समाज शहर और शहरी होने की दौड़ में गाँव और ग्रामीण : कितना सही, कितना गलत May 2, 2026 / May 2, 2026 by डॉ. शैलेश शुक्ला | Leave a Comment जब हम किसी व्यक्ति के जीवन का मूल्यांकन इस आधार पर करने लगते हैं कि वह शहर में रहता है या गाँव में, कि वह अंग्रेज़ी बोलता है या भोजपुरी, कि वह सूट पहनता है या धोती — तो हम दरअसल उस व्यक्ति की मनुष्यता को एक सांस्कृतिक पदानुक्रम की सीढ़ियों पर तोलने की कोशिश कर रहे होते हैं। और इस तोल में, अनिवार्य रूप से, गाँव और ग्रामीण हमेशा नीचे पाए जाते हैं — कम विकसित, कम आधुनिक, कम सभ्य। Read more » शहर और शहरी होने की दौड़ में गाँव और ग्रामीण