शख्सियत समाज

सफल और अभूतपूर्व आंदोलनों के जनक – श्री अशोक सिंघल

जनजागरण से राष्ट्रजागरण तक की एक अविस्मरणीय यात्रा

विनोद बंसल

राष्ट्रीय प्रवक्ता-विहिप 

भारत का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है अपितु, इसे लोक-शक्ति, संत-शक्ति और समाज-शक्ति के शक्ति पुंज के रूप में भी जाना जाता है। जब-जब समाज के सामने कोई बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ, भारत ने केवल सत्ता की ओर नहीं देखा; समाज ने स्वयं आगे बढ़कर परिवर्तन का मार्ग बनाया।

देश की राजनैतिक स्वाधीनता का आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महात्मा गांधी के सत्याग्रह से लेकर लोकमान्य तिलक के सार्वजनिक गणेशोत्सव, स्वामी दयानंद सरस्वती के सामाजिक जागरण, महर्षि अरविंद के राष्ट्रवाद और जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन तक—भारत की लोकतांत्रिक चेतना का निर्माण अनेक जन-आंदोलनों के माध्यम से हुआ।

इसी व्यापक परंपरा में स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों में से एक था श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन। इस आंदोलन के इतिहास में एक नाम ऐसा है जिसके बिना इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। वे हैं युग दृष्टा श्री अशोक सिंघल जी।

अशोक सिंघल जी : व्यक्ति नहीं, एक आंदोलनकारी संस्था

अशोक सिंघल जी का जीवन राष्ट्रीय और सांस्कृतिक उद्देश्य के प्रति समर्पण का एक अनुपम उदाहरण है। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1926 को हुआ। 1950 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में धातुकर्म अभियांत्रिकी की शिक्षा के दौरान वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और आगे चलकर पूर्णकालिक प्रचारक बने। 1981 में उन्हें विश्व हिंदू परिषद के कार्य में लगाया गया और शीघ्र ही उन्होंने संगठन को व्यापक जनजागरण का माध्यम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी—संगठन को आंदोलन में और आंदोलन को जनशक्ति में बदलने की क्षमता। वे केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे। वे संतों को जोड़ते थे, कार्यकर्ताओं को तैयार करते थे, समाज के विभिन्न वर्गों तक नियमित रूप से पहुंचते थे और किसी विषय को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने की रणनीति पर काम करते थे। यही कारण है कि बाद के वर्षों में उन्हें रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख वास्तुकारों में गिना गया। उन के सक्रिय नेतृत्व का दौर ऐसे समय में आया जब देश में धर्मांतरण, सांस्कृतिक पहचान, मंदिरों की स्थिति और हिंदू समाज की सामाजिक एकता जैसे प्रश्न तेजी से चर्चा में आने लगे थे।

आंदोलन की शक्ति : संत और समाज का एकीकरण

भारत में धार्मिक नेतृत्व हमेशा समाज की चेतना को प्रभावित करता रहा है। अशोक जी की सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक उपलब्धियों में से एक थी—संत समाज को आंदोलन की केंद्रीय शक्ति बनाना। उन्होंने इस महान शक्ति को आधुनिक संगठनात्मक ढांचे से जोड़ा।

1989 में प्रयागराज में हुई धर्म संसद में लगभग 3,000 संत-महंत और धर्माचार्य सम्मिलित हुए। कहा जाता है कि राम मंदिर का मॉडल इसी में स्वीकार किया गया। रामशिला पूजन को गांव-गांव तक ले जाने का निर्णय हुआ और रामजन्मभूमि के प्रश्न को उत्तर प्रदेश की सीमा से निकालकर देशव्यापी आंदोलन बनाने की दिशा तय हुई। यह उनका एक असाधारण संगठनात्मक प्रयोग था। एक मंदिर का प्रश्न—गांव की चौपाल तक पहुंचा। एक धार्मिक प्रतीक—
सामाजिक एकता का माध्यम बना। एक स्थानीय विवाद—राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का विषय बना। और यही वह बिंदु था जहां अशोक जी की संगठनात्मक क्षमता सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।

अशोक जी और भारत में जन-आंदोलनों की परंपरा

वे अयोध्या से अमरनाथ, रामसेतु से सामाजिक समरसता तक—राष्ट्र को सांस्कृतिक सूत्र में पिरोने वाले एक महान आंदोलन-पुरुष थे। उन्हें केवल श्री रामजन्मभूमि आंदोलन के नेता के रूप में देखना उनके विराट कार्यक्षेत्र को बहुत छोटा कर देना होगा। उन्होंने श्री रामजन्मभूमि, रामसेतु, अमरनाथ यात्रा, धर्मांतरण-विरोध, घरवापसी, गौ-संरक्षण, गंगा और तीर्थ संरक्षण, सामाजिक समरसता, जनजातीय समाज का उत्थान तथा उत्तर और दक्षिण भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ने के लिए भी अनेक अभियान चलाए।

1. रामजन्मभूमि आंदोलन: आस्था को राष्ट्रव्यापी जनचेतना बनाना

अशोक सिंघल जी का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक योगदान रामजन्मभूमि आंदोलन का संगठन और विस्तार था। 1984 में दिल्ली में प्रथम धर्म संसद के आयोजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। विभिन्न संप्रदायों के संतों और धर्माचार्यों को एक मंच पर लाकर उन्होंने रामजन्मभूमि के प्रश्न को व्यापक हिंदू समाज के सामने रखा। इसके बाद आंदोलन धीरे-धीरे स्थानीय विवाद से राष्ट्रीय जनआंदोलन में परिवर्तित हुआ। रामशिला पूजन, शिलान्यास, कारसेवा, 13 कोटि विजय महा मंत्र के जाप, हनुमत शक्ति जागरण अभियान—इन सबको एक व्यापक संगठनात्मक अभियान में बदलने में उन की केंद्रीय भूमिका रही। इसके लिए उन्होंने अलग-अलग परंपराओं, अखाड़ों, मठों और संतों को एक मंच पर ला कर उसे एक व्यापक धार्मिक व सांस्कृतिक जनआंदोलन बना दिया। दशकों तक चले इस आंदोलन में उन्होंने राजनैतिज्ञों और राजनैतिक दलों का सहयोग तो लिया किन्तु उसकी कमान कभी उनके हाथों में नहीं दी। उनके नेतृत्व व पूज्य संतों के मार्ग दर्शन तथा राम भक्तों के संघर्ष के कारण ही आज श्री राम लला अपनी जन्मभूमि बने एक गौरवशाली भव्य व दिव्य मंदिर में विराजमान हैं।    

2. रामसेतु आंदोलन: दक्षिण भारत के तीर्थ के प्रति पूरे भारत की आस्था का जागरण

माता सीता के अपहरण के पश्चात राम सेना को लंका ले जाने हेतु भारत और श्री लंका मध्य बनाए गए श्री रामसेतु की रक्षा हेतु हुआ आंदोलन भी अशोक सिंघल जी के कार्य का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। 2007 में केंद्र और तमिलनाडू सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट – सेतु-समुद्रम परियोजना के संदर्भ में रामसेतु की रक्षा का प्रश्न भी राष्ट्रीय आंदोलन बना। 26 अगस्त 2007 को रामेश्वरम् में बड़ी सभा हुई, जिसमें दक्षिण भारत के राज्यों—तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश—से बड़ी संख्या में राम भक्तों के साथ विभिन्न क्षेत्रों के संत और धार्मिक नेता भी इसमें सम्मिलित हुए।

इसके बाद 12 सितंबर 2007 को उन्होंने देशभर में एक साथ सिर्फ दो घंटे के चक्का जाम की घोषणा ने सम्पूर्ण देश में हजारों स्थानों पर सड़क और रेल यातायात पूरी तरह ठप्प कर दिया और केंद्र सरकार का सिंहासन डोलने लग गया। इसके बाद रही सही कसर रामसेतु शिला पूजन यात्राओं ने पूरी कर दी जो देश के लगभग 97,000 गांवों और कस्बों तक पहुंचीं। अंतत: देश के दक्षिणी छोर पर स्थित रामसेतु को पूरे भारत का प्रश्न बना। उनका यही वैशिष्ट्य था कि वे किसी एक क्षेत्र के धार्मिक प्रश्न को अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रश्न में बदलने के माहिर खिलाड़ी थे। उनके आंदोलनों से ही सरकारों को रामसेतु तोड़ने की अपनी हठ-धर्मिता त्यागनी पड़ी।  

3. अमरनाथ यात्रा आंदोलन: हिमालय से कन्याकुमारी तक आस्था की एकता

बाबा अमरनाथ की यात्रा और उससे जुड़े अधिकारों का प्रश्न भी उनके नेतृत्व में व्यापक जनचेतना का विषय बना। उनका मानना था कि अमरनाथ केवल जम्मू-कश्मीर का तीर्थ नहीं है; करोड़ों हिंदुओं के लिए यह अखिल भारतीय तीर्थ है। चाहे 90 के दशक में आतंकवादियों द्वारा अमरनाथ यात्रा को रोकने हेतु दी गई धमकी का बजरंगदल द्वारा दिया गया करारा जबाव हो या बाबा अमर नाथ की भूमि पर सरकारी संरक्षण में किए गए अवैध कब्जों की बात हो, उन्होंने संतों और समाज के नेतृत्व में एक बड़ा जन आंदोलन खड़ा किया जिसके समक्ष तत्कालीन हिन्दूद्रोही सरकार और आतंकियों दोनों को झुकने को मजबूर कर दिया। उनका मत था कि तीर्थ किसी राज्य की सीमा में बंद नहीं होता; वह पूरे समाज की सांस्कृतिक धरोहर होता है।

4. धर्मांतरण के विरुद्ध अभियान: मीनाक्षीपुरम से सामाजिक जागरण तक

अशोक सिंघल जी के जीवन में धर्मांतरण-विरोधी अभियान का एक निर्णायक मोड़ 1981 का मीनाक्षीपुरम प्रकरण था। तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने केवल विरोध का रास्ता नहीं चुना, बल्कि उन सामाजिक कारणों को समझने और दूर करने पर भी बल दिया जिनका उपयोग धर्मांतरण के लिए किया जा रहा था। बँचित क्षेत्र में उन्होंने पिछड़े समाज के लिए सैंकड़ों मंदिरों व सेवा केंद्रों का निर्माण करा कर एक व्यापक सामाजिक संपर्क अभियान चलाया, जो देश के ऐसे अनेक अनुसूचित जाति व जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों में अभी तक जारी है। उनका स्पष्ट मानना था कि धर्मांतरण का स्थायी समाधान केवल विरोध नहीं, बल्कि सम्मान, समानता, शिक्षा, स्वावलंबन और समाज के साथ आत्मीय एकात्मता है।

5. सामाजिक समरसता : हिंदू समाज के भीतर के भेद तोड़ने का प्रयास

अशोक सिंघल जी हिंदू समाज की आंतरिक विषमताओं को लेकर भी बहुत गंभीर थे। उनका मानना था कि यदि समाज जाति, अस्पृश्यता और सामाजिक विषमता में बंटा रहेगा तो बाहरी चुनौतियों का सामना प्रभावी ढंग से नहीं कर पाएगा। वरिष्ठ व श्रेष्ठ पूज्य संतों की उपस्थिति में 1989 के श्री राम मंदिर का शिलान्यास, दलित समाज से आने वाले श्री कामेश्वर चौपाल जी के कर कमलों से कराने की घटना ने सामाजिक समरसता का एक विशेष संदेश दिया गया। 13-14 दिसम्बर 1969 के उडुपी धर्म संसद में प्रमुख संतों के मुखारबिंद से “हिन्दव: सोदरा सर्वे, ना हिन्दू पतितो भवेत्” की घोषणा से प्रेरणा लेकर 1994 में काशी की धर्म संसद में संतों के बीच डोम राजा की उपस्थिति की बात हो या वनवासी, जनजाति, अति पिछड़ी व पिछड़ी जाति के हज़ारों लोगों को ग्राम पुजारी के रूप में प्रशिक्षण की बात, संगठन द्वारा देशभर में भगवान वाल्मीकि, संत रविदास व डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर इत्यादि महापुरुषों की जयन्तियां व्यापक रूप से मनाने की बात हो या ‘एक गाँव-एक मंदिर एक कुआ और एक शमशान’ का महा मंत्र, समरस समाज के बारे में उनकी सोच बड़ी स्पष्ट थी। उन्होंने सामाजिक सम्मान और सहभागिता के आंदोलन के माध्यम से हिन्दू एकता को मजबूत किया।

6. उत्तर-दक्षिण की दूरी पाटना: एकात्म भारत की अवधारणा

अशोक जी के कार्य का शायद सबसे महत्वपूर्ण और कम चर्चित आयाम था—भारत की सांस्कृतिक एकात्मता को व्यवहार में उतारना। उनका कोई आंदोलन सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित नहीं था। श्री रामजन्मभूमि उत्तर भारत में थी तो रामसेतु दक्षिण में। अमरनाथ उत्तर के हिमालय में था तो मीनाक्षीपुरम तमिलनाडु में। गंगा हिमालय से निकलती है तो जनजातीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों का विस्तार पूरे देश में था। सांस्कृतिक एकात्मता के उनके इस आंदोलनों ने ही अयोध्या को दक्षिण में और रामसेतु को उत्तर भारत में तथा श्री अमरनाथ को पूरे भारत की आस्था के केंद्र में ला दिया।

7. गौ-संरक्षण आंदोलन: आस्था और ग्राम्य जीवन की रक्षा

श्री अशोक सिंघल जी गौ रक्षा, गौ-संरक्षण व गौ पालन को भी हिंदू समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक चेतना से जोड़कर देखते थे। उनके नेतृत्व में गौ-रक्षा के लिए भी अनेक आंदोलन हुए। गौ भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और पारंपरिक जीवन व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध हेतु एक कठोर देशव्यापी कानून बनाने हेतु अनेक प्रयास किए। उन्हीं का परिणाम है कि आज दर्जन भर से अधिक राज्यों में गौ वध के विरुद्ध कठोर कानून लागू हैं तथा सैकड़ों गौशालाओं को सरकार द्वारा अनुदान दिया जा रहा है। साथ ही इस पवित्र कार्य में सामाजिक जागरूकता और सहभागिता दोनों में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है।   

8. गंगा और तीर्थ संरक्षण: प्रकृति को संस्कृति से जोड़ना

उनकी चिंता केवल मंदिरों और तीर्थों तक सीमित नहीं थी। उनके आंदोलनों में देवप्रयाग से गंगा तक के संरक्षण हेतु किए गए प्रयासों का उल्लेख आता है। वे कहते थे कि भारतीय परंपरा में नदी केवल जल का स्रोत नहीं है; वह संस्कृति, सभ्यता और जीवन की धारा है। इसलिए गंगा-रक्षा को उन्होंने केवल पर्यावरणीय प्रश्न के रूप में नहीं बल्कि, राष्ट्रीय धार्मिक व सांस्कृतिक दायित्व के रूप में देखा। और गंगा रक्षा के लिए भी एक बड़ा आंदोलन चलाया। उन्होंने गौ, गंगा व गायत्री की रक्षा हेतु भी एक साथ आव्हान किया था।

9. संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा : सांस्कृतिक पुनर्जागरण

अशोक सिंघल जी का कार्य केवल जमीनी आंदोलनों तक सीमित नहीं था। वे बौद्धिक आंदोलनों के भी पारंगत महा-पुरुष थे। उनका वेदों और संस्कृत के प्रचार-प्रसार के प्रति विशेष अनुराग था। संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण के लिए भी तो उन्होंने प्रयागराज में अपनी करोड़ों रुपयों की पूरी कोठी ही समर्पित कर दी, जिसमें आज तक वेद विद्यालय चल रहे हैं।  

उनकी दृष्टि में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ केवल अतीत का गौरवगान नहीं था; भारतीय ज्ञान, भाषा, परंपरा और आध्यात्मिक चिंतन को आधुनिक समाज में पुनः प्रतिष्ठित करना भी उसका आवश्यक हिस्सा था। भारत संस्कृत परिषद तथा वेद विश्व विद्यालयों तथा गुरुकुलीय शिक्षा को उन्होंने एक आंदोलन के रूप में लिया जिनके परिणाम अब समाज में आने प्रारंभ हो गए हैं।  

10. मंदिर मुक्ति आंदोलन: हिन्दू का धन हिन्दू के लिए

उन्होंने हिन्दू मंदिरों को सरकारों के नियंत्रण से मुक्ति हेतु भी कई आंदोलन किए तथा समय समय पर सरकारों व न्यायालयों में भी अपना व हिन्दू समाज का पक्ष द्रणता से रखा।

आंदोलन की शैली: संत-शक्ति + समाज-शक्ति + संगठन-शक्ति

अशोक सिंघल जी की कार्यशैली को तीन शब्दों में समझा जा सकता है। 1. संत-शक्ति: उन्होंने विभिन्न संप्रदायों और परंपराओं के संतों को एक मंच पर लाने का लगातार प्रयास किया। 2. समाज-शक्ति: उन्होंने आंदोलन को केवल नेताओं तक सीमित नहीं रखा। गांव, कस्बे, युवा, महिलाएं, साधारण परिवार और सामाजिक रूप से वंचित वर्ग तक पहुंच बनाई। 3. संगठन-शक्ति: उन्होंने भावनात्मक आस्था को व्यवस्थित संगठन और अनुशासित जन-भागीदारी में बदलने का प्रयास किया।

यदि उनके पूरे जीवन को एक सूत्र में बांधना हो तो वह सूत्र है: भारत को उसकी सांस्कृतिक आत्मा के आधार पर जोड़ना। उन्होंने अलग-अलग मुद्दों को अलग-अलग संघर्ष के रूप में नहीं देखा। राम—उत्तर और दक्षिण को जोड़ते हैं। गंगा—हिमालय और मैदानों को जोड़ती है। अमरनाथ—कश्मीर को कन्याकुमारी से जोड़ता है। रामसेतु—भारत को श्रीलंका से जुड़े रामायण के सांस्कृतिक आख्यान से जोड़ता है। मीनाक्षीपुरम—सामाजिक न्याय और धार्मिक पहचान के प्रश्न को जोड़ता है। सामाजिक समरसता—हिंदू समाज के भीतर की दूरियां मिटाने का एक आवश्यक प्रयास है। श्री राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष सिर्फ एक मंदिर के निर्माण का आंदोलन नहीं था; वह हिन्दू समाज के सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय एकात्मता का महा-अभियान था।

यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने कौन-कौन से आंदोलन किए अपितु, उनकी असली विशेषता यह थी कि उन्होंने आंदोलनों को समाज-जागरण और हिन्दू एकता का माध्यम बनाया। उन्होंने रामजन्मभूमि को जन-आस्था का प्रश्न बनाया। रामसेतु को राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत के प्रश्न से जोड़ा। अमरनाथ को अखिल भारतीय तीर्थ के रूप में देखने का आग्रह किया। धर्मांतरण के विरुद्ध सामाजिक जागरण खड़ा किया। सामाजिक समरसता को हिंदू एकता का आधार माना। जनजातीय और वंचित समाज के बीच कार्य को महत्व दिया। गौ-संरक्षण, गंगा और तीर्थों के प्रश्न उठाए। और सबसे बढ़कर, उन्होंने भारत के उत्तर और दक्षिण, हिमालय और समुद्र, नगर और वन, संत और सामान्य समाज—इन सबको एक ही सांस्कृतिक चेतना के सूत्र पिरो दिया। इसलिए श्री अशोक सिंघल जी को केवल रामजन्मभूमि आंदोलन के नेता ही नहीं अपितु, स्वतंत्र भारत के उस सांस्कृतिक जनजागरण के प्रमुख शिल्पी थे, जिसने भारत को उसकी सभ्यतागत चेतना, तीर्थ परंपरा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक स्वाभिमान के सूत्र में जोड़ने का प्रयास किया। उनके जीवन का संदेश शायद यही था कि आंदोलन किसी एक स्थान के लिए नहीं, समाज की चेतना के लिए होता है; और जब चेतना जागती है, तो भूगोल की सीमाएं भी छोटी पड़ जाती हैं।

विनोद बंसल