मेरी परछाईं !

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लगता है यूँ कभी मेरी परिमूढ़ परछाईं मेरी  सतही  ज़िन्दगी  के  साथ  रह  कर अब बहुत तंग आ चुकी है।   अनगिन प्रश्न-मुद्राएँ मेरी सिकुड़ कर, सिमट कर पल-पल मेरी परछाईं को आकार देती किसी न किसी बहाने कब से उसको अपने कुहरीले फैलाव में बंदी किए रहती हैं जिसके धुँधलके में वह अब अपना अस्तित्व… Read more »