लेख स्‍वास्‍थ्‍य-योग

इलाज की राह में उम्मीद और इम्तिहान 

कुमार कृष्णन

स्वास्थ्य व्यवस्था किसी भी राज्य के सुशासन की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होती है। सड़क, बिजली और पानी के साथ यदि लोगों को समय पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो, तो विकास का दावा अधूरा रह जाता है। बिहार लंबे समय से कमजोर स्वास्थ्य ढांचे, विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी, संसाधनों के अभाव और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से जूझता रहा है। ऐसे समय में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार द्वारा स्वास्थ्य व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए उठाए गए कदम इस क्षेत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत देते हैं।

स्वास्थ्य मंत्री ने विभाग में भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए लगभग 15 हजार सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में डिजिटल निगरानी प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया है। सभी सरकारी अस्पतालों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं ताकि डॉक्टरों और कर्मचारियों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित हो सके। वर्षों से सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और लापरवाही आम शिकायत रही है। यदि डिजिटल निगरानी प्रभावी ढंग से लागू होती है तो यह केवल अनुशासन स्थापित नहीं करेगी, बल्कि सरकारी अस्पतालों के प्रति जनता का विश्वास भी बढ़ाएगी।

स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही लाने के लिए केवल निगरानी पर्याप्त नहीं होती। इसके साथ प्रशासनिक इच्छाशक्ति और पारदर्शी व्यवस्था भी आवश्यक है। डिजिटल रिकॉर्ड, ऑनलाइन मॉनिटरिंग और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण जैसे कदम इसी दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं। इससे मरीजों के इलाज का रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा, दवा वितरण में पारदर्शिता आएगी तथा अधिकारियों के लिए अस्पतालों की वास्तविक स्थिति पर नजर रखना आसान होगा।

बिहार में सड़क दुर्घटनाओं और अन्य गंभीर हादसों में समय पर उपचार का अभाव भी लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। इस समस्या को देखते हुए सरकार ने 11 नए ट्रॉमा सेंटर स्थापित करने का निर्णय लिया है। चिकित्सा विज्ञान में “गोल्डन ऑवर” का विशेष महत्व माना जाता है। दुर्घटना के बाद पहले एक घंटे के भीतर उचित इलाज मिलने पर हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है। यदि ये ट्रॉमा सेंटर आधुनिक सुविधाओं और प्रशिक्षित विशेषज्ञों से लैस होंगे तो निश्चित रूप से मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।

इसी प्रकार आयुष्मान भारत योजना से वंचित रह गए पात्र लोगों के लिए विशेष अभियान चलाकर कैशलेस इलाज उपलब्ध कराने की पहल भी सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। गरीब परिवारों के लिए बीमारी अक्सर आर्थिक संकट बन जाती है। यदि अधिक से अधिक लोगों को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलेगा तो निजी अस्पतालों में इलाज का आर्थिक बोझ काफी कम होगा।

लेकिन इन सकारात्मक प्रयासों के बीच बिहार की सबसे बड़ी चुनौती विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, जबकि बिहार इस मानक से काफी पीछे है। यही कारण है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं और अंततः अधिकांश लोगों को महंगे निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है।

स्थिति केवल डॉक्टरों की संख्या तक सीमित नहीं है। सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ, एनेस्थेटिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ चिकित्सकों के हजारों पद वर्षों से रिक्त हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां कई स्थानों पर नियमित डॉक्टर तक उपलब्ध नहीं हैं। इससे प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं।

हाल ही में नियुक्त किए गए 175 विशेषज्ञ एवं सामान्य चिकित्सा पदाधिकारियों द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर योगदान नहीं देना स्वास्थ्य विभाग के लिए नई चुनौती बन गया है। सरकार ने ऐसे चिकित्सकों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं। यह आवश्यक भी है, क्योंकि नियुक्ति प्रक्रिया में वर्षों का समय और सार्वजनिक संसाधन खर्च होते हैं। यदि चयनित डॉक्टर सेवा ही नहीं दें, तो इसका सीधा नुकसान गरीब मरीजों को उठाना पड़ता है।

स्वास्थ्य व्यवस्था की एक और गंभीर समस्या बुनियादी चिकित्सा उपकरणों का अनुपयोगी होना है। अनेक जिला अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड मशीनें, एक्स-रे मशीनें और अन्य जांच उपकरण खराब पड़े रहते हैं। कई बार डॉक्टर उपलब्ध होते हैं, लेकिन मशीनें नहीं चलतीं; और कई स्थानों पर मशीनें हैं, पर उन्हें संचालित करने वाले विशेषज्ञ नहीं हैं। ऐसी स्थिति में मरीजों को निजी जांच केंद्रों पर निर्भर होना पड़ता है, जिससे इलाज का खर्च कई गुना बढ़ जाता है।

सरकार द्वारा सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने का निर्णय भी व्यापक बहस का विषय बना हुआ है। इस निर्णय का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है ताकि मरीजों को सरकारी संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण सेवा मिल सके हालांकि इस व्यवस्था को सफल बनाने के लिए सरकार को डॉक्टरों की कार्यस्थितियों, आवास, सुरक्षा, पदोन्नति और प्रोत्साहन संबंधी मुद्दों पर भी समान गंभीरता से काम करना होगा। केवल प्रतिबंध लगाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे, जब तक कार्य वातावरण भी अनुकूल न हो।

ग्रामीण बिहार में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि लोग मजबूरी में झोलाछाप चिकित्सकों के पास पहुंच जाते हैं। गलत इलाज, अनियंत्रित दवाओं का प्रयोग और समय पर रेफरल नहीं मिलने के कारण अनेक मामलों में मरीजों की जान तक चली जाती है। यह केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।

सरकार ने विदेश से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर लौटे 365 नए डॉक्टरों को विभिन्न अस्पतालों में इंटर्न के रूप में तैनात किया है। यह स्वागतयोग्य पहल है, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रशिक्षित चिकित्सक लंबे समय तक बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े रहें। इसके लिए बेहतर सेवा शर्तें, आधुनिक अस्पताल, शोध के अवसर और सम्मानजनक कार्य वातावरण आवश्यक होंगे।

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था आज एक संक्रमणकाल से गुजर रही है। एक ओर डिजिटल निगरानी, ट्रॉमा सेंटर, आयुष्मान योजना का विस्तार और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे सुधारात्मक कदम हैं; दूसरी ओर विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी, रिक्त पद, खराब उपकरण और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां हैं। स्पष्ट है कि केवल भवन निर्माण या मशीनों की खरीद से स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं बदलती। इसके लिए मानव संसाधन, तकनीक, प्रशासन और जनविश्वास—इन चारों स्तंभों को समान रूप से मजबूत करना होगा।

यदि सरकार भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, डॉक्टरों की नियमित नियुक्ति, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार और जवाबदेह प्रशासन सुनिश्चित करने में सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था देश के लिए एक सकारात्मक उदाहरण बन सकती है। लेकिन यदि डॉक्टरों की कमी, रिक्त पदों और बुनियादी सुविधाओं की समस्याओं का समय पर समाधान नहीं हुआ, तो डिजिटल निगरानी जैसे सुधार भी अपने अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे।

स्वास्थ्य केवल उपचार का विषय नहीं बल्कि मानव गरिमा का अधिकार है। बिहार के सामने चुनौती बड़ी है लेकिन अवसर उससे भी बड़ा। आज उठाए जा रहे निर्णय आने वाले वर्षों में तय करेंगे कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था वास्तव में जनकल्याण का मजबूत आधार बनती है या सुधारों की घोषणा तक सीमित रह जाती है।( युवराज फीचर्स )   

कुमार कृष्णन