है, और इसे लेकर धन की कमी कहीं भी आड़े नहीं आ रही है।
मोदी सरकार आधारभूत संरचना के क्षेत्र में तेजी से काम कर रही है। यू.पी.ए. सरकार के दौर में जहां 2 कि.मी. राजमार्ग रोजाना बन रहे थे, वहीं अब 30 कि.मी. रोजाना बन रहे हैं, इतना ही नहीं आनेवाले दिनों में इसकी गति और बढ़ेगी। मोदी सरकार आने के पूर्व देश के अठारह हजार गाॅव बिजली विहीन थे, जिनमें आधे से ज्यादा गाॅवों में बिजली पहंुच चुकी है और इस बात की पूरी उम्मीद है कि अगले लोकसभा चुनाव तक देश का कोई भी गाॅव बगैर बिजली के नहीं रह जाएगा। मोदी सरकार का यह एक चमत्कार ही कहा जा सकता है कि कभी 400 रुपये में बिकने वाला एल.ई.डी. बल्ब वर्तमान समय में 60 रु. में बिक रहा है। मोदी सरकार का जोर पूर्ववर्ती सरकार की तरह लोक लुभावन योजनाओं की ओर न होकर दीर्घकालीन योजनाओं पर है। यह सरकार वोट की खातिर नई रेलगाड़ियाॅ न चलवाकर नई पटरियाॅ बनाने और रेल-सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य कर रही है। यह बताने की जरुरत नहीं कि रेलों की लेटलतीफी की बड़ी वजह रेल पटरियों पर ज्यादा टेªनों के चलने की वजह से ज्यादा दबाव होना है।
स्वतंत्र भारत में इधर हाल के वर्षों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भयावह लूट मची है। शिक्षा तो समवर्ती विषय है, पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोदी सरकार ने नागरिकों को भारी रियायतें दी है। डाॅक्टरों की दवा कम्पनियों से सांठ-गांठ पर लगाम लगाने की ईमानदारी से कोशिश की गई है। अब डाॅक्टर दवा कम्पनियों से एक हजार से ज्यादा के गिफ्ट नहीं ले पाएंगे। वहीं दवा कम्पनियों द्वारा प्रायोजित डाॅक्टरों के विदेश-यात्राओं पर भी रोक लगाई जा रही है। बड़ी बात यह कि जो दवा कम्पनियाॅ सरकारी खरीद के लिए टेंडर भरेगी, वह ब्रांडेड नाम से नहीं जेनरिक नाम से भरेगी। जीवनोपयोगी दवाओं की कीमतें भारी मात्रा में घटा दी गई हैं। कई दवाओं के दाम तो आधे से ज्यादा कम कर दिए गए हैं। जिनमें दवाओं की विक्री 20 फीसदी से कम दर पर होगी। कैंसर की दवाओं में तो 86 प्रतिशत तक की कमी कर दी गई है। हार्ट के आॅपरेशन पश्चात लगने वाले स्टेंट की कीमतों में चार से पाॅच गुना कम कर दी गई है, और जिन अस्पतालों द्वारा ज्यादा कीमतें लिए जाने की शिकायतें मिली हैं, सरकार उनके विरुद्ध सख्त कदम उठा रही है। मोदी सरकार पूरे देश में दवाओं की विक्री के लिए जन स्टोर खोलने जा रही है। इसका मतलब यह नहीं कि शिक्षा का क्षेत्र अछूता है। शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके माध्यम से देश के लिए सुयोग्य और चरित्रवान नागरिक तैयार किए जा सकते हैं। यह भी बताने की जरुरत नहीं कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा ही सर्वाधिक उपेक्षित क्षेत्र रहा। 80 से 85 के मध्य प्रदेश के एक मुख्यमंत्री तो शिक्षा के क्षेत्र को भी वोट बैंक की तरह व्यवहार करते हुए लाखों अपात्रों को शिक्षक बना दिया था और पूरे शिक्षा का क्षेत्र तदर्थवाद से ग्रस्त हो गया था। परन्तु मोदी सरकार इस दिशा में पूरी तरह सजग है। इसके लिए प्राथमिक शिक्षा में सुधार के लिए केन्द्र सरकार योग्य शिक्षक तैयार करने की दिशा में आधारभूत कदम उठाने जा रही है। इसके लिए मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की तरह एक राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित कराए जाने पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है।
नोटबंदी को लेकर पक्ष-विपक्ष में चाहे जितनी बातें की जाए, वस्तुतः यह सुशासन की दिशा में ही उठाया गया एक निहायत साहसिक कदम था। कुछ लोग नोटबंदी को लेकर अर्थव्यवस्था को ढह जाने को लेकर भविष्यवाणी कर रहे थे, वहीं नोटबंदी के बाद भी जी.डी.पी. को उसी हालात में बढ़ती देखकर मीन-मेख तलाशने में लगे हैं। जिन लोगों का यह कहना है कि नोटबंदी के बावजूद भी अमूमन कालाधन बैंकों में आ गया, उन्हें यह पता होना चाहिए कि कालाधन बैंकों में जमा करने वाले आयकर की राडार में आ गए हैं और उनका बच निकलना कतई संभव नहीं है। लेकिन सुशासन की दिशा में नोटबंदी मोदी सरकार की अंतिम नहीं पहली बड़ी यात्रा है। तभी तो केन्द्रीय बजट में वित्तमंत्री तीन लाख से ज्यादा नकद के ट्रांजिक्सन पर रोक लगा देते हैं। एक निश्चित राशि से ज्यादा रकम अब कोई भी अपने पास नहीं रख सकता। सर्वत्र आनलाइन कारोबार एवं पद्धति प्रभावी की जा रही है। यानी सर्वत्र पारदर्शिता जिसके चलते भ्रष्टाचार के अवसर कम-से-कम हों और हमारी यात्रा सतत् सुशासन की ओर बढ़ सके। सुशासन की दिशा में मोदी सरकार का बड़ा कदम बेनामी सम्पत्ति के खिलाफ बनाए गए कानून को प्रभावी ढंग से क्रियान्वित करना है। कौन नहीं जानता कि भ्रष्ट लोग बड़ी मात्रा में बेनामी सम्पत्ति इकठ्ठा किए हुए हैं? इसी के साथ रियल इस्टेट में भी जिस ढंग से ब्लैकमनी का उपयोग होता है, उस दिशा में भी मोदी सरकार प्रभावी कदम उठाने जा रही है।
निर्णायक बात यह कि मोदी सरकार ने राजनीति की परिभाषा को बहुत हद तक बदल दिया है। जो राजनीति अभी तक नकारात्मक पहलुओं से भरी पड़ी थी, वह मोदी सरकार की नीतियों के चलते विश्वास और आस्था का पर्याय बनती जा रही है। लोगों को यह एहसास हो चला है कि अब राजनीति भोग का नहीं अपितु सेवा का माध्यम है। इसी का नतीजा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति मतदाताओं का विश्वास दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। एक सर्वे के अनुसार यदि आज चुनाव हो तो एन.डी.ए. को 2014 से भी ज्यादा सीटें मिलेगी। लोगों को यह विश्वास हो चला है कि मोदी भ्रष्ट एवं लूट की व्यवस्था के विरुद्ध जंग को निर्णायक स्थिति में ले जाएंगे। तभी तो पुष्ट सूत्रों से आ रही खबरों के अनुसार 11 मार्च को पाॅच राज्यों के घोषित होने जा रहे चुनाव नतीजे पंजाब को छोड़कर भाजपा के पक्ष में पूरी तरह संभावित हैं। यह मोदी सरकार के सुशासन की नीतियों के प्रति जन समर्थन ही कहा जाएगा। निस्संदेह रास्ता बहुत लम्बा है, पर देश सुशासन की राह पर तेजी से चल पड़ा है।

3 Responses to “सुशासन के आइने में मोदी सरकार”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    अभी पाँच राज्यों के विधान सभा के परिणाम आ गए हैं।
    और आप का आलेख शत प्रतिशत सच प्रतीत होता लगता है।
    शासक पक्ष ऐसी परिस्थिति में, आत्मविश्वास की अति से पीडित होने की संभावना होती है।
    मेरा संकेत दुय्यम नेतृत्व की ओर है।
    जनता भा. ज. पा. से (१) भ्रष्टाचार रहित (२) सर्वजन हिताय (३) सकारात्मक (४) अंतरबाह्य प्रामाणिक (५) पारदर्शी (६)सकल राष्ट्र हितैषी; ऐसे शासन की अपेक्षा करती है।
    यह विधान मैं विशेष कर नए प्रादेशिक शासनों को लक्ष्य कर कर रहा हूँ।
    जनता आज अधीर है।
    शीघ्रातिशीघ्र, और (सुरक्षा को छोडकर अन्य) क्षेत्रों में पारदर्शिता चाहती है।
    नए शासक सावधान!
    आप की परीक्षा अब प्रारंभ होती है।
    अत्योचित बिन्दुओं को उजागर करने पर, लेखक को शतशः धन्यवाद।

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  2. इंसान

    युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी द्वारा दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से समस्त भारतवासियों को संबोधित करते कहे उनके हार्दिक वचन आज भी प्रकृति की गोद से प्रवाहित विशाल झरने की कल कल में शांत कोलाहल की भांति मेरे मन की स्थिरता को बनाए हुए हैं|

    राष्ट्रीय सुशासन के आईने में मैं बहुत कुछ देखता आया हूँ और मैं समझता हूँ कि अब हमारी बारी है कि हम अपना राष्ट्र धर्म निभाते अपना यथायोग्य योगदान दें और स्वच्छ भारत, समृद्ध भारत बनाएं|

    आपके निबंध से रोमांचित हो कुछ आकस्मिक विचार मन में कौंध गए हैं, उन्हें प्रस्तुत करता हूँ| वानप्रस्थ ले मैं स्वेच्छानुसार लोकसेवा में लगना चाहूँगा ताकि मैं इस दिशा में कुछ कार्य कर पाऊँ|

    गाँव, कस्बों, व छोटे बड़े सभी शहरों में संकुल बाज़ार वहां के निवासियों की रोज़मर्रा की आवश्यकताएं पूरी करते लाभ उठाते हैं तो उन्हें समाज की ओर अपने कर्तव्य को भी निभाना होगा|

    व्यक्तिगत व व्यावसायिक संस्था अथवा व्यापार द्वारा कमाई से महीने भर रोज़मर्रा की आवश्यकताओं व भविष्य के लिए बचत को छोड़ शेष राशि में एक भाग समाज को लौटाना चाहिए| क्यों न स्थानीय गैर सरकारी संस्था द्वारा मोहल्ले में ऐसे ऐसे उपक्रम किये जाएं जो समाज में मनमोहक वातावरण उत्पन्न कर स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देते हों|

    स्नानगृह, पाखाना, मूत्रालय चुनिन्दा सामाजिक व व्यावसायिक स्थान, विशेषकर उन स्थानों पर जहां नागरिकों का योगदान हो, पर उपलब्ध होने चाहियें|

    नहा धो, बालों में तेल कंघी कर स्वच्छ कपड़े पहने कोई भी भारतीय किसी दूसरे से भिन्न नहीं है और मंदिरों व पूजा-स्थलों पर उनका आवाहन समाज को सुदृढ़ बनाने में सहायक हो सकता है|

    भारत में सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा अधिक से अधिक सामाजिक लाभ लेने हेतु वेबसाइटस को प्रायः हिंदी व प्रांतीय भाषाओं में होना चाहिए| उपभोक्ता को भी भारतीय मूल की भाषाओं में बनी वेबसाइटस को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोगों द्वारा वहां आवागमन किसी भी वेबसाइट की गुणवत्ता को बढ़ाने में सहायक हो|

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      इंसान जी, वाह!
      आप की टिप्पणी का कल कल नाद वाला, प्रारंभ पढकर ही प्रफुल्लित हूँ मैं।
      आगे भी, आप ने समय देकर, भाषाओं के लिए स्पष्टता से जो कहा, उस पूरे कथन के, हर बिन्दू से सहमति व्यक्त करता हूँ।
      अभी आलेख पढा ही नहीं; पर आलेख पढने के पूर्व ही मैंने टिप्पणी पर टिप्पणी दे डाली।
      आप इसी प्रकार टिप्पणी देते रहिए।
      विशेष: होली की शुभकामनाएँ।
      यह होली भी उत्तर प्रदेश में रंगों की बौछार लेकर आई है।
      धन्यवाद।

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