व्यंग्य
हाँ, मैं छोटे दुकानदार के रूप में कॉकरोच हूँ
/ by डॉ. शैलेश शुक्ला
री दुकान कोई व्यापारिक साम्राज्य नहीं, रोजमर्रा की साँस लेने की मशीन है। यहाँ साबुन भी बिकता है, बिस्कुट भी, बच्चों की टॉफी भी और मेरी नींद भी। ग्राहक आते हैं, सामान लेते हैं, मुस्कुराते हैं, चले जाते हैं। लेकिन उनके जाने के बाद जो बचता है, वह है बिजली का बिल, जीएसटी का डर, बाजार का दबाव और ऑनलाइन बिक्री का भूत
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