डॉ. शैलेश शुक्ला
आज के भारत में एक विचित्र और विरोधाभासी दृश्य सामने आता है जब हम किसी भी छोटे कस्बे या मध्यम आकार के शहर की सड़कों पर निकलते हैं। एक तरफ चौड़ी होती सड़कें हैं, बहुमंजिला इमारतें हैं, शॉपिंग मॉल हैं और स्मार्टफोन की चमकती स्क्रीनें हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं सड़कों पर चलते हुए वे लोग भी मिल जाते हैं जो महज कुछ वर्ष पहले तक किसी दूर-दराज़ के गाँव में रहते थे, खेत जोतते थे, पेड़ों की छाँव में बैठकर हुक्का पीते थे और रात को खुले आसमान तले सोते थे। आज वे शहर में हैं — या कम से कम शहर की परिधि में — और उनकी भाषा, उनका पहनावा, उनके सपने, यहाँ तक कि उनके खाने की आदतें भी बदल रही हैं। यह परिवर्तन न तो पूरी तरह स्वेच्छा से हुआ है और न ही पूरी तरह मजबूरी में। यह एक जटिल, बहुआयामी और कभी-कभी दर्दनाक रूप से द्वंद्वात्मक प्रक्रिया है जिसे हम ‘शहरीकरण’ का सरल नाम देकर आगे बढ़ जाते हैं जबकि इसके भीतर एक पूरी सभ्यता का टूटना और बनना एक साथ चल रहा होता है।
यह प्रश्न कि शहर और शहरी होने की दौड़ में गाँव और ग्रामीणों का क्या हो रहा है — यह प्रश्न केवल समाजशास्त्रीय नहीं है, यह गहरे अर्थों में नैतिक और दार्शनिक भी है। जब हम किसी व्यक्ति के जीवन का मूल्यांकन इस आधार पर करने लगते हैं कि वह शहर में रहता है या गाँव में, कि वह अंग्रेज़ी बोलता है या भोजपुरी, कि वह सूट पहनता है या धोती — तो हम दरअसल उस व्यक्ति की मनुष्यता को एक सांस्कृतिक पदानुक्रम की सीढ़ियों पर तोलने की कोशिश कर रहे होते हैं। और इस तोल में, अनिवार्य रूप से, गाँव और ग्रामीण हमेशा नीचे पाए जाते हैं — कम विकसित, कम आधुनिक, कम सभ्य। यह धारणा न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि वर्तमान में भी इसके परिणाम अत्यंत विनाशकारी हैं।
भारत के गाँव महज भूगोल की एक इकाई नहीं हैं। वे एक जीवन-दर्शन हैं, एक ज्ञान-परंपरा हैं, एक पारिस्थितिकी तंत्र हैं। सदियों से गाँव के किसान ने मिट्टी को पढ़ा है, मौसम को समझा है, बीज को जाना है। उसने वह ज्ञान अर्जित किया है जो किसी विश्वविद्यालय की पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलता। एक अनुभवी किसान जब कहता है कि “इस साल बादल देर से आएंगे” तो वह केवल अंदाज़ा नहीं लगा रहा होता — वह दशकों के अनुभव से बनी एक समझ को व्यक्त कर रहा होता है जिसे पारंपरिक पारिस्थितिकीय ज्ञान कहते हैं। लेकिन शहरीकरण की इस दौड़ में इस ज्ञान को न केवल उपेक्षित किया जा रहा है, बल्कि उसे पिछड़ेपन की निशानी के रूप में देखा जा रहा है। जो व्यक्ति मोबाइल से मौसम की जानकारी लेता है उसे ‘आधुनिक’ कहा जाता है और जो पीपल के पत्तों की गति देखकर हवा का अंदाज़ लगाता है उसे ‘अनपढ़’ कहा जाता है — यह विडंबना हमारी सामूहिक बौद्धिक दरिद्रता का प्रमाण है।
इस दौड़ का सबसे तात्कालिक और दृश्यमान आयाम है — पलायन। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों के लाखों-करोड़ों ग्रामीण पिछले दो-तीन दशकों में मुंबई, दिल्ली, सूरत, पुणे, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे महानगरों की ओर खिंचे हैं। यह पलायन दो कारणों से होता है — धकेलने वाले कारण और खींचने वाले कारण। गाँव धकेलते हैं क्योंकि वहाँ रोज़गार नहीं है, सिंचाई नहीं है, अस्पताल नहीं है, बिजली नहीं है, स्कूल में शिक्षक नहीं हैं। शहर खींचते हैं क्योंकि वहाँ मज़दूरी मिलती है, चाहे दयनीय ही सही। लेकिन इस पूरे समीकरण में एक बड़ा प्रश्न यह है कि हम समस्या का समाधान ढूँढ रहे हैं या उसे स्थानांतरित कर रहे हैं? जब एक किसान अपना गाँव छोड़कर शहर की किसी झुग्गी-बस्ती में आकर बस जाता है, तो क्या उसकी समस्या सुलझ गई? वह जिस गरीबी से भागा था, वह शहर में उसका पीछा करती है — बस उसका रूप बदल जाता है। खुले खेत की जगह बंद फ़ैक्टरी आ जाती है, ताज़ी हवा की जगह प्रदूषण आ जाता है, सामुदायिक जीवन की जगह अकेलापन आ जाता है।
शहरी जीवनशैली की जो छवि हमारे मन में बनाई गई है — और यह छवि काफी हद तक मीडिया, विज्ञापन और लोकप्रिय संस्कृति ने बनाई है — वह एक आभासी यथार्थ है। टेलीविज़न पर दिखने वाले शहरी परिवार बड़े-बड़े फ्लैटों में रहते हैं, गाड़ी से दफ़्तर जाते हैं, रेस्टोरेंट में खाना खाते हैं और विदेश घूमने जाते हैं। यह छवि उस भारत की नहीं है जो वास्तव में शहरों में रहता है। भारत के शहरों की एक बड़ी आबादी झुग्गियों में, किराए के छोटे-छोटे कमरों में और निर्माण स्थलों के किनारे तिरपाल की छत के नीचे रहती है। उनके लिए शहर न तो स्वर्ग है और न ही वे जिस जीवनशैली का सपना लेकर आए थे, उसका एक अंश भी उन्हें मिला है। फिर भी वे वापस नहीं जाते — क्योंकि गाँव में जो कुछ छोड़ आए हैं, वह इससे भी बदतर है। यह एक दुखद वास्तविकता है जिसे स्वीकार करने में हम हिचकिचाते हैं।
लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक और पहलू भी है जिसे नज़रअंदाज़ करना अनुचित होगा। शहरीकरण ने, अपनी तमाम कमियों के बावजूद, कुछ ऐसे अवसर भी प्रदान किए हैं जो पहले कभी संभव नहीं थे। एक गरीब परिवार का बेटा जो गाँव में गरीबी और अभाव की दीवारों से घिरा हुआ था, शहर में आकर कम से कम कुछ अवसरों का लाभ उठाकर एक नई पहचान बना सकता है। एक ऐसी लड़की जिसे गाँव में पढ़ाई से रोका जाता, शहर में आकर पढ़ सकती है, काम कर सकती है, अपनी शर्तों पर जी सकती है। एक ऐसा कारीगर जिसका हुनर गाँव में चार लोगों तक सीमित था, शहर में आकर हज़ारों ग्राहक पा सकता है। यह सच है। इसे नकारना रूमानीवाद होगा। गाँव कोई स्वर्ग नहीं था — वहाँ जाति-भेद था, स्त्री-उत्पीड़न था, अंधविश्वास था, संसाधनों पर कुछ लोगों का एकाधिकार था। शहर ने कम से कम इन बंधनों को कुछ हद तक ढीला किया है।
तो फिर प्रश्न यह उठता है कि आखिर हम किस दिशा में जाना चाहते हैं? क्या हम एक ऐसी प्रगति चाहते हैं जो गाँव को मिटाकर शहर बनाए? या एक ऐसी प्रगति जो गाँव को जीवंत रखते हुए उसे बेहतर बनाए? क्या ये दोनों विकल्प परस्पर विरोधी हैं, या इन्हें साथ लाया जा सकता है? आज की नीति-निर्माण प्रक्रिया में, दुर्भाग्य से, पहले विकल्प को ही वास्तविक प्रगति माना जाता है। ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की बात होती है, ‘स्मार्ट विलेज’ की नहीं। बजट शहरी बुनियादी ढाँचे के लिए मिलता है, ग्रामीण बुनियादी ढाँचे के लिए सीमित आवंटन होता है। कृषि अनुसंधान के लिए जितना निवेश होना चाहिए, उसका एक अंश भी नहीं होता। यह एक नीतिगत पूर्वाग्रह है जिसने दशकों से ग्रामीण भारत को उसके हाल पर छोड़ दिया है और फिर उसके पतन को ‘विकास की अनिवार्यता’ कहकर जायज़ ठहराया है।
इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि ‘शहरी होना’ आखिर किसे कहते हैं? क्या यह महज एक भौगोलिक स्थिति है — यानी शहर में रहना? या यह एक मानसिक स्थिति है — एक खास तरह का सोचना, रहना, व्यवहार करना? अगर दूसरी परिभाषा को मानें, तो आज गाँव के बहुत-से युवा मानसिक रूप से शहरी हो गए हैं — वे शहरी संगीत सुनते हैं, शहरी कपड़े पहनते हैं, शहरी सपने देखते हैं — लेकिन जीते गाँव में हैं। और इस दोहरेपन में एक गहरा मनोवैज्ञानिक संकट छिपा हुआ है। वे न तो पूरी तरह गाँव के रहे, न शहर के बन पाए। वे एक बीच की जगह में लटके हुए हैं — अपनी जड़ों से कटे हुए, अपने लक्ष्य से अभी दूर। इस अवस्था को समाजशास्त्री कभी-कभी ‘सांस्कृतिक विस्थापन’ कहते हैं और यह एक ऐसा दर्द है जो आँकड़ों में नहीं दिखता लेकिन भारत के करोड़ों युवाओं के जीवन में प्रतिदिन महसूस होता है।
ग्रामीण युवाओं के इस सांस्कृतिक विस्थापन को समझने के लिए हमें उस शिक्षा व्यवस्था को भी देखना होगा जो उन्हें आकार देती है। भारत में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की पाठ्यपुस्तकें, उनकी भाषा, उनके उदाहरण, उनकी कहानियाँ — सब शहरी जीवन को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। एक गाँव के बच्चे को जब पाठ्यपुस्तक में बस-स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सिनेमाघर और अस्पताल के चित्र दिखाए जाते हैं — जो उसके आसपास के वास्तविक जीवन से एकदम अलग हैं — तो वह अनजाने ही यह संदेश ग्रहण कर लेता है कि असली, सभ्य, महत्वपूर्ण जीवन वहाँ होता है, यहाँ नहीं। उसकी अपनी दुनिया — खेत, तालाब, पशु, मेला, पंचायत — पाठ्यपुस्तक में कहीं नहीं है। इसका अर्थ यह है कि शिक्षा व्यवस्था ने शुरू से ही गाँव को ‘अशिक्षित’ और शहर को ‘शिक्षित’ के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है। जब एक पीढ़ी ऐसी शिक्षा पाकर बड़ी होती है तो उसके लिए गाँव छोड़ना केवल आर्थिक विवशता नहीं रह जाती — वह एक मनोवैज्ञानिक इच्छा बन जाती है, एक आकांक्षा बन जाती है जो उसे अपनी जड़ों से काटती है।
इस मनोवैज्ञानिक काटने की प्रक्रिया को और तेज़ करने में सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन की भूमिका आज निर्विवाद है। पिछले एक दशक में, जब से सस्ते स्मार्टफोन और सस्ते डेटा ने गाँव-गाँव में प्रवेश किया है, तब से एक अभूतपूर्व सांस्कृतिक घुसपैठ हुई है। बिहार के किसी गाँव में बैठा एक सत्रह वर्षीय लड़का अब दिल्ली या मुंबई के किसी युवा के साथ एक ही सोशल मीडिया फीड साझा करता है। वह वही विज्ञापन देखता है, वही ट्रेंड देखता है, वही ‘लाइफस्टाइल’ देखता है। लेकिन उसकी क्रय शक्ति, उसके अवसर और उसकी सामाजिक वास्तविकता उस फीड से कोसों दूर है। यह दूरी उसके भीतर एक निरंतर असंतोष पैदा करती है — और इसी असंतोष को भुनाने के लिए विज्ञापन उद्योग काम करता है, राजनीति काम करती है और पलायन की दिशा में धकेलने वाली शक्तियाँ काम करती हैं। सोशल मीडिया ने गाँव को वैश्विक संस्कृति से जोड़ा है — यह एक सत्य है — लेकिन इस जुड़ाव की कीमत अक्सर स्थानीय संस्कृति, स्थानीय भाषा और स्थानीय पहचान की बलि के रूप में चुकाई जाती है।
यहाँ एक और गंभीर प्रश्न उठता है जो प्रायः अनदेखा रह जाता है — और वह है पर्यावरण का प्रश्न। भारत के गाँव, अपनी तमाम कमियों के बावजूद, एक ऐसी जीवनशैली के वाहक रहे हैं जो पर्यावरण के साथ अपेक्षाकृत सामंजस्य में थी। परंपरागत कृषि में फसल-चक्र था, जल-संरक्षण की तकनीकें थीं, जैव-विविधता थी। गाँव का घर मिट्टी का था, छत खपरैल की थी, ईंधन के लिए लकड़ी और गोबर था — यह व्यवस्था पूर्ण नहीं थी, लेकिन कार्बन-पदचिह्न के मामले में यह शहरी जीवनशैली से कहीं अधिक टिकाऊ थी। जब करोड़ों लोग गाँव से शहर आते हैं तो वे एक ऐसी जीवनशैली में प्रवेश करते हैं जो प्रति व्यक्ति संसाधनों की खपत कई गुना बढ़ा देती है। एयर कंडीशनर, प्लास्टिक पैकेजिंग, मोटर-वाहन, कंक्रीट की इमारतें — यह सब मिलकर एक ऐसी पारिस्थितिक कीमत चुकाते हैं जिसका बोझ अंततः उन्हीं ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ता है जहाँ से लोग आए थे — बाढ़ के रूप में, सूखे के रूप में, भूजल के गिरते स्तर के रूप में। इस अर्थ में शहरीकरण एक ऐसा चक्र है जो उस ज़मीन को खाता है जिस पर वह खड़ा है।
फिर भी हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि गाँव की कुछ परंपराएँ — और इनमें से कुछ की तो समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने भी प्रशंसा की है — वास्तव में अन्यायपूर्ण और मानव-विरोधी थीं। सती-प्रथा, बाल-विवाह, छुआछूत, विधवा-उत्पीड़न, स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित रखना — ये सब गाँव की उस परंपरागत व्यवस्था के अंग थे जिसे कुछ लोग रूमानी दृष्टि से देखते हैं। शहरीकरण और आधुनिकीकरण ने इन प्रथाओं को चुनौती दी है, कानूनी और सामाजिक दबाव के ज़रिये इन्हें कमज़ोर किया है। एक दलित युवती आज इसलिए स्कूल जा पाती है, इसलिए अपने पसंद के व्यक्ति से विवाह कर पाती है, इसलिए शहर में नौकरी कर पाती है — क्योंकि आधुनिकता ने उसे कुछ अधिकार दिए, कुछ अवसर दिए। इसे नकारना सामाजिक न्याय के साथ विश्वासघात होगा। तो प्रश्न यह नहीं है कि गाँव अच्छा था या बुरा — प्रश्न यह है कि हम किसके गाँव की बात कर रहे हैं? उच्च जाति के ज़मींदार का गाँव और भूमिहीन दलित मज़दूर का गाँव एक ही नहीं था। दोनों के लिए शहरीकरण के अर्थ अलग-अलग हैं।
इसीलिए इस पूरे विषय को ‘शहर बनाम गाँव’ के सरलीकृत द्वंद्व में नहीं देखा जाना चाहिए। यह वर्ग का प्रश्न है, जाति का प्रश्न है, लिंग का प्रश्न है। एक संपन्न उच्च-जाति का किसान जिसके पास दस एकड़ ज़मीन है, एक ट्रैक्टर है, जिसके बच्चे शहर में पढ़ते हैं और जो खुद मौसम के हिसाब से शहर और गाँव के बीच आता-जाता रहता है — उसके लिए गाँव वाकई एक सुखद अनुभव हो सकता है। और एक भूमिहीन खेत-मज़दूर जो बारह-चौदह घंटे काम करके भी दो वक्त का खाना मुश्किल से जुटा पाता है — उसके लिए गाँव एक जाल है, एक अभिशाप है। इन दोनों को एक ही श्रेणी में रखकर ‘ग्रामीण’ कहना और फिर उनके जीवन के बारे में एक ही तरह की नीति बनाना — यही वह मूल भूल है जो हमारी ग्रामीण विकास की नीतियों में बार-बार होती है।
अब यदि हम नीति की बात करें तो यह स्पष्ट है कि भारत के नीति-निर्माताओं को एक मौलिक दृष्टिकोण का परिवर्तन करना होगा। अभी तक विकास का अर्थ मोटे तौर पर ‘शहरीकरण’ रहा है — यानी अधिक से अधिक लोगों को शहर लाओ, उन्हें औद्योगिक श्रमिक बनाओ, उनकी क्रय-शक्ति बढ़ाओ। लेकिन यह मॉडल न केवल पर्यावरणीय रूप से अस्थिर है, बल्कि सामाजिक रूप से भी यह असमानता को कम नहीं करता बल्कि बढ़ाता है। भारत के महानगरों में संपत्ति का जो केंद्रीकरण हो रहा है, वह पहले से भी अधिक विषम होता जा रहा है। मुंबई और दिल्ली में करोड़पतियों और अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है और साथ ही उन्हीं शहरों में झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। यह ‘ट्रिकल-डाउन’ अर्थव्यवस्था का वह वादा है जो दशकों से पूरा नहीं हुआ है। इसके विपरीत, अगर ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोज़गार, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढाँचे में निवेश किया जाए तो लोगों को मजबूरी में पलायन नहीं करना पड़ेगा और वे अपनी ज़मीन, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के साथ एक गरिमापूर्ण जीवन जी सकेंगे।
यह कोई असंभव स्वप्न नहीं है। दुनिया के कुछ देशों ने इसे सफलतापूर्वक किया है। जापान में, ग्रामीण क्षेत्रों को ‘ओवर-टूरिज्म’ और शहरी संकट से बचाने के लिए जानबूझकर कुछ उद्योगों और सेवाओं को ग्रामीण इलाकों में स्थानांतरित किया गया। नीदरलैंड्स ने कृषि को एक उच्च-तकनीकी, लाभकारी उद्योग के रूप में विकसित किया — आज नीदरलैंड्स दुनिया के सबसे बड़े कृषि-निर्यातकों में से एक है, जबकि वह भौगोलिक रूप से एक छोटा देश है। भारत में भी ऐसे उदाहरण हैं — महाराष्ट्र का सातारा ज़िला हो, या गुजरात का आनंद ज़िला, जहाँ अमूल का सहकारी आंदोलन खड़ा हुआ — इन्होंने दिखाया कि गाँव में रहते हुए भी समृद्ध और गरिमापूर्ण जीवन संभव है, बशर्ते कि सही संस्थागत ढाँचा हो, सही नीतिगत समर्थन हो और सामूहिक इच्छाशक्ति हो। अमूल का आंदोलन केवल एक डेयरी-उद्योग नहीं था — वह एक सामाजिक क्रांति थी जिसने लाखों ग्रामीण परिवारों को — और विशेषतः महिलाओं को — आर्थिक स्वतंत्रता दी, बिना उन्हें उनकी ज़मीन और उनकी जड़ों से उखाड़े।
भाषा के प्रश्न पर भी कुछ कहना ज़रूरी है क्योंकि भाषा और सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न शहरीकरण की बहस में अक्सर उपेक्षित रहता है। भारत में सात सौ से अधिक भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं — और इनमें से अधिकांश ग्रामीण समुदायों की भाषाएँ हैं। जैसे-जैसे पीढ़ियाँ गाँव छोड़ती हैं, ये भाषाएँ मर रही हैं। एक भाषा का मरना केवल कुछ शब्दों का लुप्त होना नहीं है — वह एक संपूर्ण ज्ञान-प्रणाली का लुप्त होना है, एक विशेष तरह से दुनिया को देखने का लुप्त होना है। गोंडी, भीली, संथाली, तुलु, कोडव — ये सब भाषाएँ अपने-अपने समुदायों के इतिहास, उनकी चिकित्सा-विधियाँ, उनके कृषि-ज्ञान, उनकी कलाएँ और उनकी आध्यात्मिक परंपराओं को संजोए हुए हैं। जब ये भाषाएँ समाप्त होती हैं तो इनके साथ जो ज्ञान जाता है वह किसी अन्य भाषा में अनुवाद नहीं हो सकता क्योंकि वह ज्ञान उस भाषा की संरचना में, उसके रूपकों में, उसके मुहावरों में समाया हुआ होता है। शहरीकरण की यह भाषाई कीमत सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे दीर्घकालिक क्षति है।
इस सब के बीच, एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या हम गाँव को उसी रूप में वापस लाना चाहते हैं जो वह था — या हम एक नए, बेहतर गाँव की कल्पना करना चाहते हैं? यह भेद बहुत महत्वपूर्ण है। जो लोग ग्रामीण जीवन की वकालत करते हैं, उनमें से कुछ एक ऐसे स्वर्णिम अतीत की कल्पना करते हैं जो कभी था ही नहीं — जिसमें गाँव शांतिपूर्ण था, न्यायपूर्ण था, स्वावलंबी था। यह नॉस्टैल्जिया एक रूमानी भ्रम है। वास्तविक गाँव कभी भी पूर्णतः न्यायपूर्ण नहीं था। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम उस गाँव को उखाड़ फेंकें। इसका अर्थ यह है कि हम गाँव की जो वास्तविक शक्तियाँ हैं — उसका सामुदायिक जीवन, उसका पारिस्थितिकीय ज्ञान, उसकी आत्मनिर्भरता, उसकी सांस्कृतिक समृद्धि — उन्हें बचाएँ और मज़बूत करें और साथ ही उसकी कमज़ोरियों — जाति-भेद, स्त्री-उत्पीड़न, अंधविश्वास — को आधुनिकता के औज़ारों से दूर करें। यह एक चयनात्मक आधुनिकता है — जो गाँव को उखाड़ती नहीं बल्कि उसे रूपांतरित करती है।
आज जब हम यह संपादकीय लिख रहे हैं, भारत का एक बड़ा तबका उस संक्रमण-काल में है जहाँ वह न पूरी तरह ग्रामीण रह गया है और न शहरी बन पाया है। लाखों परिवारों में पिता गाँव में है, बेटा शहर में मज़दूरी कर रहा है, बेटी किसी दूसरे शहर में घरेलू काम कर रही है और माँ अकेली घर सम्भाल रही है। यह परिवार का विघटन केवल सामाजिक नहीं है — यह एक भावनात्मक आपदा है जिसे कोई आँकड़ा नहीं पकड़ पाता। बच्चे बिना पिता के बड़े हो रहे हैं, बूढ़े माँ-बाप बिना संतान के बीमार पड़ रहे हैं और शहर में काम करने वाले युवा एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जो उनकी नहीं है — जहाँ उन्हें हर क़दम पर उनकी ग्रामीण पहचान के लिए उपहास और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यह एक मानवीय त्रासदी है जिसे विकास के नाम पर स्वीकार्य मूल्य मान लिया गया है।
अंत में, मैं अपनी बात एक अपील के साथ समाप्त करना चाहता हूँ — और वह अपील है दृष्टि बदलने की। जब तक हम ‘शहरी’ को ‘विकसित’ और ‘ग्रामीण’ को ‘पिछड़ा’ मानते रहेंगे, तब तक न गाँव बचेगा, न शहर सँभलेगा। भारत के शहर आज जिस दबाव में हैं — अनियंत्रित जनसंख्या, प्रदूषण, ट्रैफिक, जल-संकट, बेरोज़गारी — उसका एक बड़ा कारण यह है कि हमने ग्रामीण क्षेत्रों को रहने योग्य बनाने में निवेश नहीं किया। अगर गाँव में बिजली होती, अस्पताल होता, अच्छा स्कूल होता, पक्की सड़क होती, इंटरनेट होता, न्यायिक व्यवस्था होती — तो लोग मजबूरी में शहर नहीं आते। वे आते, लेकिन चुनाव से, मजबूरी से नहीं। और वह पलायन स्वस्थ होता, न कि आपदा। तब शहर और गाँव एक-दूसरे के पूरक होते, प्रतिस्पर्धी नहीं। विकास एकतरफा नहीं होता — वह हर उस मनुष्य तक पहुँचता जो इस धरती पर जन्मा है, चाहे वह मुंबई के किसी ऊँचे फ्लैट में हो या बुंदेलखंड के किसी सूखे खेत में। जब तक यह दृष्टि नहीं आती, तब तक शहर और शहरी होने की यह दौड़ न शहर को जिताएगी, न गाँव को — वह केवल उस मनुष्य को हराती रहेगी जो इस दौड़ में शामिल होने के लिए मजबूर है।
डॉ. शैलेश शुक्ला