लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

Posted On by &filed under राजनीति.


गंगानन्‍द झा

“We learn from history that we do not learn from history.”

नब्बे के दशक में भारतीय राजनीतिक अंगरेजी पत्रकारिता में एक जुमला उभड़ा था, “टीना फैक्टर”(TINA_ There is no alternative)—–कोई विकल्प नहीं है। आज के परिप्रेक्ष्य में यह विद्रूतात्मक रूप से प्रासंगिक हो गया है। डॉक्टर मनमोहन सिंह इसी टीना फैक्टर के कारण आउटसोर्सिंग के जरिए देश के प्रधानमंत्री बने। जबकि सोनिया गाँधी त्यागी और इसलिए महान हो गईं। इस सवाल पर बहस हो सकती है कि क्या सोनिया का यह फैसला दायित्वग्रहण करने से बचना नहीं कहा जाएगा। यह बात तय थी कि अगर उन्होंने आउटसोर्सिंग नहीं की होती तो सुषमा स्वराज और उमा भारती का एजेण्डा रंग लाता। पर जिम्मेदारी का अर्थ ही तो कठिन स्थितियों से जूझना हुआ करता है। सोनिया गाँधी ने जनादेश की आउटसोर्सिंकर टीना फैक्टर के समाधान का सहज विकल्प अपनाया। इसके अलावे ‘त्यागी’ का लेबल लगने से इस देश में सहजता से उपलब्ध स्वीकार्यता से विभूषित हो गईं। इस मानसिकता को अरविन्द केजरीवाल, प्रशान्त भूषण,किरण बेदी तथा उनके सहयोगी की स्वयंघोषित सिविल सोसायटी अच्छी तरह जानती है। तभी उन्होंने अण्णा हजारे को अपने अभियान का अगुआ बनाया। यह भी एक तरह की आउटसोर्सिंग ही कही जाएगी। बाबा रामदेव का अपने अभियान के अपहरण से आशंकित होना लाजिमी था।

सन 1974 ई. में एक त्यागी श्री जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन को अपनी अगुवाई दी थी। पर तबकी सरकार ने उस आन्दोलन को सम्माननीयता नहीं दी थी। उसे अपने इकबाल का, जनादेश का सम्मान करना था। लगता है, उस रवैए की परिणति का खयाल कर इस बार सरकार ने चुनौती का सामना न कर उसे सम्मान देने का कौशल किया। अपनी औकात का, अपने इकबाल का और अपनी सीमाओं का खयाल नहीं किया। आउटसोर्सिंग से बनी यह सरकार समस्या से निपटने का कठिन विकल्प लेने में असमर्थ है.। इसने हमेशा विरोध के सामने शॉर्टकट अपनाया है जो समाधान नहीं हो सकता।

अण्णा के द्वारा पुनः पुनः अनशन की धमकी ऋषि कौशिक की याद दिलाती है। महाभारत में चर्चा है। वे पेड़ के नीचे तपस्या में लीन थे। तभी पेड़ की डाल पर से किसी पक्षी ने उनके ऊपर बिट कर दिया। ऋषि ने उधर देखा तो पक्षी भस्म हो गया। ऋषि समझ गए कि उनको सिद्धि मिल गई। फिर वे एक गृहस्थ के दरवाजे पर भिक्षाटन करने गए और गुहिणी के देर कर आने पर क्रुद्ध हो गए थे।

देश के इतिहास में पहली बार प्रधान मंत्री लोकसभा का सदस्य नहीं है। सोनिया गाँधी के आउटसोर्सिंग के फैसले को त्याग बताया गया। जबकि यह फैसला विरोध को कुन्द करने के लिए लिया गया था। सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का मुद्दा निष्प्राण हो गया। सत्ता से दूर रहने के फैसलों को हम त्याग की संज्ञा देकर गौरवान्वित करते हैं , इसे दायित्व ग्रहण करने से बचना नहीं मानते। जब त्यागी लोग अपने तथाकथित त्याग की कीमत अपना पावना मानते हैं।

4 Responses to “इतिहास की सुनो”

  1. bipin kumar sinha

    mera najriya yah hai ki yadi vyakti yogya ho to out sourcing galat nahi hai behtar kam ke bal par manmohan singh dubara satta me aye vah yon hi nahi hai.han yah kah sakte hai ki unme rajneetik chaturai nahi hai to kya rajneetik chaturai hi ekmatra hi map dand rah gya hai apne ko behtareen sabit karne ko.ajad bharat me ye pahle professional prime minister hai jinhone lok lubhavane andaj se jyada vastvikta ko tarjih di halanki unhone bhi dusare pradhan mantriyon ki tarah kuchh lok lubhavani bayan diye the to usame ve safal nahi rahe .varna unhe vipaksh bhi imandar prime minister kahne ko majboor nahi hota.sabne apni apni raj netik pariyan khel li hai aur sabhi kathani aur karni me bhed nahi mita paye.aaj ka bharat yuva bharat hai vah is bat ko achhi tarah se samjhata hai islye chikanichupari bate use jyada prabhavit nahi karti vah to apane desh ko khushhal tarraki unchaiyon par chadh jana chahta hai choonki aur koi isase behtar vikalp dene me abhitak kamyab nahi rahe is liye isi ko lekar chalan chahiye.rajneetik uthapatak se desh ka koi bhala nahi hota hai sirf rajneetigyo kihi chandi hoti hai aur desh ka vakt bhi kharab hota hai isme vikas ke mudde pichhe chhoot jate hai yojanye dhimi gati se aage badhati hai hamare desh ne 1967 ka jamana bhi dekha hai jab rajneetik uthalputhal kivajah se vikas ke kamo me ham pichhadh gaye the koi bhi bekar sa mudda vipaksh ko ek mouka de deta tha sarkar ko asthir karane ka vahivipaksh jab khud satta me aya to use bhi dinme tare dikhai dene lage kyon ki vipakshki bhoomika me ab congress thi to vah kyon yah mauka chhodahti sanchhep me main yah kahana chahta hoon vikas desh ka sarvappratham mudda hona chahiye isme rajneetik daon pench nahi hona chahiye.desh ke kisi bhibhag me tarraki ki yojana karyanvit hoti hai to yah hamare desh ki hi tarraki hai lekin yah bhi dhyn rakhana chahiye ki yah tarraki asantulit na ho vikas kalabh sabko milana chahiye bipin kumar sinha

    Reply
  2. Raj

    लेख अच्छा है इस में बहुत सी बातें सामान्य लोगो के समाज से बहार है , रही सोनिया की त्याग की बात क्या सोनिये जैसी वेदेशी औरतें त्याग कर सकती है?

    Reply
  3. S B Jha

    आजाद भारत को एक रेनेशन की जरुरत हो रही है | सन ७४ में जय प्रकाश नारायण जी के आन्दोलन को बड़ी ही विद्रूपता के साथ कुचला गया | अगर आज भी हम मूक दर्शक बने रहे तो शायद वास्तविक आज़ादी को अगली कई पीढियां तरश जाएँगी | एक तरह से टीना फैक्टर की आड़ में कहीं व्यक्ति विशेष को त्यागी बनाते हुए महान बनाने की तैयारी तो नहीं की जा रही है ? हमें सावधान हो जाना चाहिए | इस कुतंत्र के कुचक्र में ‘लोक’ की मर्यादा गौण होती जा रही है, अतः एक स्वस्थ लोकतंत्र को विभिन्न आंदोलनों के सूत्रपात से पुनर्परिभाषित की जाती रहनी चाहिए | धन्यवाद |

    Reply
  4. naina pandey

    लेख बहुत अच्छा है, लेकिन भारत में जो जनता सरकार banati है उसे outsorsing या tina factor के विषय में कोई जानकारी नहीं है , जो जानते है वे vote के लिए बहुत कम जाते है, इसलिए लोकतंत्र में लोक हारता रहता है aur तंत्र जीतता रहता है.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *