राजनीति

गांधी का भागलपुर और हमारे समय का आईना


कुमार कृष्णन


इतिहास में कुछ यात्राएं केवल यात्राएं नहीं होतीं। वे अपने पीछे ऐसे सवाल छोड़ जाती हैं, जिनका जवाब आने वाली पीढ़ियों को देना पड़ता है। महात्मा गांधी की भागलपुर यात्रा ऐसी ही यात्रा थी। गांधी अपने जीवन में चार बार भागलपुर आए—1917, 1920, 1925 और 1934। हर यात्रा का संदर्भ अलग था, लेकिन 1925 की यात्रा का महत्व कुछ अलग दिखाई देता है। इस यात्रा में गांधी राजनीतिक स्वतंत्रता के सवाल से आगे बढ़कर समाज के भीतर मौजूद रूढ़ियों, असमानताओं और नैतिक संकटों से संवाद करते नजर आते हैं।
आज, उस यात्रा के शताब्दी वर्ष में, गांधी को केवल स्मृति में दोहराना पर्याप्त नहीं। जरूरत यह पूछने की है कि जिस सामाजिक चेतना की बात उन्होंने तब की थी, उसकी स्थिति आज हमारे समाज में क्या है?
1 अक्टूबर 1925 को गांधी भागलपुर पहुंचे। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वे कमलेश्वरी सहाय के शिव भवन में ठहरे। अगले दिन, 2 अक्टूबर को, इसी शिव भवन में उन्होंने अपना 56वां जन्मदिन सादगी से मनाया। वहां महिलाओं की सभा हुई। गांधी ने पर्दा प्रथा छोड़ने, चरखा चलाने, खादी पहनने और बालिकाओं को शिक्षित करने की अपील की।
यह केवल सामाजिक सुधार का कार्यक्रम नहीं था। गांधी के लिए स्त्री की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय जीवन में उसकी भागीदारी स्वराज से जुड़ी हुई थी। शिव भवन उस दिन केवल उनके ठहरने की जगह नहीं रहा। वहां घर की चारदीवारी, स्त्री की गरिमा, शिक्षा, श्रम, स्वदेशी और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के सवाल एक-दूसरे से जुड़ गए।
गांधी के लिए राष्ट्र का निर्माण केवल राजनीतिक संस्थाओं से नहीं होना था। स्वतंत्रता तभी सार्थक हो सकती थी, जब समाज के भीतर मनुष्य के प्रति दृष्टि बदले। चरखा केवल सूत कातने का साधन नहीं था और खादी केवल वस्त्र नहीं। इनके पीछे श्रम की प्रतिष्ठा, आत्मनिर्भरता और गरीब परिवारों की आजीविका का विचार था।
गांधी के 1925 के भागलपुर प्रवास का महत्वपूर्ण दस्तावेज 1 अक्टूबर के उनके भाषणों में मिलता है। संपूर्ण गांधी वाङ्मय के खंड 28 में भागलपुर की सार्वजनिक सभा और मारवाड़ी अग्रवाल सभा के उनके संबोधनों की सामग्री दर्ज है। इन्हें साथ पढ़ने पर उनके सामने मौजूद सामाजिक प्रश्नों की व्यापकता समझ में आती है।
सार्वजनिक सभा में गांधी ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों में बढ़ती दूरी और अविश्वास पर चिंता जताई। उन्होंने स्वीकार किया कि 1921 की तुलना में अब दोनों समुदायों पर उनका वह प्रभाव नहीं रहा। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है। वे अपने प्रभाव को अंतिम सत्य नहीं मानते थे। प्रभाव कम होने पर भी उन्होंने संवाद का रास्ता नहीं छोड़ा। उनका आग्रह था कि दोनों समुदाय अपने भीतर झांकें और दूसरे के प्रति सम्मान पैदा करें। उनके लिए एकता राजनीतिक समझौते से अधिक मनुष्य के हृदय में दूसरे मनुष्य के लिए सम्मान की प्रक्रिया थी।
मारवाड़ी अग्रवाल सभा में उनका स्वर सामाजिक आत्मालोचना का था। वे स्वागत और अभिनंदन से अधिक काम की अपेक्षा रखते थे। आर्थिक रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से प्रभावशाली समुदाय से वे व्यापक समाज के प्रति जिम्मेदारी की अपेक्षा कर रहे थे।
अस्पृश्यता पर उनका रुख स्पष्ट था। किसी मनुष्य को अछूत मानना उनके लिए मनुष्यता के विरुद्ध था। किसी वंचित समुदाय पर दया करना पर्याप्त नहीं; उसे सम्मान और समानता देना जरूरी है। जातिगत संकीर्णता, बाल-विवाह और बाल-विधवाओं की स्थिति पर भी उन्होंने सवाल उठाए। धर्म के नाम पर किसी अमानवीय परंपरा को बनाए रखना उनके लिए स्वीकार्य नहीं था।
गो-संरक्षण पर भी गांधी केवल भावनात्मक आग्रह नहीं करते थे। उनका तर्क था कि यदि समाज वास्तव में गो-संरक्षण चाहता है तो उसे पशुपालन, गोशालाओं, दूध और उससे जुड़े आर्थिक तंत्र की जिम्मेदारी भी उठानी होगी। केवल दूसरे समुदाय को दोष देकर गाय की रक्षा नहीं की जा सकती। धार्मिक भावना को व्यवहार और जिम्मेदारी से जोड़ना होगा।
इन सभी प्रश्नों को साथ रखकर देखें तो गांधी के सामने समाज का एक विस्तृत चित्र था—धर्मों के बीच अविश्वास, जाति की दीवार, अस्पृश्यता, बाल-विवाह, आर्थिक असमानता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खादी, भाषा और सार्वजनिक जिम्मेदारी। इनके भीतर एक साझा चिंता थी—समाज का चरित्र।
यहीं गांधी की अहिंसा को समझने की जरूरत पड़ती है। अहिंसा को केवल हिंसा न करने तक सीमित कर देना गांधी के विचार को छोटा कर देना है। उनकी अहिंसा में सत्य, निर्भयता, आत्मसंयम, संवाद और दूसरे मनुष्य की गरिमा का सम्मान शामिल था। अन्याय के सामने चुप रहना अहिंसा नहीं था। अन्याय का प्रतिरोध इस तरह करना अहिंसा था कि प्रतिरोध स्वयं मनुष्यता को नष्ट न कर दे।
इसीलिए गांधी के लिए स्वराज केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था। स्वराज का अर्थ आत्मशासन भी था—व्यक्ति अपने ऊपर शासन करना सीखे और समाज अपने आचरण के प्रति जिम्मेदार बने। कानून जरूरी है, लेकिन कानून के बाहर भी सामाजिक नैतिकता होती है। परिवार, विद्यालय, बाजार, सड़क और आज सामाजिक माध्यम—हर जगह हमारा व्यवहार समाज के चरित्र का निर्माण करता है।
यहीं 1925 का भागलपुर आज के बिहार से संवाद करने लगता है।
सितंबर 2026 में जमुई में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित बदसलूकी और हिंसा का वीडियो सामने आया। पुलिस ने कार्रवाई और गिरफ्तारियों की जानकारी दी। पीड़िता की पहचान से जुड़ी सामग्री के प्रसार को लेकर भी कार्रवाई की बात सामने आई। इसी दौरान समस्तीपुर में एक छात्रा के साथ कथित बदसलूकी का वीडियो सामने आया और पुलिस ने गिरफ्तारियों की जानकारी दी। बांका के मंदार पर्वत से भी एक युवती के साथ कथित अभद्र व्यवहार और मारपीट का वीडियो पुलिस के संज्ञान में आया और जांच शुरू हुई।
इन घटनाओं के तथ्य और परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इन्हें एक ही तरह की घटना मानना उचित नहीं होगा लेकिन इनके सार्वजनिक होने से एक बड़ा सामाजिक प्रश्न जरूर सामने आता है—क्या हम ऐसी सामाजिक चेतना विकसित कर पाए हैं, जिसमें किसी लड़की या महिला की गरिमा को तमाशा नहीं, मनुष्य की गरिमा माना जाए?
यह प्रश्न इसलिए गंभीर है कि कई मामलों में घटना के साथ उसका वीडियो भी सार्वजनिक होता है। तकनीक, जिसने सूचना को लोकतांत्रिक बनाने की अभूतपूर्व क्षमता दी है, वही तकनीक किसी पीड़ित की पीड़ा को तमाशे में बदल सकती है।
यहीं गांधी के विचारों को आज के संदर्भ में पढ़ने की जरूरत है। उनके समय में सवाल था कि ज्ञान, राजनीति, धन, धर्म और विज्ञान मनुष्यता से कटकर कहीं अपने ही उद्देश्य के विरुद्ध तो नहीं जा रहे। आज उसी चिंता का एक नया रूप हमारे सामने है—तकनीक के बिना संवेदना।
मोबाइल कैमरा घटना को रिकॉर्ड कर सकता है, लेकिन क्या वह पीड़ित के प्रति संवेदना पैदा करता है? सामाजिक माध्यम सूचना को तेजी से फैला सकता है, लेकिन क्या वह विवेक भी देता है?
किसी घटना को दर्ज करना और किसी की पीड़ा को बार-बार प्रसारित करना एक बात नहीं है। अपराध की सूचना सार्वजनिक हित का विषय हो सकती है, लेकिन पीड़ित की पहचान उजागर करना, उसका चेहरा या वीडियो फैलाना और उसकी पीड़ा को सनसनी में बदल देना सूचना की जिम्मेदारी से अलग है।
यहीं पत्रकारिता और सामाजिक माध्यमों के सामने गांधी के सत्य और जिम्मेदारी की कसौटी खड़ी होती है। सच सामने आना चाहिए, लेकिन किसी कमजोर व्यक्ति की गरिमा कुचलकर नहीं। किसी अपराध को छिपाना गलत है और पीड़ित को सार्वजनिक तमाशे में बदल देना भी।
गांधी का सत्य केवल तथ्य बोलने तक सीमित नहीं था। सत्य के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी थी।
1925 में गांधी महिलाओं से पर्दे और रूढ़ियों से बाहर आने, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की बात कर रहे थे। आज महिलाएं शिक्षा और सार्वजनिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में आगे बढ़ी हैं लेकिन सवाल यह भी है कि क्या समाज उनके अधिकार और गरिमा की रक्षा करने की नैतिक क्षमता उसी अनुपात में विकसित कर पाया है?
तब प्रश्न था—क्या स्त्री रूढ़ियों से बाहर आकर सार्वजनिक जीवन में आएगी? आज प्रश्न है—क्या वह सार्वजनिक जीवन में बिना भय और अपमान के रह सकेगी?
तब बालिकाओं की शिक्षा का सवाल था। आज प्रश्न यह भी है कि शिक्षित समाज उनके अधिकार और सम्मान की रक्षा करेगा या नहीं।
समय बदल गया है। माध्यम बदल गए हैं। तकनीक बदल गई है। लेकिन मनुष्य की गरिमा का प्रश्न नहीं बदला।
इसलिए गांधी की 1925 की भागलपुर यात्रा को आज की सामाजिक परिस्थितियों से जोड़कर देखना इतिहास को वर्तमान पर आरोपित करना नहीं है। यह पुराने प्रश्न को नए संदर्भ में पढ़ना है।
सौ साल बाद गांधी जयंती को केवल माल्यार्पण, भाषण और समारोह तक सीमित रखने के बजाय समाज से कुछ सवाल पूछने चाहिए। क्या हमारी बेटियां सार्वजनिक स्थानों पर स्वयं को सुरक्षित महसूस करती हैं? क्या हम किसी पीड़ित की सहायता करने से पहले उसका वीडियो बनाने से बचते हैं? क्या सामाजिक माध्यमों पर किसी की गरिमा को अपनी जिज्ञासा से ऊपर रखते हैं? क्या कानून का भय ही हमारे व्यवहार को नियंत्रित करता है, या मनुष्यता भी हमारे भीतर कोई भूमिका निभाती है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या स्वराज केवल सत्ता बदलने का नाम था, या समाज बदलने का भी?
भागलपुर की 1925 की वह यात्रा अब इतिहास है। शिव भवन का वह प्रांगण भी इतिहास का हिस्सा है। लेकिन गांधी का सवाल इतिहास में बंद नहीं हुआ। वह आज भी हमारे घरों, सड़कों, विद्यालयों, संस्थाओं, पत्रकारिता और सामाजिक माध्यमों में हमारे सामने खड़ा है।
गांधी की अहिंसा केवल हिंसा से बचने का आग्रह नहीं थी। वह सत्य, निर्भयता, संवाद, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की रक्षा की नैतिक पद्धति थी। उनके लिए समाज का चरित्र कानून की किताबों से अकेले नहीं बनता; वह रोजमर्रा के व्यवहार से बनता है।
इसी अर्थ में भागलपुर में गांधी को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह वर्तमान के सामने आईना रखने जैसा है।
उस आईने में गांधी नहीं, हम दिखाई देते हैं।
और सवाल यह नहीं कि गांधी आज हमारे बीच होते तो क्या कहते। असली सवाल यह है कि हम उनके कहे हुए को अपने आचरण में कितना उतार पाए हैं।
क्योंकि गांधी की सबसे कठिन विरासत कोई प्रतिमा, सड़क, स्मारक या जयंती नहीं है। उनकी सबसे कठिन विरासत है—अपने ऊपर शासन करना, दूसरे की गरिमा को स्वीकार करना और अन्याय का प्रतिरोध करते हुए स्वयं अन्याय का हिस्सा न बनना।
भागलपुर की धरती पर सौ वर्ष पहले उठी वह आवाज आज भी पूछ रही है—स्वराज हमने पा लिया, लेकिन क्या हमने अपने भीतर के समाज को भी बदला?

कुमार कृष्णन