लेख

शिक्षक दिवस और सामाजिक दायित्व बोध

डा. विनोद बब्बर 
5 सितंबर महान दार्शनिक भारत के राष्ट्रपति रहे सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन जी के जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की परम्परा है। शिक्षक दिवस है तो ‘गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाय‘ से ‘शिक्षक राष्ट्र निर्माता है’, ‘युग निर्माता है’ की गूंज तो होगी ही लेकिन इस शब्दजाल और नारों से हटकर समझना जरूरी है कि क्या हम शिक्षक को पर्याप्त सम्मान और उपयुक्त वातावरण उपलब्ध करा भी पा रहे हैं या नहीं? यदि नहीं तो ये नारे आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त क्या हैं? समाज से छल नहीं और क्या हैं? 

शिक्षक को गुरु मानने की परम्परा पीछे छूट चुकी है क्योंकि हमने शिक्षक को शिक्षक से अधिक डेटा एंट्री ऑपरेटर बना दिया है। उसे दिनभर पोर्टल पर तरह-तरह की जानकारी देने के आदेशों का पालन करना है। एक शाम घर लौटने पर वृद्ध पिता ने आज के शिक्षक पुत्र से पूछा, ‘बेटा, आज स्कूल में क्या पढ़ाया?’ कुछ क्षण मौन रहने के बाद वह धीरे से बोले, ‘नौकरी करनी है तो पोर्टलों को संतुष्ट करना बाध्यता है इसलिए शिक्षा कम परंतु तरह-तरह के सूचनाएं जुटाने और उन्हें सबमिट करने में पूरा दिन व्यतीत हो जाता है। बार-बार फड़फड़ाते ऐप और पोर्टल को बताना पड़ा कि विद्यालय सक्रिय है, छात्र उपस्थित हैं, मिड डे मील जांचने से बांटने तक सब हो गया है, भेजे गए पोस्टर यथा स्थान टांग दिये गए हैं, वगैरह, वगैरह। इन सब में उलझे शिक्षक को कक्षा में पढ़ाने का कितना समय मिला, इसकी चिंता किसी पोर्टल, ऐप या व्यवस्था को नहीं है। केवल इतना नहीं, इन सबके बाद भी शिक्षक को द्वार-द्वार जाकर जनगणना, मतगणना, मतदाता विशेष निरीक्षण (एसआईआर), से मतदान सहित ऐसे अनेक कार्य करने पड़ते हैं जिनका शिक्षक के दायित्व से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता। ऐसे बोझिल परिवेश में उससे छात्र के सर्वांगीण विकास की आपेक्षा करना स्वयं को धोखा देना ही तो है।’ जबकि शिक्षक का काम बालक को अनघढ़ पत्थर से तराश कर हीरा बनाना है। अनुपयोगी को उपयोगी, आत्मकेन्द्रित को समाज केन्द्रित, परिष्कृत बना समाज के वातावरण को सकारात्मक बनाता है। 

यदि स्वयं को शिक्षित कहने व्यक्ति में यदि ये सब नहीं तो उसकी डिग्रियां, प्रमाण-पत्र कागज के टुकड़ें हैं। यदि इन्हें कोई नाम देना ही हो तो ये अभिभावकों द्वारा स्कूल या कालेज में फीस के रूप में अदा की गई राशि की रसीदें मात्र हैं।

आधुनिकता और परंपरा का समन्वय, अपने पूर्वजों से प्राप्त श्रेष्ठ संस्कारों का संरक्षण करते हुए आधुनिक विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिक का ज्ञान अर्जन और विस्तृत करना शिक्षा का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए ।

 कुछ वर्ष पूर्व शिक्षक दिवस समारोह में एक क्रांतिकारी मुख्यमंत्री जी (अब पूर्व) ने कहा, ‘आज कहीं कोई आपराधिक घटना होती है तो राज्य का मुखिया पुलिस प्रमुख को बुलाकर कहता है, ‘एक सप्ताह में सब ठीक होना चाहिए। मेरा स्वप्न है, जब भी कहीं कोई आपराधिक घटना हो तो मैं पुलिस चीफ को नहीं, शिक्षा संस्थानों के प्रमुखों और शिक्षकों को बुलाकर कहूं, ‘एक सप्ताह में सब ठीक हो जाना चाहिए।’ सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट हुई लेकिन मन-मस्तिष्क ने कहा, ‘भावनाओं को उभारकर वोट तो पाये जा सकते हैं परंतु शिक्षा का भला नहीं हो सकता।’ कार्यक्रम के पश्चात उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि पुलिस के पास अधिकार हैं, वे दंड दे सकती है लेकिन शिक्षक तो उदंड छात्र को भी डांट तक नहीं सकता। जो खुद किसी तरह समय बिता रहा हो, उससे आप अपराधमुक्त समाज की आपेक्षा आखिर किस आधार पर और क्यों करते हो?

शायद ऐसे राजनेता और व्यवस्था यह समझने को तैयार नहीं कि शिक्षा का उद्देश्य मात्र अक्षर-ज्ञान नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य ‘मस्तिष्क में ज्ञान, हृदय में गुण, शरीर में शक्ति और सभी जीवों के प्रति दया, करूणा, सौहार्द का संचार करना रहा है। शिक्षक और विद्यार्थी किसी भी राष्ट्र की नींव के वे पत्थर हैं जो तन से ही नहीं, चरित्र से भी मजबूत होने चाहिए।

 एक समय था जब छात्रों को गुरुकुल में रह कर शिक्षण के साथ व्यवस्था से संबंधित कार्य स्वयं करते थे लेकिन आज स्थिति यह है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने छात्रों को अपने क्लासरूम और स्कूल में छोटे-मोटे कामों से जोड़ने की बात कही तो मीडिया ने वितंडा  खड़ा कर दिया। गुरुकुल व्यवस्था में अभिभावक अपनी प्रिय संतान को गुरु को सौंपते हुए अपेक्षा करते थे कि उनके मार्गदर्शन में उनका पुत्र तेजस्वी, मनस्वी, वर्चस्वी, पूर्ण पुरुष बने। मनुष्यत्व प्राप्त करें। तब गुरु का आदर था। उसके प्रति राजा से समाज तक श्रद्धा थी। ऐसे में उससे शिष्य के सर्वांगींण विकास के लिए ‘हर संभव’ प्रयासो की अपेक्षा की जा सकती थी। तब गुरु-शिष्य दोनो ही प्रतिदिन प्रार्थना करते थे- हे प्रभु! हम दोनों को एक-दूसरे की रक्षा करने की सामर्थ्य प्रदान करो। हम परस्पर मिलकर अपनी भाषा व संस्कृति की रक्षा करें। शत्रु से भयभीत न हों। हमारी शिक्षा हमें एकता के सूत्र में बांधे, बुराईयों से मुक्त करे। हम एक-दूसरे पर विश्वास रखें।’ लेकिन आज स्थिति पूरी तरह भिन्न है। लगभग सभी स्कूलों में होने नियमित होने वाली प्रार्थना नदारद है। आज उनमें परस्पर विश्वास भाव नहीं है। शिक्षा विद्या नहीं, सूचनाओं का सम्प्रेषण है। अब शिक्षक को छात्रों की अन्य गतिविधियों के प्रति दूर और अनजान रहकर विषय तक सीमित रहने के निर्देश हैं। ऐसे में युवा पीढ़ी  दिशाहीन होने का दायित्व किसका? शिक्षक, अभिभावक या वह राजनैतिक व्यवस्था जो छात्र-शिक्षक अनुपात का मानक तय नहीं करती। वर्षो से रिक्त पदों को नहीं भरती। परंतु मौका-बेमौका चरित्र निर्माण के भाषण परोसकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती है।

कुछ लोग कहते हैं कि अध्यापक का कार्य नौकरी या व्यवसाय नहीं, सेवा है लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि डाक्टर, सेना, पुलिस सहित कौन सा काम सेवा नहीं है। अध्यापकों के वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, नैतिक, व्यावसायिक उत्तरदायित्व भी होते है। पढ़ना उनका कार्य है लेकिन बच्चें, युवा पीढी तथा समाज में उपयुक्त सभी की सहायता से आदर्श एवं संस्कारों का रोपण संभव है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान प्राप्त था लेकिन आज व्यवसाय बनती शिक्षा ने छात्र को ‘क्लाइन्ट’ और शिक्षक को ‘सर्विस प्रोवाइडर’ का रूप दे दिया है। ट्यूशन, कोचिंग फल-फूल रहा है क्योंकि आज शिक्षक को भी कोरा सम्मान नहीं, चंचला लक्ष्मी भी चाहिए क्योंकि उसकी भी जरूरतें हैं परंतु प्राइवेट स्कूल में मोटी फीस देने वाले छात्र के हृदय में शिक्षक के प्रति श्रद्धा का अभाव है। ऐसे में अध्यापक अपने कार्य एवं दायित्व बंधनों के कारण सिमट कर रह गया है। परिवार पालन व जीविका में निरंतरतता के लिए वह अपने अधिकारियों के आदेशों का पालन करने को विवश है। ?

  शिक्षक भी मनुष्य है। भौतिकवाद की मृग मारीचिका ने शिक्षक को कक्षा और टयूशन के बीच ‘पेन्डुलम’ बना दिया है। जिसका प्रभाव उसकी कार्यशैली और बौद्धिक क्षमता पर पड़ता है। एक सत्य यह भी है कि समय के साथ शिक्षा के तौर-तरीके भी बदले हैं। प्रत्यक्ष संवाद रेडियों, टीवी, कैसेट से आगे बढ़ता हुआ कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि उपकरणों तक ऑनलाइन हो रहा है। इस बदलते परिदृश्य ने संवेदनात्मक स्पर्श के महत्व को समाप्त कर दिया है। दूसरी ओर प्रबंधन और तकनीक जैसे विषय परम्परागत शिक्षा पर हावी हो रहे हैं। अतः परम्परागत संस्कार और मानवीय मूल्यों के लिए स्थान सीमित हो रहा है। देश से अधिक विदेश का आकर्षण युवा विद्यार्थी को शिक्षा के वास्तविक अर्थ से दूर ले जा रहा है। ऐसे में सब यंत्रवत है। शिक्षक से विद्यार्थी तक। मनुष्य से व्यवस्था तक तो शिक्षक जो एक साधारण मनुष्य ही है। वह हम सब जैसा ही खाता है, पहनता है तो सोचता और करता भी हमारे ही जैसा होगा। फिर वहीं अकेला ‘राष्ट्र-निर्माता’ बनने की धुन पर कैसे और कितना झूम सकता है? लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि आज आदर्श शिक्षक नहीं है। अनेको हैं लेकिन क्या सरकार और समाज ने उनके महत्व को स्वीकारा? उसकी परेशानियों को समझा? उसके बावजूद मशीन के एक पुर्जे जैसा व्यवहार करते हुए उनसे देवत्व वाले व्यवहार की आपेक्षा क्यों?  
  इधर बेलगाम इंटरनेट, सोशल मीडिया ने नगरों-महानगरों से सुदूर गांवों तक अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। जिस मोबाइल का कक्षा में प्रवेश मना था, कोरोना ने उसे मान्यता प्रदान कर अमीर-गरीब हर जेब तक पहुंचा दिया है। सामान्य फिल्म में कोई आपत्तिजनक बात न जाएं, इसकी जांच के लिए सेंसर बोर्ड है परंतु फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, व्हाट्सअप जैसे सोशल मीडिया के मुख स्वतंत्र नहीं, स्वच्छंद होकर हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट कर रहे हैं और हमारे कर्णधार धृतराष्ट्री चुप्पी साधे किसी तरह कुर्सी हथियाने अथवा बचाने की चिंता में व्यस्त है। ऐसे में अनेक प्रकार की सीमाओं का बंदी शिक्षक क्या और कैसे क्रांति कर सकता है?
  शिक्षा, शिक्षक और छात्र को प्राथमिकता सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र का मंगल है। इससे शिक्षक का  गौरव फिर से प्राप्त होने की आशा बंधती है। यह घाटे का सौदा नहीं क्योंकि शिक्षक का कर्तव्यबोध उसे शिक्षा, संस्कृति और संस्कार के माध्यम से समाज का हित चिंतन करने के लिए प्रेरित करेगा।  शिक्षक दिवस मनाने की सार्थकता तभी है जब हम सभी इस बात को हृदय से स्वीकारें कि शिक्षा और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं। शिक्षक का दायित्व केवल अक्षर ज्ञान नहीं अपितु ज्ञान और कौशल के माध्यम से छात्रों को उनकी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है। संस्कृति हमारे मन-बुद्धि को परिष्कृत कर शिक्षा को आत्मविकास से सम्पूर्ण मानवता के हित में संलग्न रहने की क्षमता प्रदान करती है। संस्कृति जीवन जीने की कला है, जबकि शिक्षा इसे संरक्षित, विकसित करने का उपक्रम। इसलिए पाठ्यक्रम में जहां सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों का समावेश हो वही शिक्षक को अन्य कार्यों से मुक्त कर राष्ट्र की भावी पीढ़ी के हृदय में ज्ञान-विज्ञान संपन्न नागरिक बनाने की प्रेरणा और उत्साह भर सके। हम सब के जीवन में जो शिक्षक रहे हैं, उन्हें श्रद्धा से स्मरण कर हम अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षक का महत्व सिखा सकते हैं।