तेलंगाना विधान परिषद् का कैश फॉर वोट प्रकरण

Revanth-Reddy
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????????????????????????????????????नोट के बदले वोट

प्रमोद भार्गव

तेलगांना विधान परिषद् के चुनाव में नोट देकर वोट खरीदने का मामला गहराता जा रहा है। तेलुगू देशम् पार्टी के विधायक रेवंत रेड्डी पर आरोप है कि उन्होंने विधान परिषद् के चुनाव में अपनी पार्टी के पक्ष में मतदान कराने के लिए मनोनीत विधायक एल्विस स्टीफेंशन को 50 लाख रूपए बतौर रिश्वत दिए। रेड्डी को रिश्वत देते हुए 01 जून 2015 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के अधिकारियों ने रंगे हाथों पकड़ा था। हालांकि यह डील 5 करोड़ रूपए की हुई बताई जा रही है,50 लाख तो बतौर पेशगी थे,शेष साढ़े चार करोड़ रुपए वोट डाल दिए जाने के बाद देने थे। सप्ताह भर बाद यह मामला नए सिरे से इसलिए गरमा गया,क्योंकि एक तो इस मामले में पुलिस ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और सत्तारूढ़ दल तेलगांना राष्ट्र समिति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। दूसरे,इस बाबत आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू और एल्विस की बातचीत का आॅडियो टेप प्रसारित हो जाने से इस मामले ने नया मोड़ ले लिया है। इस टेप में नायडू विधायक से वोट देने को कह रहे हैं। हालांकि नायडू इस टेप को फर्जी-करार दे रहे हैं। बहरहाल हकीकत जो भी हो विधायक व सांसदों के कैश फॉर वोट खरीद जाने का प्रकरण एक बार फिर से जोर पकड़ता दिखाई दे रहा है।

भारतीय लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रक्रिया में गाहे-बगाहे धन के खेल की बानगियां सामने आती ही रहती हैं। फिर मामला चाहे विधान परिषद् या राज्यसभा के चुनाव का हो अथवा संसद या विधानसभाओं में अल्पमत सरकारों द्वारा बहुमत जताने का ? किसी विधेयक को पारित कराने के सिलसिले में विश्वास मत प्राप्त करने के लिए भी धन की महिमा काम आती है। देश के सांसद,संसद में सवाल पूछने के बदले भी लक्ष्मी,लपक लिया करते हैं। मसलन सांसदों का असंसदीय आचरण और विधायकों की गैर-विद्यायी दुराचरण की धटनाएं कभी-कभा सामने आने की बजाय,निरंतर देखने में आ रही हैं। विधायिका की गरिमा घूमिल करने वाले ये लांक्षण संवैधानिक गणतंत्र के लिए बड़ा खतरा हैं,क्योंकि इसमें एक-एक कर सभी बड़े राजनीतिक दल शामिल होते दिखाई दे रहे हैं। ‘आम आदमी पाटी‘ शुचिता के संकल्प के साथ अस्तित्व में आई थी,लेकिन उसके भी दो विधायक इस गोरखधंधे की गिरफ्त में हैं। जिन्हें पार्टी ने निलंबित कर दिया है। राज्यसभा के टिकट भी पूंजीपतियों से मोटी धनराशि लेकर बेचे जाते हैं। इस सच्चाई को हरियाणा के वरिष्ठ नेता चौधरी वीरेंद्र सिंह सार्वजनिक रूप से कबूल चुके हैं कि सौ करोड़ रूपए खर्च करके कोई भी राज्यसभा का सांसद बन सकता है। हालांकि राजनीतिक दबाव के चलते वे इस बयान से पलट गए थे।

पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ मनमोहन सिंह और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की नैतिक जबावदेही भी नोट के बदले वोट मामले में घुटने टेक चुकी है। यह स्थिति 22 जुलाई 2008 को लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने के दौरान निर्मित हुई थी। इस वक्त सरकार को अमेरिका के साथ गैर-सैन्य समझौता विधेयक पारित कराना था। इस समझौते के विरोध में संप्रग के सहयोगी वामपंथी दल थे। जब संप्रग सरकार विधेयक पारित कराने को अडिग रही तो वामपंथी घटक दलों ने सरकार से समर्थन वापिस ले लिया था। नतीजतन मनमोहन सरकार अल्पमत में आ गई थी। बावजूद संसद में सरकार का वजूद कायम रहा और वह विधेयक पारित कराने में सफल हो गई,क्योंकि उसने बड़ी संख्या में नोट के बदले सांसदों के वोट खरीद लिए थे। हालांकि वोट खरदने की यह हकीकत इसी दिन तब सामने आ गई थी,जब भाजपा सांसद अषोक अर्गल,फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर सिंह भगोरा ने वोट के लिए दी गई राशि के नोटों की गड्डियां संसद में लहरा दी थीं। तब संसदीय परंपरा और नैतिकता की दुहाई देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए यह षड्यंत्र अमर सिंह ने रचा था और पर्दाफाश भाजपा सांसदों ने किया था।

अल्पमत सरकारों को सांसदों की खरीद-फरोख्त की सौदेबाजी के जरिए बचाए जाने की शुरूआत 1991 में हुई थी। तब प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की अल्पमत सरकार को बहुमत में लाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन समेत चार सांसदों को खरीदा गया था। बाद में सीबीआई जांच में मामला साबित हो जाने के बाद राव समेत मोर्चा के रिश्वत लेने वाले चारों सांसदों पर प्रकरण भी पंजीबद्ध किया गया था। लेकिन संसद और सांसदों को मिले विशेषाधिकार के चलते सर्वोच्च न्यायालय को लाचारी प्रगट करनी पड़ी थी,कि सांसदों के कदाचरण को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। सांसदों को सुरक्षा देने वाले ऐसे प्रावधान संविधान निर्माताओं ने शायद इसलिए रखे थे,जिससे निर्वाचित जन-प्रतिनिधि अपने काम को पूरी निर्भिकता के साथ अंजाम तक पहुंचा सकें। उन्हें अपनी जनता पर इतना भरोसा था कि इस अवाम के बीच से चुना जाने वाला प्रतिनिधि नैतिक दृष्टि से इतना मजबूत तो होगा ही कि वह रिश्वत लेकर न तो अपने मत का प्रयोग करेगा और न ही सवाल पूछेगा ? किंतु यह देश और जनता का दुर्भाग्य ही है कि जब बच निकलने के ये संवैधानिक प्रावधान सार्वजनिक होकर प्रचलन में आ गए तो खुद को नीलाम कर देने वाले सांसद और विधायकों की संख्या भी बढ़ने लग गई।

तेलंगाना विधान परिषद् में नोट के जरिए वोट खरीदने की यह नई कड़ी सामने आई है। इस अपराध या दुराचरण का दायरा विस्तृत होकर दो मुख्यमंत्रियों के चंद्रशेखर राव और चंद्रबाबू नायडू की गिरेवान तक भी पहुंच गया है। लगे हाथ कांग्रेस के तेलंगाना राज्य से सांसद वी हनुमंत राव ने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर इस रिश्वत कांड की सीबीआई जांच कराने की मांग भी की है। चंद्रबाबू फिलहाल स्थानीय समाचार चैनलों पर एक आॅडियो टेप में एल्विस स्टीफेंसन से हो रही वार्ता के प्रसारण के कारण संदेह के घेरे में हैं। इस बातचीत में नायडू एल्विस से वोट देने की गुहार कर रहे हैं। यह समाचार टीआरएस समर्थक तेलुगू चैनल टी न्यूज और आंध्र प्रदेश में विपक्ष के नेता तथा वाईएसआर कांग्रेस अध्यक्ष जगमोहन सिंह रेड्डी के साक्षी टीवी समाचार चैनल पर प्रसारित हुआ है। लेकिन इस मामले में भी कुछ कारगर हो पाएगा,ऐसा लगता नहीं है,क्योंकि सांसद और विधायकों को जो संवैधानिक विशेषाधिकार मिले हंै,उनका फायदा इस प्रकरण से जुड़े आरोपियों को भी मिलना तय है ? इसीलिए जन प्रतिनिधियों के कदाचरणों पर अंकुश लगाने की जितनी भी कवायदें हुई हैं,वे अब तक बेअसर ही रही हैं।

दरअसल भूमंडलीय आर्थिक उदारवाद के भारत में अवतरित होने के बाद 1991 से ही राजनीति मोटे मुनाफे के बड़े कारोबारों में तब्दील होती चली जा रही है। लिहाजा प्रजातंत्र के पवित्र मंदिरों में राष्ट्र व जनता के व्यापक हितों को एक-एक कर बाजारवाद के हवाले किया जा रहा है। इसी का परिणाम है कि राजनेताओं की चल-अचल संपत्ति दिन-दूनी,रात-चौगुनी बढ़ती चली जा रही है। सभी दल व नेताओं में जायज अथवा नाजायज तौर-तरीकों से धन कमाने में लगभग आम सहमति है। गोया,तेलंगाना की घटना एक अपवाद ही है,जहां एक विधायक ने ही दूसरे विधायक को रिश्वत देते हुए रंगे हाथ पकड़वा दिया। यदि इस मामले में दोषी को दण्ड मिलता है तो यह घटना एक उदाहरण साबित हो सकती है,अन्यथा मौजूदा संवैधानिक सुविधा के चलते नतीजा ठन-ठन गोपाल रहने की ही ज्यादा उम्मीद है।

 

 

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