लेखक परिचय

सुनील अमर

सुनील अमर

लगभग 20 साल तक कई पत्र-पत्रिकाओं में नौकरी करने के बाद पिछले कुछ वर्षों से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन| कृषि, शिक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा महिला सशक्तिकरण व राजनीतिक विश्लेषण जैसे विषयों से लगाव|लोकमत, राष्ट्रीय सहारा, हरिभूमि, स्वतंत्र वार्ता, इकोनोमिक टाईम्स,ट्रिब्यून,जनमोर्चा जैसे कई अख़बारों व पत्रिकाओं तथा दो फीचर एजेंसियों के लिए नियमित लेखन| दूरदर्शन और आकाशवाणी पर भी वार्ताएं प्रसारित|

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सुनील अमर

सयाने कह गये हैं- इस दुनिया में कुछ भी स्थाई नहीं, सब कच्चा है। सिर्फ वही ‘एक’ सच्चा है। फिर भी लोग नहीं मानते। बहुत से साधु-संत भी नहीं मानते, हमेशा आजमाने की कोशिश में लगे रहते हैं। किसी ने कह दिया कि आग में हाथ ड़ालने से जल जाता है तो क्या जरुरी है कि हाथ ड़ालकर देख ही लिया जाय? लेकिन बहुत से लोगों का दिल है कि मानता ही नहीं।

ज्ञानी लोग बताते हैं कि भगवा एक ऐसा रंग है जिसके बाद इस असार-संसार में फिर किसी और रंग की जरुरत ही नहीं रह जाती। भगवा, ज्वाला का प्रतीक है। उसको धारण करने का मतलब ही है कि आपने सांसारिक कमजोरियों, लिप्साओं और वासनाओं को संयम की आग में जलाकर नष्ट कर दिया है और जो कोई भी संसारी व्यक्ति आपके सानिध्य में रहेगा, आपसे दीक्षित होगा, उसका भी व्यामोह नष्ट हो जाएगा। पर, देखने में आता है कि प्राय: ऐसा होता नहीं। यह देव दुलर्भ है। मतलब देवता भी इससे विचलित होते रहे हैं। नारद-वारद को तो प्राय: ही ऐसी विचलन होती रहती थी। तो इसमें बाबा रामदेव का क्या दोष?

उपर जिन सयाने लोगों ने यह बताया है कि कुछ भी स्थायी नहीं, साजिशन उन्होंने यह नहीं बताया कि कम से कम कितनी देर तक यह टिकाऊ रहेगा, वरना बाबा धोखा न खाते। अब महाजनों की कही कोई बात 48 घंटा भी न टिके तो धोखा खाने के अलावा और हो ही क्या सकता है? देखने वाले दंग रह गये कि इस दौरान कितनी तेजी से रंग बदले! जिस बाबा का हवाई अड्डे पर रेड कार्पेट मार्का वेलकम किया गया, 5 स्टार होटल में आवभगत की गई उसी बाबा को 24 घंटे भी न बीतने पाये कि उन्हीं लोगों द्वारा यह सलूक! बाबा ने अपनी आदत के अनुसार सरकार से एडवांस में कोई गोपनीय सौदा कर ही लिया था तो काँग्रेस की पल्टी देखिए कि अखबारवालों के सामने उस चिठ्ठी को ही आऊट कर दिया!

बाबा भी कम नहीं। तप करने के लिए पुलिस से मोहलत ली थी लेकिन वहॉ जाने क्या-क्या करने लगे। कॉग्रेस अलग हैरान! उसकी किस्मत आजकल ऐसी ही चल रही है। अन्ना की काट के लिए जिसे मोहरा बनाती है वो रामदेव बन जाता है और जिसे लाट साहबी करने के लिए भेजती है, वो कामदेव बन जाता है! कॉग्रेस कब तक लाल-पीला स्वागत करती फोकट में। उसने बाबा से काबू में रहने को कहा तो बाबा के चेले कहने लगे कि बाबा तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। चेले क्या जाने बाबा की लीला कि बाबा की 8 फुट की म्यान महज दिखावे की है, तलवार तो उसमें दो फुट की भी नहीं है। खेल-खेल में शुरु हुआ कार्यक्रम कॉग्रेस को अपने गले में सॉप जैसा लिपटा दिखने लगा। बाबा के पल-पल रंग बदलने से आहत कॉग्रेस ने आखिर वही किया जो कोई भी दिग्भ्रमित कर सकता है। गले में पड़े रामदेव नामक सॉप को मॅूड़ी से पकड़ा और ले जाकर भाजपा के गले में डाल आई कि लो अब संभालो इसे।

जो लीला न करे वो भगवान कैसा? हमारे धर्मग्रंथों में भगवानों के जो मानक लिखे हैं, उसके अनुसार उनका लीला करना अपरिहार्य होता है। भगवान राम ने जनकपुर में लीला न की होती तो परशुराम उन पर फरसा ही चला बैठते। उनकी लीला देखकर वे संतुष्ट हो गये थे। भगवान आशाराम तो बाकायदा कृष्ण की वेशभूषा में स्त्रियों के साथ रासलीला रचाते है! उसी प्रकार भगवान रामदेव भी कुछ लीला करना चाह रहे थे। कभी किसी के कंधे पर चढ़ रहे थे, तो कभी महिलाओं के बीच में घुसे जा रहे थे। बेचारे ब्रह्मचारी आदमी! ख्याल आ गया होगा कि स्त्री न सही तो स्त्री का वस्त्र ही सही, सो किसी स्त्री का वस्त्र पहन लिया। हालॉकि पुलिस यह नहीं बताती कि वे महिलाओं का अधोवस्त्र भी पहने थे कि नहीं। पुलिस कभी भी पूरी बात नहीं बताती।

फिर पुलिस ही कब तक रंग न बदलती। वह तो स्वभाव से ही रंग में भंग करने को आतुर रहती है। थोड़ी देर पहले तक जो पुलिस जरखरीद गुलाम जैसी बनी हुई थी वह अचानक तांडव करने लगी। मुझे शक़ होता है कि पुलिसियों को इतनी ताकत कहीं योग से तो नहीं मिल गई? बहरहाल, पुलिस ने बाबा को बताया कि तप का मतलब यह नहीं होता कि तुम लिंग परिवर्तन करने लगो और अगर लिंग परिवर्तन की तुम्हारी इतनी ही इच्छा है तो चलो तुम्हें पहाड़ों में छोड़ दें। वहीं जो करना हो करो।

मुंशी प्रेमचंद ने अपनी प्रसिध्द कहानी ‘कफन’ के अंत में घीसू और माधव के बारे में लिखा है कि ‘ वे गाये और नाचे भी, ठुमके भी लगाये और भाव भी बताये। बाद में नशे की अधिकता के कारण सुध-बुध खोकर गिर पड़े।’ यही सब बाबा ने भी किया और गिर पड़े! वे पहले बाबा बने, फिर योगी बनकर योग सिखाने लगे। योग में भी उनकी रुचि नाखून रगड़कर सफेद बाल को काला करने और उँगलियों के कई दबाव बिंदु की मार्फत सेक्स जगाने जैसी समस्याओं में ज्यादा रही। बाबा ने इस बात का खासा प्रचार किया कि फलॉ उंगली में सेक्स जागृत करने का दबाव बिंदु होता है और इसीलिए शादी के एंगेजमेंट के समय उसी उँगली में ऍगूठी पहनी जाती है! (हमारे कई सुधी पाठकों को याद होगा, एक समय में स्वयंभू भगवान आचार्य रजनीश उर्फ ओशो भी ऐसा ही कुछ कहते थे। एक बार एक विदेशी पत्रकार ने उनसे पूछा कि भगवान्, ये महिलाऐं हाथ में चूड़ियां क्यों पहनती हैं, तो भगवान ने उत्तर दिया था – दीज आर बेंगल्स। दीज प्रोडयूस द साउन्ड ऑफ सेक्स। मतलब ये चूड़ियाँ हैं और ये सेक्सी ध्वनि पैदा करती हैं!) बाद में बाबा कारोबारी, व्यापारी और उद्योगपति भी बन गये। ये सब हुआ तो राजनीति में भी हाथ आजमाने की सोचने लगे। यहॉ तक तो गनीमत थी लेकिन बाबा को अचानक सत्ता की दलाली करने का भी शौक चढ़ा और रामदेव जैसे लोग शायद समझते हैं कि सत्ता किसी भैंसे की तरह है और अगर उसकी पूंछ पकड़ में आ गई तो मरोड़ कर भैंसे का काबू में कर ही लेंगें। वे काँग्रेस की पूंछ पकड़े तो, उसे मरोड़े भी लेकिन कॉग्रेस ने एक झटका देकर अपनी पूंछ छुड़ा ली। अब पूंछ छुटाया भैंसा कितना खतरनाक हो जाता है इसे तो कोई बाबा रामदेव से जाकर पूछे।

पॉच जून 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान पर आधी रात को सिर्फ रामदेव की धोती ही नहीं खुली उनके तमाम राज फाश हो गए! वे कितने बडे योगी हैं, वे कितना तप कर लेते हैं और वे जनता के लिए कितना संघर्ष कर सकते हैं, पुलिस को देखकर कितना ज्यादा डर सकते हैं, ये सब देश-दुनिया ने देखा। अब इधर बाबा के बारे में जो चंद लोग कटो-मरो की बातें कर उनकी रक्षा में लगे हैं, वे सब असल में उनके कारोबारी लोग हैं।

.बाबा रामदेव के उक्त प्रयत्नों से और चाहे कुछ हुआ या न हुआ हो, लेकिन कई नये तथ्य जरुर स्थापित हो गये। जैसे कि 1. भगवान से भी बड़ी सरकार होती है। 2. योग और तप से भी बड़ी देसी पुलिस होती है। 3. जिस नारी की छाईं पड़ने से भुजंग अन्धा हो जाता है, उसकी छाईं से हमारी पुलिस का रोवाँ भी नहीं टेढ़ा होता और वह ऐसी सैकड़ों छाइयों के बीच घुसकर अपना शिकार पकड़ सकती है, और 4 वक्त अगर बुरा हो तो अंजाम बुरा ही होगा क्योंकि कहा भी गया है कि – मनुज बली नहि होत है, समय होत बलवान, भीलन लूटी गोपिका, वहि अर्जुन, वहि बान!

इस रंग बदलती दुनिया में बेचारे बाबा रामदेव! क्या जानें कि यहाँ इन्सानों की नीयत ठीक नहीं। बाबा, निकला न करो तुम…………।

9 Responses to “इस रंग बदलती दुनिया में….स्वामी रामदेव !”

  1. वाचाल सहिंता से सम्पादित

    इन्सान को वहि बात बोलनी चाहिए जिसका उसे पता हो बिना जाने दुसरो को बताने पर खुद की ही लोक हसी होती हे लेखक सुनील अमर ने भगवा के बारे में बिना जाने बोलने पर अपनी कलम की भी लोक हसी करा ली परशु राम जी ने भगवा पहन कर लेखक जेसे शकिर्ण विचार वालो को इकीस बार इसी पर्थ्वी से हटाया अब जो एसे लोग पैदा हुए हे उने रामदेव भगवा पहन कर हटायेगे
    अपने सही लिखा भगवा ज्वाला का प्रतीक है अब आप पर ये भगवा ज्वालामुखी की तरह फटेगा आप अपनी पेंट या धोती संभल कर रखना और आपके पीछे अमर लगता है तो आप सदा के लिए अमर हो जाओगे आप अभी तो पीछे से अमर है बाद में आगे पीछे दोनों तरफ से अमर हो जाओगे
    सुनील अमर जिंदाबाद…………………..
    सुनील अमर अमर रहे………………………
    अब अमर दो बार आ गया क्या करे वैसे भी आप अमर है जब तक चाँद सितारे रहेंगे तब तक सुनील अमर आगे पीछे से अमर रहे
    सयाने कह गये हैं- इस दुनिया में कुछ भी स्थाई नहीं, सब कच्चा है। सिर्फ वही ‘एक’ सच्चा है। फिर भी
    सुनील अमर अमर रहे……………………..
    इस रंग बदलती दुनिया में बेचारे सुनील अमर क्या जानें कि यहाँ इन्सानों की नीयत ठीक नहीं है लेखक निकला न लिखो तुम ………………….

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  2. Ram narayan

    कलम शर्मा गयी है पर लेखक बेशर्मी का मोहताज बन बैठा

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    • सुनील अमर

      Sunil Amar journalist 09235728753

      बेशर्मी का मोहताज तो हूँ राम नारायण जी, क्योंकि सारी बेशर्मी तो आप जैसे लोगों ने ले रखी है! और हाँ, कलम बिलकुल नही शरमाई है, वो आगे फिर लिखेगी, चोरों और ड्रामेबाजों के खिलाफ.

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  3. sanjay

    वही कांग्रेस जिस के नेहरु जी अंग्रेज संस्कृति के समर्थक लगते है जिनके karan आज पुरे देस को अंग्रेजी ka बोझ धोना पद रहा है देश दो भाग हो गया इन्होने कभी ved puran को कभी नहीं मन होगा क्योकि ye खून से भारतीय पर चाल से अंग्रेज है इनका ही पैसा है विदेश में ,

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    • सुनील अमर

      Sunil Amar journalist 09235728753

      संजय जी, इस देश में जिस किसी के भी पास इफरात पैसा है, उन सबका धन विदेशों में जमा है. वे किसी भी पार्टी के नेता हों, अधिकारी हों. उद्योगपति हों या अपराधी हों. वही मुजरिम, वही मुंसिफ ! कौन लायेगा काला धन वापस और क्यों? फिर भी हमें-आपको-सबको आवाज़ उठाते रहना चाहए.

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  4. Raj

    लगता है आप को कला धन लेन मैं कोइ दिलचपी नहीं है जो इस मुद्दे जिस महँ मनुष्य ने इस कम को उठाया है आप उस पर ही ऊँगली उठा रहे हो सायद आप को भारत के विकास मैं कोइ दिलचस्पी नहीं है सायद आप कांग्रेसी मानसिकता की बीमारी लग गयी है

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    • सुनील अमर

      Sunil Amar journalist 09235728753

      राज जी , मुझे चोर को चोर कहने की बीमारी लग गयी है. आप उसे कांग्रेसी, भाजपाई या वामपंथी कुछ भी नाम दे सकते हैं.

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  5. Sunidhi Sharma

    वाह ! बहुत सुंदर लेख!! पढ़कर मजा आ गया. क्या मीमांसा की है सुनील जी ने !

    पॉच जून 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान पर आधी रात को सिर्फ रामदेव की धोती ही नहीं खुली उनके तमाम राज फाश हो गए! वे कितने बडे योगी हैं, वे कितना तप कर लेते हैं और वे जनता के लिए कितना संघर्ष कर सकते हैं, पुलिस को देखकर कितना ज्यादा डर सकते हैं, ये सब देश-दुनिया ने देखा। अब इधर बाबा के बारे में जो चंद लोग कटो-मरो की बातें कर उनकी रक्षा में लगे हैं, वे सब असल में उनके कारोबारी लोग हैं।”

    अच्छा लगा . बधाई.

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