लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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जिन्दगी के पथ पर चलते हुए बहुत सी एैसी घटनाएं घटित हो जाती हैं जो यादगार ही बनकर नहीं रह जाती,वल्कि हमेशा कुरेदती भी रहती है दिलों दिमाग को.क्या उम्र रही होगी मेरी उस समय?यही तेरह या चौदह वर्ष की.वयःसन्धि के उस मोड पर मन की उमंगें आसमान छूने की तम्मना रखती हैं.आज फिर जब याद ताजा हो आयी उन दिनों की,तो लगता है यह तो शायद बहुत दिन पहले की बात नही है. पर यह तो उस समय की कहानी है जब देश को स्वतंत्र हुए केवल दस या ग्यारह साल हुए थे.हाँ, कहानी ही तो है. अलिफ लैला के किस्सों और इस कहानी में आज की परिस्थितियों में मुझे तो कोई अंतर नहीं नजर आता.

उस उच्च माध्यमिक विद्यालय में दो पुस्तकालय थे-स्कूल पुस्तकालय और गांधी पुस्तकालय.पुस्तकें दोनो में अलग अलग थीं.पुस्तकालयों से पुस्तकें लेने पर दस्तखत करने होते थे.पर उन्हीं दिनों एक घटना घट गयी.गांधी पुस्तकालय के अध्यक्ष तिवारी जी गांधी वादी परम्परा के अंतर्गत छात्रों को तकली से सूत कातने को प्रोत्साहित करते थे.इसी सिलसिले में उन्होनें बहुत सी तकलियां और पुनियाँ थोक के भाव से मंगवाई तकि वे चीजें छात्रों को कम कीमत पर उप्लब्ध हो सकें.पता नही उन्हें क्या सूझी, उन्होनें प्रत्येक तकली और पूनी की कीमत लिखकर तकलियों और पूनियों को एक जगह रख दिया.एक खाली डब्बा भी वहाँ रखवा दिया. इसके बाद छात्रों को बता दिया गया कि वे वहाँ से कीमत रख कर चीजें खरीद लें.शाम को विक्री के बाद जब हिसाब किया गया तो एक पैसे का भी फर्क नहीं आया. जब कि वहाँ देखने वाला कोई नहीं था. विश्वासनहीं हुआ न. एक बात अवश्य हुई.इस घटना के बाद तिवारी जी ने गाँधी पुस्तकालय से पुस्तक लेने पर छात्रों का दस्तखत लेना बंद कर दिया.

कहानी आगे बढती है.कहानी सुनानेवाला यानि मैं अब विद्यालय के अन्तिम वर्ष का छात्र था और छात्रावास में आ गया था .

ग्रामीण परिवेश में बसे हुए,आम के पेडों और हरियाली के बीच बने हुए इस स्कूल मे एक छोटा छात्रावास भी था.आठ कमरों में बतीस छात्र रहते थे.चार चार कमरे एक दूसरे के पीछे बने हुए थे.चार कमरे स्कूल के सामने थे और चार उन कमरों के पीछे.उन पीछे वाले कमरों के सामने एक बहुत ही घना और छायादार नीम का पेड था.वह नीम का पेड हम छात्रों के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण था.नीम के पेड के नीचे बैठना और गप्पें मारना छात्रावास के छात्रों के लिये बहुत हीं सुखद था.वहां छात्र एक तरह की स्वतंत्रता का भी अनुभव करते थे,क्योंकि वह स्कूल के पिछवाडे था.कल्पना कर सकते हैं आप?छात्रावास में न बिजली की रोशनी थी और न पंखे.लालटेन की रोशनी में पढाई होती थी और अंधेरे में हर तरह के खिलवाड.खिलवाडों का सिलसिला ज्यादातर पीछे वाले कमरों में चलता था,क्योंकि स्कूल के अहाते के अंदर ही प्रधानाध्यापक का भी आवास था,अतः स्कूल के सामने वाले कमरों में ज्यादा कुछ किया नही जा सकता था.

छात्रावास में बिगडैल छात्रों का एक एैसा समूह भी था जो हर समय मरने मारने को तैयार रहता था.उसी के बीच पढाई को गंभीरता से लेने वाले छात्रों की पढाई भी चलती रहती थी.उस समय तक छूरा रखकर या पिस्तौल दिखाकर नकल करने की परंपरा नहीं चली थी.छात्र नकल करने के लिये ज्यादातर कागज के छोटे छोटे टूकडों का इस्तेमाल किया करते थे.एक मोटे लडके का नकल करने का अपना अलग ही तरीका था.वह अपनी मोटी मोटी जांघों पर बहुत ही बारीक रूप में बहुत सी चीजें लिखकर ले जाता था.चूंकि उस छोटी उम्र में भी वह ढीली ढाली धोती पहनता था,किसी को भी नकल इस तरीके का आभास भी नहीं हो पाता था.

छIत्रावास के कमरे छात्र मिलजुल कर साफ कर लेते थे,पर खाना बनाने और बर्तन धोने के लिये एक पंडित और कहार की व्यवस्था छात्रावास में थी.पंडित को तो हमलोग पंडितजी कहा करते थे,पर कहार को उसके नाम से यानि नारायण कहकर बुलाते थे.

स्कूल एक स्थानीय जमींदार की देन था.आजादी के बाद भी स्कूल में उनकी बहुत चलती थी.स्कूल के ठाकुर बाहुल्य होने के बावजूद अन्य जातिवाले समान्यतः हेय द्ऋष्टि से नहीं देखे जाते थे.शिक्षकों में कुछ स्वतंत्रता सेनानी भी थे.स्कूल में गाँधी और खादी का प्रभाव भी कुछ ज्यादा ही था.

एैसे उस स्कूल में दो तरह की विचार धारा वाले लोग साफ द्ऋष्टिगोचर होते थे. एक खादीधारी और दूसरे खादी न पहनने वाले,पर प्रत्यक्षतः दोनो विभिन्न विचार वालों के बीच कोई कटुता नहीं नजर आती थी.

पर मेरी कहानी का केन्द्र तो छात्रावास है, जहां सुबह और शाम खाने के समय घंटी बजा करती थी और छात्र दौड पडते थे अपने लोटे लेकर मेस की ओर.कभी कभी ज्यादा शोरगुल होने पर और चौके में बैठने की जगह कम होने के कारण बारी बारी से खाने के नियम भी बनाये जाते थे और देखते देखते नियम टूट भी जाते थे.एैसे ही नियम के तहत जो सोलह छात्र रात्रि भोजन के लिये पहले भेजे गये थे वे बतीस छात्रों का खाना खा गये.अब जो शोर मचा तो छात्रावास के बुजुर्ग अधिक्षक को आना पडा.क्रोध में आकर उन्होनें सोलह छात्रों पर बतीस छात्रों के खाने का चार्ज कर दिया.होहल्ले के बीच फिर से खाना बना तो बाकी छात्र खा पाये.

पंडित जी तो खैर पंडित जी थे,पर नारायण भी कुछ कम नहीं था.नारायण बगल के एक एैसे गाँव का निवासी था,जहाँ के ठाकुर अपने को अन्य ठाकुरों से श्रेष्ठ मानते थे.उसी गाँव के ठाकुरों में एक एैसे ठाकुर भी थे,जो इलाके सबसे बडे रईस माने जाते थे.नारायण को फक्र था कि छोटी जाति का होने के बावजूद वह एैसे गाँव का निवासी था,जो उस इलाके का श्रेष्ठ गाँव था.नारायण के हम छात्रों के साथ वर्ताव में भी इसकी झलक मिलती थी.स्वभाग्य या दुर्भाग्य बस गाँव का कोई छात्र छात्रावास में नहीं था.

वैसे छात्रावास में ठाकुरों के बच्चे ज्यादा थे,पर दूसरी जातियों के बच्चे भी थे ही.इसी बीच छात्रावास का कार्यभार,बुजुर्ग अधिक्षक से एक अन्य शिक्षक ने ले लिया..हमारे पहले वाले अधिक्षक भी गाँधी वादी थे,पर दूसरे अधिक्षक तो आदर्श के मूर्तिमान रूप थे.स्कूल में गणित पढाते थे और बहुत ही सीधे स्वभाव के माने जाते थे.पर उनमें एक बात थी.गलत या अभद्र व्यवहार किये जाने पर उनका क्रोध भी मैनें देखा था.थोडा हकला कर बोलते थे,पर क्रोध में आने पर उनका हकलाना बढ जाता था.

मेरी कक्षा में मुंशी राम नामक धोबी जाति का एक छात्र था.डेढ दो कोस दूर गाँव से पढने आता था.पढाई में वह बहुत अच्छा तो नही था ,पर ठीक ठाक था.मित्रता तो उसकी मुझसे भी थी ,पर मेरे कमरे के एक अन्य साथी से उसकी बहुत अच्छी खासी पटती थी. वैसे मेरा वह साथी स्कूल के प्रधानाध्यापक का भी चहेता था.मेरे कमरे में उन दिनों तीन ही छात्र थे.चौथे की जगह खाली थी.मुंशी स्कूल के मध्यावकाश के समय कभी कभी हमलोगों के साथ मेरे कमरे में आ जाता था.तैराकी और दौड में मुंशी बहुत अच्छा था.समय की परत में मुंशी और स्कूल के अन्य साथी कहाँ दब गये,यह तो आज पता भी नही है.

बातों ही बातों में एक दिन मुंशी ने छात्रावास में रहने की इच्छा व्यक्त की.हमलोगों को क्या एतराज हो सकता था?प्रधानाध्यापक से इजाजत आवश्यक था. वह भी मिल गया. मुंशी हमलोगों के साथ रहने आा गया.उसका भी वही कार्यक्रम बन गया जो हमलोगों काथा. एक बात बताना मैं भूल गया.वह कमरा जिसमें मैं अपने दो साथियों के साथ रहता था,वह स्कूल के सामने वाले चार कमरों में से एक था.

मुंशीको आये हुये दो दिन हो गये थे. इस बीच कोई खास बात नही हुई थी.तीसरा दिन रविवार था यानि छुट्टी का दिन था.याद नही कौन महीना था,पर शायद अप्रैल का महीना रहा होगा.हवा में गर्मी आ गयी थी.कमरों में रहना असह्य होने लगा था,पर रहना तो था ही. दोपहर का खाना खाकर हमलोग अपने कमरे में ही लेटे थे.मेरे तीनो साथी तो निद्रामग्न थे,पर मेरी स्थिति निद्रा और अनिद्रा के बीच की थी.बचपन में पिताजी ने गर्मी की दोपहरी में सुलाने की बहुत कोशिश की थी ,पर कभी भी मैं दोपहर को ठीक से सो नहीं सका था.अनुशासन के तगडे पिताजी की आँख बचाकर मैं कभी कभी घर के बगल वाले आम के बगीचे में भी निकल जाता था.पकडे जIने पर डाँट कम.मार ज्यादा पडती थी.

हाँ तो मैं बात कर रहा था,उस दोपहर की निद्रा और अनिद्रा के बीच की स्थति की.इसी बीच कानों में कुछ शोरगुल की आवाज पहुंची.प्रथम तो मुझे कोई शक नहीं हुआ.लगा कि कुछ छात्र पीछे वाले नीम के पेड के नीचे बैठ कर हल्ला कर रहे हैं.थोडा आश्चर्य भी हुआ,पर यह स्थिति ज्यादा देर तक नही रही.बडे जोर से जय बजरंगबली की आवाज सुनाई दी.सबसे मुखर आवाज छात्रावास के रसोइये यानो पंडित जी की थी.बजरंगबली की जय ने तो मुझे पूरे होश में ला दिया.मैं समझ गया कि दाल में कुछ काला है.क्या ठाट से सो रहे थे मेरे तीनों साथी. उस नारे का भी उनकी निद्रा पर कोई प्रभाव नहीं पडा था.

मैं अपनी जगह से धीरे से उठा और छात्रावास के दूसरी तरफ गया.देखता क्या हूँ कि वीस पच्चीस छात्रों का जमघट लगा हुआ है. नेतागिरी की बागडोर पंडित जी के हाथों में है.वे अपना ऊल जल्लूल बके जा रहे हैं. नारायण भी उछल कूद मचा रहा था.छात्र भी उतेजित नजर आ रहे थे.मेरे वहाँ पहुचते ही वे मेरी ओर मुखातिब हो गये.कुछ देर तक तो मेरी समझ में ही नहीं आया कि वे लोग कहना क्या चाहते हैं.सबसे ज्यादा उतेजित पंडित जी थे.वे कहने लगे-

“आपलोग धोबी को अपने कमरे में भले हीं रख लें, पर मैं अपने चौके में उसको नहीं घुसने दूंगा.”

नारायण भी कहाँ पीछे रहने वाला था?बोला”मैं धोबी की जूठी थाली नहीं धो सकता.”

छात्रों की शह भी उनको मिल रही थी.और तो और मल्लाह छात्र भी उन्हीं लोगों का साथ दे रहा था.

मुझे क्रोध तो बहुत आ रहा था. सरे आम मेरे साथी की इज्जत नीलाम हो रही थी.एैसे भी स्कूल में अंतिम वर्ष के छात्रों की खास इज्जत होती है.वहाँ खडे अधिकतर छात्र जुनियर थे.मेरे एक दो सहपाठी भी उनमें थे,पर वे कुछ बोल नहीं रहे थे.क्रोध को दबाते हुए, वातावरण को हल्का करने के लिये मैं बोला,” मुन्शी दो दिनों से उसी चौके में खा रहा है और नारायण भी दो दिनों से उसकी जूठी थाली धो रहा है.अभी तक आपलोगों की जाति भ्रष्ट नहीं हुई तो आगे कैसे होगी?

इस कथन ने एक तरह से आग में घी का काम किया.पंडित ने अपना जनेऊ तोड कर फेंक दिया और लगा कि मुझ पर वार कर बैठेगा.ऊल जलूल भी बकने लगा.

अब मेरे लिये भी अपने पर काबू रखना मुश्किल हो गया.तुर्रा यह कि मैं अपने को अकेला पा रहा था. मुझे अफसोस तो हो रहा था कि मैं अपने कमरे के अन्य साथियों को लेकर क्यों नहीं आया,पर संतोष भी था कि कम से कम मुंशी तो इन सब बातों से अनभिज्ञ है,पर कब तक?

मैने बात आगे बढाने की कोशिश की-“ठीक है आपलोगों की जाति भ्रष्ट होने का खतरा पैदा हो गया है,पर अब आपलोग करेंगे क्या?”

एक जूनियर छात्र बोला,”आप भी तो हमलोगों के ही जाति के हैं.आपकी भी तो जाति भ्रष्ट हो रही है.”

मैं इस प़्रश्न को टाल गया.मुझे तो यह भी लग रहा था कि कहीं नारायण यह न कह बैठे कि ये मेरे गाँव के ठाकुरों के तरह थोडे ही हैं. ऐसे भी मेरी जाति तो बहुत बार भ्रष्ट हो चुकी थी.उस समय मैं शायद सातवीं कक्षा का छात्र था.गाँव के बुजुर्गों से बहस कर बैठा कि जाति पाँति बेकार है. अगर साफ सुथरा खाना कोई अछूत कहे जाने वाली जाति का आदमी भी खिलाये तो उसे खाने में परहेज नहीं होना चाहिये. एक बुजुर्ग बोले थे,”बबुआ कहना आसान है,करना कठिन”.मैने उसी समय अपने हरिजन चरवाहे से अपने घर से रोटी मंगाई थी और उनके सामने खा गया था.थोडा हो हल्ला मचा था,पर फिर सब शान्त हो गया था.पिताजी को घटना का पता शाम को लगा था.उन्होनें इतना ही कहा था,-“तुमने गलती तो नही की,पर इस तरह सबको उतेजित करना ठीक नहीं था.”

इस तरह की छोटी मोटी घटनायें,जैसे किसी हरिजन के लोटे से पानी पी लेना इत्यादि तो चलती ही रहती थी,पर दूसरी घटना जो छात्रावास में आने के पहले घटी थी,वह थी एक मुस्लिम सहपाठी के साथ बैठ कर एक ही प्लेट से जलेबी खाना.हम चार साथी जो अगल बगल के गाँवों के थे,स्कूल से साथ ही लौटते थे.हमारा मुस्लिम साथी दसवीं कक्षा का छात़्र था, मैं नवीं और अन्य दो आठवीं कक्षा के.उस दिन साथियों का मन हुआ कि रास्ते के दूकान से जलेबी खायी जाये.आर्डर देने का जिम्मा रामजी ने लिया जो आठवीं कक्षा का छात्र था. उसने कहा कि तीन आदमियों का एक प्लेट में मंगाते हैं और चौथे का दूसरे प्लेट में.

मैनें पूछा,” ऐसा क्यों?”

उसने मुस्लिम साथी की तरफ इशारा किया.

देखने में ऐसा नहीं लग रहा था कि हमलोगों के मुस्लिम साथी को भी कोई एतराज था,पर मुझे यह गवारा नहीं हुआ. मुझे आज भी याद है,मैनें कहा था,या तो एक प्लेट या चार प्लेटें.अंत में हमलोगों ने एक ही प्लेट से जलेबियाँ खाई थी.

पंडित जी आगे बढे और बोले,-“मैं तो यह नौकरी छोड दूंगा.मैं अभी ब्रजराज बाबू(छात्रावास के नये अधिक्षक)के पास जा रहा हूँ और उनसे कहूँगा या तो धोबी छात्रावास में रहेगा या मैं रहूँगा.”

नारायण भी कहाँ पीछे रहने वाला था? वह भी पंडित के हाँ में हाँ मिलाने लगा.छात्र भी पंडित के साथ जान को तैयार हो गये.मुझे तो बहुत क्रोध आा रहा था,खासकर अपने सहपाठी और मित्र को बार बार उसके जाति के नाम से संबोधित किये जाने से,पर मैं कर हीं क्या सकता था?फिर भी मैनें एक आखिरी कोशिश की,-” मान लीजिये, ब्रजराज बाबू आपलोगों की बात नही माने.

इस बात पर लडके भडक उठे,”मानेंगे कैसे नही?इतने लोग साथ जा रहे हैं.क्या एक लडके के लिये वे छात्रावास बंद कर देंगे?”

मैनें कहा,-“अगर ऐसा करने को तैयार हो गये तो?”

पंडित जी विफर पडे,-“ऐसा हो ही नहीं सकता.”फिर नेता की तरह छात्रों से बोले,”इनसे उलझ कर हमलोग अपना समय बर्बाद कर रहे हैं. जो होगा देखा जायेगा.यह तो नहीं बनता कि हमलोगों कासाथ दें,उल्टे हमलोगों का रास्ता काट रहे हैं.”इतना कहकर वे लोग आगे बढे.

छात्रावास से ब्रजराज बाबू के डेरे की दूरी 200 या 250 गज रही होगी.मुझमे इतनी हिम्मत नही थी कि मैं तमाशा देखने के लिये भी उनके पीछे जाता,क्योंकि मैं ब्रजराज बाबू का स्वभाव जानता था और बहुत हद तक इस जुलूस का परिणाम भी जानता था.फिर भी उत्सुक्ता तो थी ही.मैं छिपते छिपते वहाँ तक पहुँच ही गया,पर किसी की नजर मुझ पर नही पडी.

क्या द्ऋष्य था!पता नहीं उन लोगों ने ब्रजराज बाबू से क्या कहा था.मैं सुन नहीं सका था.ब्रजराज बाबू का क्रोध सातवें आसमान पर था.वे क्रोध से थर थर काँप रहे थे. उन्होंने सामने पडा बाँस का एक टुकडा उठा लिया था.लगता था कि अब मार बैठे कि तब.ऐसा लग रहा था कि क्रोध में सबकुछ एक साथ हीं कह देना चाहते थे,पर तेजी के बावजूद आवाज रूक रूक कर निकल रही थी.वर्षों बाद राजकपूर की ‘जागते रहो ‘ फिल्म देखी थी.वह द्ऋष्य भी कुछ वैसा ही था.

ब़्रजराज बाबू का हकलाना भी बढ गया था.

पंडित–तुम तुम अपने को समझते क्या हो और नारायण–तुम–मैं मैं अभी तुम —दोनो–को नौकरी से बाहर—बाहर करता हूं.तुमलोग अभी अभी अपना वोरिया विस्तर उठाओ और दफा हो जाओ.जब–भूखों मरोगे तो पता चलेगा.

फिर वे छात्रों की ओर मुडे और बाँस का टूकडा उठाकर बोले,”तुम लोगों —की हिम्मत कैसे हुई —ऐसा–ऐसा करने को?अपने एक वरिष्ठ साथी को अपमानित करने— की—हिम्मत?मन तो –कर–रहाहै कि-मारते —मारते पीठ–पीठ की चमडी उधेड दूँ,पर–नहीं,अब मैं मैं–तुम–तुम लोगों को कुछ नहीं कहूंगा.तुम–तुम लोग इस लायक भी नहीं हो.तुम–सब –अपना अपना विस्तर बाँधो और घर जाओ.मैं हेड मास्टर साहब के पास जा रहा हूँ.सब–सब कमरे में ताला लगा दूंगा.ऐसा कहते कहते उन्होनें बाँस का टूकडा फेंक दिया.

लोगों को काटो तो खून नहीं.उनके तो हाथों के तोते उड गये थे.पाँसा ऐसा उल्टा पडा था कि सब भौंचक रह गये थे. मेरे पास आगे देखने का समय कहाँ था?मैं तो वहाँ से रफूचक्कर हो चुका था.कमरे में आया तो देखा कि मेरे तीनो साथी जग चुके हैं.मुंशी को लगता है कि घटना का पता चल चुका था.वह बहुत ही मायूस नजर आा रहा था.

बाद की कहानी बहुत छोटी है.कुछ देर बाद उसी समूह का एक लडका आया और मुझे बुलाकर पीछे ले गया.लोगों के चेहरे पर हवाइयाँ उड रही थीं.सबसे बुरा हाल पंडित और नारायण का था.उनकी नौकरी जा रही थी.छात्र भी कम परेशान नही थे.उनको पता नहीं चल रहा था कि वे घर जाकर अपने अभिभावकों को क्या कहेंगे?नारायण के लिये तो दोहरी मार थी.एक तरफ तो उसकी नौकरी जा रही थी दूसरी तरफ उसकी गाय का भोजन. गाँव से आकर उसकी गाय दोनो शाम माड पिया करती थी.मुझे तो उन लोगों को देख कर ऐसा लग रहा थाकि वे अभी अभी रो पडेंगे.जो पंडित जी कुछ देर पहले शेर की तरह दहाड रहे थे,अब गीदड नजर आ रहे थे.सब सर झुकाये बैठे थे.मेरे पहुँचते ही सब खडे हो गये.सर तो सबका तब भी झुका हुआ था.

मैंने पहुँचते ही पूछा,’मुझे क्यों बुलाये आपलोग”?

पहले तो किसी के मुँह से बोल ही नहीं फूटी,पर बाद में पंडित ने पूरी बात बतायी.अधिकतर बातों का ज्ञान मुझे पहले से ही था,पर उन लोगों को कहाँ पताथा?

मैं बोला,-“मैं इसमे क्या कर सकताहूँ?”

पंडित अपने छोटे छोटे बच्चों की दुहाई देने लगा.नारायण भी गिडगिडाने लगा.छात्र अपनी अपनी परेशानियों का रोना अलग से रो रहे थे.मुझे तो पता ही नहीं चल रहा था कि डेढ घंटें में इनकी ऐसी काया पलट कैसे हो गयी. मैं सोच रहा था कि मुंशी को अगर छात्रावास से निकाल दिया गया होता तो अभी ये खुशी से नाच रहे होते और जश्न मनाने की तैयारियाँ कर रहे होते.

मैं बोलI,”इसमे मेरी क्या आवश्यकता है?जाकर ब्रजराज बाबू से अपनी करतूतों के लिये माफी मांगो.”

किसी में हिम्मत नहीं थी कि वह दुबारा ब्रजराज बाबू के सामने जाता.वे सब गिडगिडाने लगे और मुझे साथ चलने के लिये आग्रह करने लगे.आखिर मुझे साथ जाना पडा.ऐसे तो पहले द्ऋष्य का भी मैं साक्षी था.

लोग काँपते काँपते उनके सामने पहुँचे.मुझे ही बातचीत की पहल करनी पडी.पहले तो वे कुछ सुनने को तैयार नहीं हुए.बहुत रोने गिडगिडाने के बाद उन्होने कहा कि जाकर मुंशी राम से माफी मांगो.अगर वह माफ कर देता है तो सोचूंगा,क़योंकि अपमान तो उसका हुआा है.मरता क्या न करता.उन सब लोगों ने मुंशी राम से माफी मांगी और तब जाकर इस कहानी का पटाक्षेप हुआ.

मैं एक बात बता दूँ.यह कहानी नहीं, हकीकत है.उस समय भी हकीकत था और आज भी हकीकत है.मुंशीराम तब भी था और आज भी है.आज भी कहीं न कहीं उसका विरोध हो रहा है,प्रतारणा मिल रही है.नहीं हैं तो ब्रजराज सिंह,क्योंकि वे तो वर्षों पहले गुजर गये.मुझे नहीं मालूम किसी दूसरे ब्रजराज सिंह ने जन्म लिया है.

 

3 Responses to “संस्मरणात्मक कहानी : वे दिन”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    अभी जब मैं आमआदमी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार में लगा था,तो पता नहीं क्यों मुझे यह कहानी याद आ गयी और लगा कि अभी कुछ तो नहीं बदला है.मैं भारत के राजधानी की गलियों में घूम रहा था और चकाचौंध से परे वालों की जिंदगी देख रहा था.लोगों ने दिल्ली के फलाई ओवरों की बहुतप्रसंशा की है,पर मैं तो उनके नीचे दम तोड़ती जिंदगी को देख रहा था. कुछ भी तो नहीं बदला है.शायद अभी भी विकास जब महानगर के हर कोने में नहीं पहुंचा है,तो क्या वह अन्य जगहों पर पहुँच पाया होगा,मुझे इसमे संदेह है.

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  2. shivendra mohan singh

    बहुत सुंदर, तब धोबी… धोबी नही था, एक शिष्य था. लेकिन अब धोबी… धोबी है, शिष्य नही और वैसे लोग भी नही हैं.

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  3. sandhya

    कहानी बहुत सुन्दर हे.जातिवाद आज का भी यतार्थ हे .जो आज हमारे देश की प्रगति में बाधक हे. जिसका राजनीति ज्ञ लाभ उठा रहे हे.

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