लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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~नरेश भारतीय

 

शान,आन बान से जीया है जी भर बेशक

लेकिन क्या अंतत: सिर्फ मर जाने के लिए?

संकटों ने मेरा मस्तक नत करने की पूरी कोशिश भी की

सीना तान कर हर संकट को हम निपटाते मिटाते रहे

अनवरत संघर्षों की धाराएं कहर हम पर ढाती रहीं

उनमें भी हम बस मुस्कराते रहे और निर्भीक लड़ते रहे.

 

बेख़ौफ़ मरने की चाह रही फिर भी यह सज़ा कैसी?

मर कर जीने देने की तेरी यह दवा कैसी?

‘कर्क महारोग के शिकंजे में हो’ यह कह कर

फिर से मेरी अग्निपरीक्षा जैसी?

कुछ और वक्त जीने की चिंता तो नहीं थी

कुछ और कर जाने की तमन्ना भर थी लेकिन

 

मौत के साए जबसे क्षण क्षण मंडराने लगे

बिन सर झुकाए हम उनसे भिड़ने टकराने लगे

चुनौतियों से लोहा लेने की ताकत बनाए रखी है

वतन को खोकर भी भारत की

विश्वविजय का सदा जयघोष करते

सदा सर्वत्र राष्ट्र गौरव की यशोगाथा गाई है

 

धरती गगन के बीच त्रिशंकु भी कहलाते रहे

पर हम धरा पर कदम अपने तब भी जमाते रहे

चलते गए और बाधाएं पथ की हटाते गए

कंटकों को जड़ से मिटाते हुए

टिकाते हुए नज़र सिर्फ अपने लक्ष्य पर ही

हम हर पग अपना और आगे बढ़ाते रहे

 

हमने देशों की सीमाएं लाँघ डालीं

नफरत की दीवारें ढहाते रहे

सहयोग, सहअस्तित्व की ज्योति जला कर

अपनी संस्कृति का भरपूर परिचय कराते रहे

उम्र पूरी बिता डाली है फिर भी दर्द अब यह है

कि मातृभू का क़र्ज़ अभी और बाक़ी है

 

 

करे या न करे कोई स्मरण अपना कोई चिंता नहीं

तेरा गौरव अमर रहे माँ यही कहते चले आए हैं

जब तक कलम और जुबां चलीं सहज

शब्दों की प्रतिमा घढ़ता आया हूँ

अभिव्यक्ति की भाषा जब प्रखर होती है

बुद्धि बल से लिखी कथा सदा अमर होती है

 

जब अंतिम बेला होने को होगी उसका भी स्वागत होगा

किसी दिन मेरा भी शव धू धू जलता होगा

क्या होगा इस धरती पर तब फिर

इसकी सुध अब तुझको करनी होगी

मैं जो कुछ नहीं कर पाया हूँ

पूरा करने को फिर से धरती पर लौटूंगा तब तक

 

पीढ़ी दर पीढ़ी यूं ही होता आया है

रचता आया है मानव यूं ही अपना इतिहास सदा

खत्म न हो यह क्रम अनुक्रम अब तुम यह जानो

विनाश के खंडहर नींव सदा बनते हैं

विकास के स्वप्नमहल उन्हीं के सीने पर उभरते हैं

देखो नील गगन पर कैसे वे तारागण जा चमके हैं!

 

मैं कब गंगा के तट से निकला था

दूर देश में बहती तमसा के तट पर जा पहुंचा

गंगा तट प्रदेशों में फिर से जा बसने की तड़प बाकी है

पूजा की थाली लाओ मैं माँ के चरणों की अंतिमवंदना कर लूँ

अपनी कोख से ही मुझे पुनर्जन्म का वर दो माँ

जो अधूरा छूट गया, वह पूरा करने को आना है.

 

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