पुण्यतिथि, 4 जुलाई पर विशेष:
डॉ घनश्याम बादल
4 जुलाई भारतीय इतिहास का वह दिन है, जब केवल एक संन्यासी का देहावसान नहीं हुआ, बल्कि एक ऐसे युगपुरुष ने अपने नश्वर शरीर का त्याग किया, जिसने भारत की आत्मा को नई चेतना, नया आत्मविश्वास और नई दिशा प्रदान की।
मात्र उनतालीस वर्ष की अल्पायु में संसार से विदा लेने वाले स्वामी विवेकानंद ने जितना कार्य किया, उतना अनेक लोग लंबा जीवन जीकर भी नहीं कर पाते। उनकी पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों, उनके व्यक्तित्व और उनके अधूरे स्वप्नों का आत्ममंथन करने का दिन भी है।
12 जनवरी 1863 को कोलकाता में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में जन्मे इस विलक्षण बालक में बचपन से ही अद्भुत जिज्ञासा, निर्भीकता और सत्य की खोज का भाव था। वे केवल धार्मिक प
हीं, बल्कि दर्शन, विज्ञान, इतिहास, साहित्य और संगीत के गंभीर अध्येता भी थे। उनका प्रश्न था—”क्या आपने ईश्वर को देखा है?” इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर उन्हें केवल श्री रामकृष्ण परमहंस से मिला। यहीं से नरेंद्रनाथ का जीवन बदल गया और वे स्वामी विवेकानंद बने।
विवेकानंद की सबसे बड़ी विशेषता थी धर्म को कर्म से जोड़ना। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भूखे व्यक्ति के लिए रोटी ही सबसे बड़ा धर्म है। वे मंदिरों तक सीमित ईश्वर के बजाय मनुष्य की सेवा में ईश्वर का दर्शन करते थे।
उनका संदेश,”दरिद्र नारायण की सेवा ही सच्ची पूजा है” आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने संन्यास को पलायन नहीं, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम बनाया।
1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में उनका “अमेरिका की बहनों और भाइयों” से आरंभ हुआ संबोधन केवल भाषण नहीं,भारत की सांस्कृतिक आत्मा की उद्घोषणा थी। कुछ ही मिनटों में उन्होंने पश्चिमी जगत को भारतीय दर्शन की विशालता, सहिष्णुता और सार्वभौमिकता से परिचित करा दिया। उस दिन एक गुलाम भारत का संन्यासी विश्व मंच पर आत्मविश्वास के साथ खड़ा था और पूरी दुनिया उसकी वाणी सुन रही थी।। यह भारत के आत्मगौरव का पुनर्जागरण था।
विवेकानंद को केवल शिकागो तक सीमित कर देना उनके विराट व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। उनके जीवन का सबसे बड़ा पक्ष भारत-भ्रमण है। उन्होंने राजमहलों से लेकर झोपड़ियों तक भारत को देखा। वे केवल हिमालय की गुफाओं में ध्यान नहीं करते रहे, बल्कि किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और उपेक्षित वर्गों की पीड़ा को निकट से अनुभव किया। कन्याकुमारी की शिला पर बैठकर उन्होंने जिस भारत का स्वप्न देखा, वह केवल आध्यात्मिक भारत नहीं था, बल्कि शिक्षित, आत्मनिर्भर, समरस और शक्तिशाली भारत था।
बहुत कम लोग जानते हैं कि वे आधुनिक विज्ञान के समर्थक थे। उनका मानना था कि विज्ञान और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने युवाओं से अंधविश्वास छोड़कर विवेक, तर्क और अनुभव के आधार पर सत्य स्वीकार करने का आग्रह किया। वे कहते थे कि यदि किसी बात को बुद्धि स्वीकार नहीं करती, तो उसे केवल परंपरा के नाम पर मत मानो। यह दृष्टिकोण उन्हें रूढ़िवादी धार्मिक नेताओं से अलग करता है।
स्वामी विवेकानंद स्त्री-शिक्षा और महिला सशक्तीकरण के भी प्रबल समर्थक थे। उनका स्पष्ट मत था कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति उसकी महिलाओं की स्थिति से मापी जा सकती है। वे भारतीय नारी में अपार शक्ति देखते थे और चाहते थे कि उसे शिक्षा, सम्मान और अवसर मिले। उन्होंने कहा था कि पक्षी एक पंख से उड़ नहीं सकता; समाज भी स्त्री और पुरुष दोनों की समान भागीदारी के बिना आगे नहीं बढ़ सकता।
जातिगत भेदभाव के प्रति उनका दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट था। उन्होंने जन्म के आधार पर ऊँच-नीच का विरोध किया और मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार उसके चरित्र, कर्म और ज्ञान को माना।
वे सामाजिक समरसता के पक्षधर थे। उनके लिए राष्ट्र निर्माण का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना भी था।
विवेकानंद के व्यक्तित्व का एक कम चर्चित पक्ष उनका अद्भुत संगठन कौशल था। उन्होंने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर सेवा, शिक्षा, चिकित्सा और राहत कार्यों की ऐसी परंपरा विकसित की, जो आज भी देश-विदेश में निरंतर चल रही है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिकता का सर्वोच्च रूप मानव सेवा है।
युवाओं के प्रति उनका विश्वास असाधारण था। उनका प्रसिद्ध आह्वान “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको”आज भी करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे युवाओं में केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि चरित्र, अनुशासन, आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति देखना चाहते थे। उनका कहना था कि हमें ऐसे मनुष्य चाहिए जिनकी मांसपेशियाँ लोहे की हों, स्नायु इस्पात के हों और जिनके भीतर अटूट आत्मविश्वास हो। उनके अनुसार राष्ट्र का भविष्य पुस्तकीय ज्ञान से नहीं, बल्कि चरित्रवान नागरिकों से निर्मित होता है।
आज जब समाज धार्मिक कट्टरता, सामाजिक विभाजन, उपभोक्तावाद, मानसिक तनाव, बेरोज़गारी और नैतिक संकट जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब विवेकानंद का दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
उन्होंने धर्म को जोड़ने का माध्यम बनाया, आत्मविश्वास का संदेश दिया, जबकि आज का युवा अक्सर हीनभावना और अवसाद से संघर्ष कर रहा है। उन्होंने सेवा को साधना माना, जबकि आज सफलता का अर्थ प्रायः केवल आर्थिक उपलब्धि तक सीमित होता जा रहा है। उन्होंने भारतीय संस्कृति पर गर्व करना सिखाया, परंतु साथ ही संकीर्णता से दूर रहकर विश्वबंधुत्व का मार्ग भी दिखाया।
स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि पर सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी उनके विचारों को शिक्षा, राजनीति, समाज, प्रशासन और व्यक्तिगत जीवन में उतारने का प्रयास करें। भारत यदि आत्मविश्वासी, ज्ञानवान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त, सामाजिक रूप से समरस और नैतिक रूप से सशक्त राष्ट्र बनना चाहता है, तो विवेकानंद का मार्गदर्शन आज भी उतना ही उपयोगी है जितना एक शताब्दी पहले था।
वास्तव में, स्वामी विवेकानंद का शरीर 4 जुलाई 1902 को पंचतत्त्व में विलीन हुआ, पर उनका विचार आज भी जीवित है।
वे वर्तमान के पथप्रदर्शक और भविष्य के प्रेरणास्रोत हैं। जब तक भारत अपनी आत्मा की खोज करता रहेगा, जब तक युवा अपने भीतर की शक्ति को पहचानने का प्रयास करता रहेगा और जब तक मानवता सेवा, समरसता तथा सत्य के मार्ग पर चलने की आकांक्षा रखेगी, तब तक स्वामी विवेकानंद का प्रकाश कभी मंद नहीं नहीं होगा।
डॉ घनश्याम बादल