भ्रष्ट ताकतवरों पर कसता शिंकजा : कलमाडी को जेल और कनिमोझी पर आरोप पत्र

-प्रमोद भार्गव

देश की अवाम के लिए यह एक अच्छी खबर है कि न्यायिक सकि्रयता के चलते भ्रष्ट ताकतवरों के जेल जाने का सिलसिला शुरु हो गया है। ‘समरथ को नहीं दोष गुंसाईं’ का भारतीय परंपरा में प्रचलित मिथक अब टूट रहा है। 2 जी स्पेक्टम घोटाले से जुड़े मंत्री ए राजा और उनके सहयोगी अधिकारी पहले ही जेल की हवा खा रहे हैं। स्पेक्टम का लाभ उठाने वाली कुछ चुनिंदा निजी कंपनियों के मालिक और महाप्रबंधक भी सींखचों के पीछे हैं। राजनीतिक दृष्टि से सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जाने वाला एक नया आरोपपत्र सीबीआई ने अदालत में दाखिल किया है। इसमें तमिलनाडू के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की राज्यसभा सदस्य बेटी कनिमोझी का नाम षड्यंत्र रचने के सह आरोपियों में दर्ज है। करुणानिधि की पत्नी दयालु अम्मल भी इस लपेटे में कालांतर में आ जाएंगी, ऐसी उम्मीद है। इधर बहु प्रतिक्षित राष्टमण्डल खेल आयोजन समिति के पूर्व अध्यक्ष सुरेश कलमाडी को भी जेल का रास्ता दिखा देने से यह जाहिर हुआ है कि जन अपेक्षाओं के अनुरुप अब विधायिका और कार्यपालिका की भी इच्छाशक्ति मजबूत हो रही है। क्योंकि ऐसी अटकले जताई जा रही हैं कि सुरेश कलमाडी की गिरफतारी और कनिमोझी का आरोपपत्र में नामजद्गी प्रधानमंत्री कार्यालय की सहमति के बाद ही संभव हुए।

इस समय देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जैसा गुस्से का माहौल है, उससे लगता है कि अब सींखचों के पीछे न केवल आम आदमी बल्कि उच्च पद और उंची राजनीतिक शख्सियतें भी पहुंचती रहेंगी। क्योंकि जेल में अब तक आर्थिक दृष्टि से वंचित और लाचारों को ही ठूंसा जाता रहा है। बड़ी मछलियां अक्सर कानून के दायरे से बच निकलती हैं, यह धारणा अब खंडित हो रही है। क्योंकि अब राजनीति, प्रशासन और व्यापार क्षेत्र के एक से एक तीसमारखां जेल में हैं। गठजोड़ की यही वह त्रिलेल है जो छोटे से लेकर बड़े से बड़े भ्रष्टाचार का षड्यंत्र रच करोड़ों, अरबों के बारेन्यारे कर कानून और समाज को ठेंगा दिखाते हुए भ्रष्ट कमाई से सामाजिकआर्थिक प्रतिष्ठा हासिल करती रही है। इस गठजोड़ में सलंग्न लोगों की गिरफतारी से यह वातावरण निर्मित होने लगा है कि संविधान की सर्वोच्चता और न्यायिक शासन व्यवस्था को कोई चुनौती नहीं है। बशर्ते हमारे संविधान के सभी अंग इच्छाबल और बिना किसी प्रलोभन के कर्तव्य पालन में जुटे रहें। वैसे भी हमारा संविधान दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संविधानों की सूची में दर्ज है। क्योंकि इसमें लोकतंत्र को जीवंत बनाने वाले चारों स्तंभ अलगअलग कार्य विभाजन से जुड़े रहते हुए संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। लेकिन वैश्विक उदारवाद के प्रभाव के चलते खासतौर से विधायिका और कार्यपालिका में अतिरिक्त भ्रष्टाचार के प्रति आसक्ति देखने में आ रही है। नतीजतन न्यायपालिका और चौथे स्तंभ को सामान्य से कुछ अधिक सकि्रयता दिखानी पड़ रही है। इस नाते इन स्तंभों पर संतुलन गड़बड़ा देने के भी आरोप लगते रहे हैं। किंतु क्या यह सही नहीं है कि यदि न्यायपालिका और चौथा स्तंभ भी अपने कर्तव्य से विमुख हो जाते तो क्या 2जी स्पेक्टम, राष्टमण्डल खेल और आदर्श सोसायटी जैसे घोटाले सामने आ पाते ? यदि सभी संतभों में परस्पर संतुलन बनाए रखना है तो जरुरी है कि संविधान के सभी स्तंभ कानून की मंशा और जन अपेक्षाओं के अनुसार काम करें। अन्यथा अन्य स्तंभों को सामाजिक सरकारों से जुड़े मुद्दे उठाकर अंजाम तक पहुंचाने के लिए न्यायिकक और समाचारिक सकि्रयता का हिस्सा बनना पड़ेगा।

 

कांग्रेस सांसद सुरेश कलमाडी को स्कोर परिणाम दिखाने वाली घड़ियों की खरीद में किए घोटाले में हिरासत में लिया गया है। इस ठेके में नियमों की इस हद तक धज्जियां उड़ाई कि जिस स्विस टाइमकीपिंग कंपनी को ठेका देना था, केवल उसी की निविदा का लिफाफा खोला गया। बांकी निविदादाताओं को दरकिनार करते हुए उनके लिफाफे ही नहीं खोले गए। स्पेन की कंपनी की भी निविदा बंद लिफाफे में पड़ी रही। मसलन दरों की प्रतिस्पर्धा में शामिल दावेदारों की दरों की मूल्यांकन हेतु सारिणी भी नहीं बनाई गई और 141 करोड़ की अंको ;स्कोरद्ध का हिसाब रखने वाली घड़ियां बालाबाला खरीद ली गईं। यह निर्णय खरीद समिति ने सुनियोजित ंग से साजिशन लिया और करीब 23 करोड़ की रिश्वत ली। इसी मामले में आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोत और वीके वर्मा पहले से ही सलाखों के पीछे हैं। यदि सर्वोच्च न्यायालय की फटकार से आगे ब़ने वाली सीबीआई जांच कुछ कदम और आगे ब़ती है तो खेलो में पैसे का खेल खेलने वाले और भी आला नेता व अफसर फंदे में आएंगे। क्योंकि शुंगलू जांच समिति ने तो दिल्ली के उपराज्यपाल तेजिन्दर खन्ना एवं मुख्समंत्री शीला दीक्षित को भी आरोपों के घेरे में लिया है। किंतु अभी तक इन दोनों राजनीतिक शख्सियतों से पूछताछ ही शुरु नहीं हुई। दरअसल प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष घोटालेबाजों की जबतक पूरी श्रृंखला चकनाचूर नहीं होगी तब तक भ्रष्टाचार को निर्मूल करना मुश्किल है।

1 लाख 76 हजार करोड़ रुपये के राजस्व हानि वाले 2जी स्पेक्टम घोटाले में सीबीआई ने जांच में पाया है कि डीबी रियल्टी नामक कंपनी और उससे जुड़ी अन्य कंपनियों ने करुणानिधि के परिवार की कलिअंगर टीवी कंपनी को विभिन्न माध्यमों से 200 करोड़ रुपये की धनराशि हस्तांतरित की। इस आरोप की आंच ने करुणानिधि के पूरे परिवार को झुलसा दिया है। कलिअंगर टीवी में क्रमश : 20 और 60 प्रतिशत का हिस्सा कनिमोझी और 80 साल की उनकी सौतेली मां दयालु अम्मल का है। 20 फीसदी हिस्सा चैनल के प्रबंध निदेशक शरद कुमार का है। इतनी बड़ी राशि की हिस्सेदार होने के बावजूद दयालु अम्मल का नाम फिलहाल आरोपपत्र में शामिल नहीं है। इस पर हैरानी लाजिमी है कि वे सीबीआई के घेरे से क्यों बचा ली गई ? इसमें एक आशंका यह जताई जा रही है कि वे वयोवृद्ध हैं और तमिल के अलावा दूसरी कोई भाषा नहीं जानती। इसलिए उन्होंने पारिवारिक सदस्यों के भरोसे ही वित्तीय लेनदेन के दस्तावेजों पर दस्तखत कर दिए होंगे। ये सभी दस्तावेज अंग्रेजी में हैं। इससे जाहिर है हमारे देश में अंग्रेजी अपारदश्रिता को ब़ाने का काम भी कर रही है।

 

दयालु अम्मल के नाम को तत्काल आरोपपत्र में न लिए जाने के पीछे एक अटकल यह भी लगाई जा रही है कि केंद्र संप्रग सरकार में करुणानिधि के दल द्रविड़ मुनेत्र कषमग के 18 सांसदों की अहम भागीदारी है। इसलिए कांग्रेस, द्रमुक द्वारा समर्थन वापिस लेने की स्थिति में गठबंधन सरकार चलाने के विकल्प नहीं तलाश लेती तब तक दयालु अम्मल की आरोपपत्र में नामजदगी टाली जाती रहेगी। अलबत्ता सर्वोच्च न्यायालय की लताड़ जरुर दयालु अम्मल पर कहर बरपा सकती है। बहरहाल कलमाडी और कनिमोझी के कानून के घेरे में आ जाने से आमजन में यह उम्मीद तो जगी है कि भ्रष्टाचारियों के गठजोड़ की श्रृंखला अब टूटेगी। इनकी कालीकमाई वसूलने का सिलसिला और शुरु हो जाता है तो उम्मीद की जा सकती है कि भ्रष्टाचारियों का सामाजिक बहिष्कार भी शुरु हो जाएगा।

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